ज़िन्दगी के साथ क़दमताल करते यादों के कारवां हर किसी के जीवन के अपने क्लाइडोस्कोप होते हैं लगातार रंग बदलते, आकृति ग्रहण करते, नये दृश्य गढ़ते हुए। इन रंगों, आकृतियों और दृश्यों में कितना कुछ घटित होता रहता है, निर्मित होता है,परिवर्तित होता है इसका लेखा-जोखा जब लिखा जाता है…
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Hindi Literature & Poetry
Kavita, Kahani, Lekh
दो गज़लें : बलजीत सिंह ‘बेनाम’
1. तुम्हारी यादें इनकी ज़ेबों में हरदम कंगाली है भिखमंगों की यार कहाँ दीवाली है। जागी आँखों से मैंने सपना देखा हर इक चेहरे पर छाई खुशहाली है किस पर अब विश्वास करें इस दुनिया में हर डाली को काट रहा ख़ुद माली है। जनता को बहकाता झूठे वादों से…
Read More →कविता: तुम्हारी यादें – डॉ. कृष्ण कन्हैया
तुम्हारी यादेंदिल के दाहिने ख़ाने मेंबसाना चाहता हूँताकि रूक-रूक करछन-छन कर आगे बढ़ेऔर फेफड़े में अपनीअशुद्धियाँ दूर करे। और शुद्ध अंतरंग क्षणमेरे दिल के मज़बूतबाँये ख़ाने में लौट आयेंजो हृदयगति के साथनाड़ी की चाप से। घुलमिल करपूरी कोशिकाओं मेंअपना आधार तय करेंऔर हमेशा के लियेशरीर के पंच तत्व मेंविलीन हो…
Read More →कविता: गीत-संग तुम्हारे ख़्वाब सजे – आकांक्षा द्विवेदी
संग तुम्हारे ख़्वाब सजे थे, साथ तुम्हारे जाना थाफिर क्यों साथी बीच राह में हमे छोड़ कर चले गए अभी-अभी तो हम मिले थेकितनी बाते करनी थीमेरे अधरों की मुस्कानेतेरे अधरों पर सजनी थीऐसा भी क्या रूठे यारा, मुख मोड़ कर चले गए।संग तुम्हारे ख़्वाब सजे थे, साथ तुम्हारे जाना…
Read More →कविता: ये मोहब्बतें पुरानी-सी – विवेक दाधीच
letterbox के ज़माने कीये मोहब्बतें पुरानी-सीकिसी ख़ुशबू वाली चिट्ठी-सीकिसी भीगी शाम सुहानी-सी एक काँपते हाथ को थामतादूसरा काँपता हाथदोनों काँपते हाथअब काँपते साथ साथऔर यूँ बटोर के भरोसाचलते कदम बा कदमएक slow, romantic beautiful कहानी सीletterbox के ज़माने कीये मोहब्बतें पुरानी-सी चमकते बाल, झूलते गालटिमटिमाती आँखें, आँखों मे सवालजैसे की…
Read More →साक्षात्कार: मंजुश्री से डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पाँडे का साहित्यिक संवाद
वरिष्ठ साहित्यकार व “कथाबिंब पत्रिका की संपादक मंजुश्री से डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पाँडे का साहित्यिक संवाद साहित्य में कुछ ऐसे लोग होते हैं जो ख़ुद को केवल एक विधा तक सीमित नहीं रखते; बल्कि उनका पूरा जीवन ही एक साहित्यिक संस्था बन जाता है। आदरणीय मंजु श्री जी हिन्दी…
Read More →पाँच ग़ज़लें – गिरीश पंकज
जहाँ कभी था वहीं आज जहाँ कभी था वहीं आज वो कुंठित बेचाराअपने में ही घुलता रहता चिंतित बेचारा जीवन भर नाकाम रहा बस इसीलिए अब तोदेख किसी की असफलता को हर्षित बेचारा देख ज़माने की उपलब्धि राख हुआ जाएइसलिए खुद उपलब्धि से वंचित बेचारा दूजों को निपटाना है पर…
Read More →कविता : रीज़ को पहुँचा आई – कमलजीत कौर
रीज़ को पहुँचा कर आ गईसपनों की देहरी तकजहाँ अब वह स्वयं करेगी चुनावअपने अनुभवों को देगी आकारअपने विचारों को देगी नया विस्तार। कितने अनजाने लोगों सेअब उसका होगा परिचयकितनी नई बातें होंगीकितने नए अनुभवों का संचय। छोटी-सी गुड़िया मेरीआज से अकेली रहेगीअब किसको देगीअपनी जादू-सी झप्पी? बार-बार यही विचारमन…
Read More →कविता: “पाँव” – डॉ नंदिता साहू
भीड़ से भरे रास्ते पर चलते है कई जोड़ी पाँव कोई रफ़्तार से भागता हुआ ज़िन्दगी की राह को नापता हुआ। कोई नपे तुले अंदाज़ में सफ़र काटता हुआ। किसी के संग एक जोड़ी पाँव और है सफ़र ख़त्म ना हो, इस आस में टहलता हुआ। एक जोड़ी पाँव ऐसा…
Read More →व्यंग्य: जले पर नमक – विवेक रंजन श्रीवास्तव
महाभारत में शकुनि के पास पासे थे। हमारे समय ने उसकी चौसर को बहुत बड़ा कर दिया है। अब पासे हाथीदाँत के नहीं होते। वे कभी एक मुस्कान में छिपे होते हैं, कभी ठहरी हुई निगाह में, कभी किसी की चोट पर बोले गए उस वाक्य में, “अरे, अभी तो…
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