ज़िन्दगी के साथ क़दमताल करते यादों के कारवां हर किसी के जीवन के अपने क्लाइडोस्कोप होते हैं लगातार रंग बदलते, आकृति ग्रहण करते, नये दृश्य गढ़ते हुए। इन रंगों, आकृतियों और दृश्यों में कितना कुछ घटित होता रहता है, निर्मित होता है,परिवर्तित होता है इसका लेखा-जोखा जब लिखा जाता है…
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यात्रा-वृत्तांत: जिब्राल्टर जलसंधि कराता ‘तान्जिर’ – डॉ. आरती लोकेश
तान्जिर शहर के नाम के उच्चारण में बहुत दुविधा थी। लैटिन में यह ‘टिंगिस’ था, पुर्तगाली भाषा में ‘टैंजेर’, स्पैनिश में टांजीर, फ़्रैंच में ‘तान्जे’, अंग्रेज़ी में आने के बाद ‘तान्जीयर’ जैसा हो गया। इसका अरबी नाम ‘तंजाह’ है। सभी विदेशी इसे तान्जिर कहते हुए मिले तो वही हमने भी…
Read More →दो गज़लें : बलजीत सिंह ‘बेनाम’
1. तुम्हारी यादें इनकी ज़ेबों में हरदम कंगाली है भिखमंगों की यार कहाँ दीवाली है। जागी आँखों से मैंने सपना देखा हर इक चेहरे पर छाई खुशहाली है किस पर अब विश्वास करें इस दुनिया में हर डाली को काट रहा ख़ुद माली है। जनता को बहकाता झूठे वादों से…
Read More →साक्षात्कार: मंजुश्री से डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पाँडे का साहित्यिक संवाद
वरिष्ठ साहित्यकार व “कथाबिंब पत्रिका की संपादक मंजुश्री से डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पाँडे का साहित्यिक संवाद साहित्य में कुछ ऐसे लोग होते हैं जो ख़ुद को केवल एक विधा तक सीमित नहीं रखते; बल्कि उनका पूरा जीवन ही एक साहित्यिक संस्था बन जाता है। आदरणीय मंजु श्री जी हिन्दी…
Read More →पाँच ग़ज़लें – गिरीश पंकज
जहाँ कभी था वहीं आज जहाँ कभी था वहीं आज वो कुंठित बेचाराअपने में ही घुलता रहता चिंतित बेचारा जीवन भर नाकाम रहा बस इसीलिए अब तोदेख किसी की असफलता को हर्षित बेचारा देख ज़माने की उपलब्धि राख हुआ जाएइसलिए खुद उपलब्धि से वंचित बेचारा दूजों को निपटाना है पर…
Read More →कविता : रीज़ को पहुँचा आई – कमलजीत कौर
रीज़ को पहुँचा कर आ गईसपनों की देहरी तकजहाँ अब वह स्वयं करेगी चुनावअपने अनुभवों को देगी आकारअपने विचारों को देगी नया विस्तार। कितने अनजाने लोगों सेअब उसका होगा परिचयकितनी नई बातें होंगीकितने नए अनुभवों का संचय। छोटी-सी गुड़िया मेरीआज से अकेली रहेगीअब किसको देगीअपनी जादू-सी झप्पी? बार-बार यही विचारमन…
Read More →कविता: “पाँव” – डॉ नंदिता साहू
भीड़ से भरे रास्ते पर चलते है कई जोड़ी पाँव कोई रफ़्तार से भागता हुआ ज़िन्दगी की राह को नापता हुआ। कोई नपे तुले अंदाज़ में सफ़र काटता हुआ। किसी के संग एक जोड़ी पाँव और है सफ़र ख़त्म ना हो, इस आस में टहलता हुआ। एक जोड़ी पाँव ऐसा…
Read More →व्यंग्य: जले पर नमक – विवेक रंजन श्रीवास्तव
महाभारत में शकुनि के पास पासे थे। हमारे समय ने उसकी चौसर को बहुत बड़ा कर दिया है। अब पासे हाथीदाँत के नहीं होते। वे कभी एक मुस्कान में छिपे होते हैं, कभी ठहरी हुई निगाह में, कभी किसी की चोट पर बोले गए उस वाक्य में, “अरे, अभी तो…
Read More →कविता: मीरांगिणी – प्रदीप अग्रवाल
ए मेरी मीरांगिणीइतना भी न कर प्रेम मुझसेकि मेरे मौन को फिर सेस्वर लेना पड़ जाए। ए मेरी मीरांगिणीइतना भी न कर प्रेम मुझसेकि फिर से मुझेअवतार लेना पड़ जाए। अंतरा १ (कृष्ण) मैं जो सर्वत्र हूँ, अनाम हूँतेरी एक दृष्टि में ठहरता हूँ।तेरी भक्ति के तप मेंनिराकार होकर भीछाया…
Read More →लंदन में हिंदी युवा संगम – लगातार चौथे वर्ष
लंदन, 11 सितंबर – हिंदी युवा संगम – 2026 कार्यक्रम का भव्य आयोजन लंदन के नेहरू सेंटर में किया गया। यह कार्यक्रम ब्रिटेन की युवा पीढ़ी में हिंदी के प्रचार-प्रसार और उत्साह को बनाये रखने के लिए जाता है। पूरा पढ़ें लंदन, 11 सितंबर – हिंदी युवा संगम – 2026…
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