कविता : रीज़ को पहुँचा आई – कमलजीत कौर

रीज़ को पहुँचा कर आ गई
सपनों की देहरी तक
जहाँ अब वह स्वयं करेगी चुनाव
अपने अनुभवों को देगी आकार
अपने विचारों को देगी नया विस्तार।

कितने अनजाने लोगों से
अब उसका होगा परिचय
कितनी नई बातें होंगी
कितने नए अनुभवों का संचय।

छोटी-सी गुड़िया मेरी
आज से अकेली रहेगी
अब किसको देगी
अपनी जादू-सी झप्पी?

बार-बार यही विचार
मन में आते रहे
दूरी तो छोटी-सी है
पर जाने क्यों
बहुत अखर रही है।

खुशी भी बहुत है
उसके नए आयामों की
पर घर सूना हो गया
वो चिड़िया जो है
मेरे आशियाने की।

उसे आगे बङते देख
मन गर्व से भर आया
पर लौटते हुए
आँखों से जाने कितना
चुपचाप बहाया।

वापसी का सफ़र कठिन-सा था
मन बहुत भारी
घर तो वही था
बस उसकी चुलबुलाहट नहीं थी।

मेरी लाडली
अपने नए राह पर चली है
और मेरा आँगन यही सोचकर महक रहा है
पूर्ण हों तुम्हारे सपने
तुम्हारी नानीअपने सपने
तुम्हें सौंपकर चली गईं
ढेरों दुआओं के साथ।

भिड़ जाना ..हर उस अड़चन से
जो तुम्हें रोकने की कोशिश करे
रोना… पर ..ख़ुद को खोना नहीं
अपनी पहचान पर गर्व करना
पर नर्मता को, कभी छोड़ना नहीं।

जीवन के हर रंग को जीना
हार का हो , या जीत कभी
पर घबराना नहीं

माँ की दुआएँ
हर पल तुम्हारे साथ रहेंगी।

kamajeet kaur

कमलजीत कौर , ब्रिटेन

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