जब कार्य ही विश्राम हो
और गति ही आराम हो।
श्री राम जैसा संघर्ष हो
श्री कृष्ण जैसा विमर्श हो।।
जब कार्य ही विश्राम हो
और गति ही आराम हो।
श्री राम जैसा संघर्ष हो
श्री कृष्ण जैसा विमर्श हो।।
जब कार्य ही विश्राम हो
और गति ही आराम हो।
श्री राम जैसा संघर्ष हो
श्री कृष्ण जैसा विमर्श हो।।
जब कार्य ही विश्राम हो
और गति ही आराम हो।
श्री राम जैसा संघर्ष हो
श्री कृष्ण जैसा विमर्श हो।।
प्रकृति के छाया चित्र का आनंद उठाते
युवक बैठा था कुर्सी पर कंप्यूटर खोले,
गुज़ारिश की यारों से
कि चलो आज कुदरत की
अब मेरे चारों ओर
रंगीन तितलियाँ नहीं उड़ती
और न ही अब छोटे बच्चे
तितलियों के पीछे भागते हैं
फूलों से सुगंध भी
अब खोने लगी है
बचपन अपने पीठ पर
बचपना ढोने लगी है।
प्रेम की भी पोषक हैं यादें
कभी बरसती भरी दुपहरी
कभी टपकती हैं शामों में
उछल कूद करतीं हृदय में
कभी निलय से आलिंदो में
…….
जन्मभूमि माँ !
तू वहां मैं यहाँ।
तुझ से दूर इस विदेश में बस कर
जीती हूँ हर पल तेरा ही नाम लेकर
बरसों बीत गये बिछड़े गोद से तेरी
फिर भी लगता है तू हरदम है पास मेरी
क्या इसी को कहते हैं जन्म-जन्म का नाता
नेह का मंत्र लिख श्वाँस के दीप पर,
वर्तिका सम हृदय को पुरोहित करें ।
काव्य की सर्जना का दिवाकर उगा,
वेदना के तिमिर को तिरोहित करें ।।
तोड़ दुश्मन के सपने तमाम
तूं दिखादे तेरा भारत है नाम
कोई लेकर के भगवे की आड़
किसे का नाम पुछ पिसे जाड़
उसकी अक्ल मैं तूं दिए बाड़
एक है गुरु अल्लाह और राम
तूं दिखादे…
प्राण हो तुम तिरंगे के तुमको नमन।
आज स्वाधीन तुमसे हमारा वतन।।
चूम फाँसी का फन्दा मिटे देश पर।
काला पानी सहे न थके लेश भर।
सिर झुके हैं हमारे करें आचमन।