कहानी: वापसी का सुख – डॉ. मनोज मोक्षेंद्र

manoj mokshendra

कोई चौदह साल का होते-होते उसमें से बचपना तो गायब ही हो चुका था और वह हर बात को तर्क के आधार पर आंकने लगा था। पापा ने बार-बार उसे समझाया कि आम ज़िन्दगी में सब-कुछ तर्क के अनुसार नहीं चलता। भावना और जज़्बात के मुताबिक भी चीज़ों को आँकना…

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