व्यंग्य: जले पर नमक – विवेक रंजन श्रीवास्तव

महाभारत में शकुनि के पास पासे थे। हमारे समय ने उसकी चौसर को बहुत बड़ा कर दिया है। अब पासे हाथीदाँत के नहीं होते। वे कभी एक मुस्कान में छिपे होते हैं, कभी ठहरी हुई निगाह में, कभी किसी की चोट पर बोले गए उस वाक्य में, “अरे, अभी तो कुछ हुआ ही नहीं।” पासा फेंकने वाला हाथ दिखाई नहीं देता। केवल किसी के चेहरे पर अचानक खिंची हुई एक रेखा दिखाई देती है। दर्द दिखता नहीं। समझने वाले की समझ में तीखा शाब्दिक प्रहार जले पर नमक की तरह महसूस होता है।

मुहावरा है—“जले पर नमक छिड़कना।”

नमक! जो भोजन का स्वाद सँवारता है, वही घाव पर पड़कर पीड़ा बढ़ा देता है। जीवन भी शायद ऐसा ही है। एक ही शब्द कभी मरहम हो जाता है और वही शब्द अवसर देखकर नमक। फर्क केवल इतना है कि सामने वाले की हालत क्या है और बोलने वाले के मन में क्या है।

जलना भी मनुष्य के जीवन का हिस्सा है। कभी आग बाहर लगती है। कभी भीतर। कभी चूल्हे से हाथ जलता है। कभी किसी निर्णय से मन। कभी विश्वास टूटता है। कभी उम्मीद। घाव का आकार चाहे जो हो, मनुष्य अपने भीतर एक जगह ऐसी बचाकर रखता है जहाँ वह सबसे अधिक संवेदनशील होता है। और जले पर नमक छिड़कने वालो को उस जगह का पता बहुत जल्दी चल जाता है।

किसी की परीक्षा में असफलता हुई। वह पहले ही भीतर से बुझा हुआ था। तभी कोई बोला, “हमने तो पहले ही कहा था कि तुमसे नहीं होगा।” सलाह समाप्त। छिड़के हुए शाब्दिक नमक का काम शुरू। किसी ने व्यापार में नुकसान उठाया। वह हिसाब की पर्चियों के बीच बैठा था। मित्र ने कंधा थपथपाया और कहा, “तुम्हें व्यापार आता ही कहाँ था!” बात छोटी थी। घाव बड़ा हो गया।किसी की वर्षों की प्रतीक्षा के बाद मनचाहा काम नहीं हुआ। हम पूछ बैठे, “तो अब क्या करोगे?” प्रश्न सामान्य था। लेकिन कभी-कभी सामान्य प्रश्न भी ऐसे समय में नमक की तरह लगता हैं, जब सामने वाला अभी अपने आँसू पोंछ भी नहीं पाया हो, और संवेदना की सहानुभूति पीड़ा दे।

नमक की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि उसे बहुत कम मात्रा में भी अपना काम करने के लिए पर्याप्त अवसर मिल जाता है। एक वाक्य काफी है। एक मुस्कान काफी है। एक ठहाका काफी है। कभी-कभी तो केवल चुप्पी काफी है। दुर्योधन फिसलकर गिरा था , द्रौपदी की हंसी और अंधे का बेटा अंधा कहा जाने ने उसके जले पर ऐसा नमक छिड़का की कृष्ण भी महाभारत नहीं रोक सके ।

किसी की खुशी में हमारी चुप्पी भी बोलती है। किसी के दुख में हमारी अनावश्यक हँसी भी। शब्दों की जरूरत हमेशा नहीं पड़ती। चेहरे भी बहुत कुछ लिख देते हैं और आँखें कभी पूरी किताब तैयार कर देती हैं।

कभी-कभी जले पर नमक बहुत संस्कारी ढंग से छिड़का जाता है।

“बुरा मत मानना, लेकिन…”इसके बाद आने वाला वाक्य अक्सर इतना लंबा नहीं होता कि घाव भर दे। हाँ, इतना जरूर होता है कि वह जख्म फिर से खुल जाए।“मैं तुम्हारे भले के लिए कह रहा हूँ।”यह वाक्य भी जले पर नमक छिड़कने वालो के लिए बड़ा उपयोगी है। इसके पीछे बहुत-सी ऐसी बातें सुरक्षित रखी जा सकती हैं, जिन्हें सीधे कहने पर शायद मनुष्य स्वयं को थोड़ा असभ्य समझे। इसलिए नमक को सलाह की डिबिया में रख दिया जाता है।

परिवारों में यह नमक रिश्तेदारी की मिठास में घुला मिलता है। किसी बच्चे ने कोई रास्ता चुना तो तुलना तैयार। किसी ने विवाह में देर की तो प्रश्न तैयार। किसी ने नौकरी बदली तो भविष्यवाणी तैयार। कोई अपने निर्णय से खुश दिखाई दिया तो नमक छिड़कने वालो द्वारा पुरानी घटनाओं की फाइल खोल दी जाती है।

हम अक्सर भूल जाते हैं कि हर मनुष्य अपनी लड़ाइयों का पूरा विवरण लेकर नहीं चलता। किसी के चेहरे पर मुस्कान है तो जरूरी नहीं कि भीतर कोई उत्सव भी हो। किसी की चुप्पी में अहंकार नहीं, थकान भी हो सकती है। किसी की असफलता में आलस्य नहीं, परिस्थितियों का पहाड़ भी हो सकता है। पर निष्कर्ष निकालना हमेशा आसान लगता है। किसी को पूरी तरह समझने के लिए ठहरना पड़ता है।और ठहरना आज शायद सबसे महँगा संस्कार है। सूचना बहुत तेज है, तो प्रतिक्रिया उससे भी तेज। किसी घटना की पूरी खबर आने से पहले उसकी व्याख्या आ जाती है। किसी के आँसू सूखें, उससे पहले उस तक नमक मिली सलाह पहुँच जाती है। किसी के घर का दरवाजा बंद हो, उससे पहले बाहर खड़े लोग तय कर लेते हैं कि भीतर क्या हुआ होगा।

दुख को भी अब दर्शक चाहिए।कभी-कभी लगता है, नारद मुनि यदि आज होते तो उनकी वीणा की जगह मोबाइल होता। वे तीनों लोकों में समाचार ले जाने के लिए नहीं, प्रतिक्रिया लाने के लिए दौड़ते। अंतर इतना होता कि तब समाचार के साथ समाधान भी आता था, अब समाचार के साथ व्हाट्स अप टिप्पणी आती है। समस्या यह नहीं कि हम बोलते बहुत हैं। समस्या यह है कि हम दूसरे के घाव की गहराई जाने बिना बोलते हैं।

एक चिकित्सक घाव देखकर औजार चुनता है। हम घाव देखकर शब्द चुन लेते हैं। वह भी प्रायः अपने अनुभव की दराज से।

किसी के पिता का निधन हुआ। हम अपने शोक का उदाहरण देने लगते हैं।किसी का घर टूटा। हम अपने संघर्ष की कथा सुनाने लगते हैं।किसी का सपना बिखरा। हम सफलता का सूत्र बताने लगते हैं।हमारा मैं, फटाफट बाहर निकलने को हर स्थिति में बेताब दिखता है।सामने वाला शायद केवल इतना चाहता था कि कोई उसके पास बैठ जाए।हमने उसे व्याख्यान दे दिया।

यही वह क्षण है जहाँ संवेदना और प्रदर्शन के बीच की महीन रेखा दिखाई देती है।सच तो यह है कि नमक हमेशा बुरी चीज नहीं। बिना नमक के भोजन फीका है। पर घाव को भोजन समझने की भूल नहीं होनी चाहिए।हर बात हर समय कह देना स्पष्टवादिता नहीं।हर सच हर क्षण बोल देना साहस नहीं।कभी-कभी चुप रह जाना ही मनुष्य होने की सबसे कठिन परीक्षा है।

“जले पर नमक छिड़कना” केवल दूसरे की क्रूरता का चित्र नहीं है। यह हमारे भीतर बैठे उस छोटे-से अहंकार का भी परिचय है, जिसे दूसरे की पीड़ा में अपनी श्रेष्ठता का प्रमाण दिखाई देता है।किसी की हार देखकर हमे मन में जो राहत होती है, उसे हम अक्सर पहचानते नहीं।किसी की चूक देखकर जो मुस्कान होंठों तक आती है, उसे हम तुरंत शिष्टाचार में बदल देते हैं।किसी की असफलता पर मन कहता है, “चलो, मैं तो ठीक हूँ।” यही वह क्षण है जब हाथ में नमक आ जाता है। फिर हम उसे शब्दों में बदलते हैं।

कभी सलाह।कभी व्यंग्य।कभी तुलना।कभी उपदेश।कभी शुभचिंता।और सामने वाला समझ भी नहीं पाता कि उसके घाव पर पट्टी बाँधने आए थे या नमक छिड़कने ।शायद इसलिए भारतीय परंपरा ने करुणा को इतना महत्व दिया। राम शबरी के बेर खाते हैं। कृष्ण विदुर के घर जाते हैं। बुद्ध अंगुलिमाल के सामने रुकते हैं। संतों ने बार-बार मनुष्य को मनुष्य की पीड़ा के पास बैठना सिखाया है। वहाँ कोई नमक नहीं है। केवल संवेदना की उपस्थिति है।कुछ घावों को केवल यह भरोसा चाहिए कि कोई उन्हें कुरेदेगा नहीं।

इसलिए अगली बार जब किसी की पीड़ा हमारे सामने हो, तो कोई शब्द बोलने से पहले एक क्षण रुकना चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि जिसे हम संवेदना कह रहे हैं, वह इस समय उसके लिए नमक छिड़कने जैसा हो?कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी बुद्धिमत्ता उसके घाव से बड़ी दिखाई देना चाहती है?और कहीं ऐसा तो नहीं कि दूसरे के दर्द को समझने से पहले हम अपने भीतर छिपी उस छोटी-सी प्रसन्नता को छिपा रहे हैं, जो उसकी ठोकर देखकर जाग गई है? क्योंकि जले पर नमक छिड़कने वाला हाथ हमेशा दूसरे का नहीं होता।कभी-कभी वह हमारा अपना हाथ होता है।नमक छिड़ककर लोग आगे बढ़ जाते हैं, यह सोचकर कि हमने तो केवल एक सच्ची बात ही कही थी । इसलिए किसी के जले पर मरहम लगाये या ना लगाए कम से कम कभी नमक न छिड़कें।

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– विवेक रंजन श्रीवास्तव

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