1. तुम्हारी यादें इनकी ज़ेबों में हरदम कंगाली है भिखमंगों की यार कहाँ दीवाली है। जागी आँखों से मैंने सपना देखा हर इक चेहरे पर छाई खुशहाली है किस पर अब विश्वास करें इस दुनिया में हर डाली को काट रहा ख़ुद माली है। जनता को बहकाता झूठे वादों से…
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kavita
कविता: तुम्हारी यादें – डॉ. कृष्ण कन्हैया
तुम्हारी यादेंदिल के दाहिने ख़ाने मेंबसाना चाहता हूँताकि रूक-रूक करछन-छन कर आगे बढ़ेऔर फेफड़े में अपनीअशुद्धियाँ दूर करे। और शुद्ध अंतरंग क्षणमेरे दिल के मज़बूतबाँये ख़ाने में लौट आयेंजो हृदयगति के साथनाड़ी की चाप से। घुलमिल करपूरी कोशिकाओं मेंअपना आधार तय करेंऔर हमेशा के लियेशरीर के पंच तत्व मेंविलीन हो…
Read More →कविता: गीत-संग तुम्हारे ख़्वाब सजे – आकांक्षा द्विवेदी
संग तुम्हारे ख़्वाब सजे थे, साथ तुम्हारे जाना थाफिर क्यों साथी बीच राह में हमे छोड़ कर चले गए अभी-अभी तो हम मिले थेकितनी बाते करनी थीमेरे अधरों की मुस्कानेतेरे अधरों पर सजनी थीऐसा भी क्या रूठे यारा, मुख मोड़ कर चले गए।संग तुम्हारे ख़्वाब सजे थे, साथ तुम्हारे जाना…
Read More →कविता: ये मोहब्बतें पुरानी-सी – विवेक दाधीच
letterbox के ज़माने कीये मोहब्बतें पुरानी-सीकिसी ख़ुशबू वाली चिट्ठी-सीकिसी भीगी शाम सुहानी-सी एक काँपते हाथ को थामतादूसरा काँपता हाथदोनों काँपते हाथअब काँपते साथ साथऔर यूँ बटोर के भरोसाचलते कदम बा कदमएक slow, romantic beautiful कहानी सीletterbox के ज़माने कीये मोहब्बतें पुरानी-सी चमकते बाल, झूलते गालटिमटिमाती आँखें, आँखों मे सवालजैसे की…
Read More →पाँच ग़ज़लें – गिरीश पंकज
जहाँ कभी था वहीं आज जहाँ कभी था वहीं आज वो कुंठित बेचाराअपने में ही घुलता रहता चिंतित बेचारा जीवन भर नाकाम रहा बस इसीलिए अब तोदेख किसी की असफलता को हर्षित बेचारा देख ज़माने की उपलब्धि राख हुआ जाएइसलिए खुद उपलब्धि से वंचित बेचारा दूजों को निपटाना है पर…
Read More →कविता : रीज़ को पहुँचा आई – कमलजीत कौर
रीज़ को पहुँचा कर आ गईसपनों की देहरी तकजहाँ अब वह स्वयं करेगी चुनावअपने अनुभवों को देगी आकारअपने विचारों को देगी नया विस्तार। कितने अनजाने लोगों सेअब उसका होगा परिचयकितनी नई बातें होंगीकितने नए अनुभवों का संचय। छोटी-सी गुड़िया मेरीआज से अकेली रहेगीअब किसको देगीअपनी जादू-सी झप्पी? बार-बार यही विचारमन…
Read More →कविता: “पाँव” – डॉ नंदिता साहू
भीड़ से भरे रास्ते पर चलते है कई जोड़ी पाँव कोई रफ़्तार से भागता हुआ ज़िन्दगी की राह को नापता हुआ। कोई नपे तुले अंदाज़ में सफ़र काटता हुआ। किसी के संग एक जोड़ी पाँव और है सफ़र ख़त्म ना हो, इस आस में टहलता हुआ। एक जोड़ी पाँव ऐसा…
Read More →कवयित्रि: एक माँ एक कुम्हार – अंकिता साहिबा
बहुत सारे लोग पूछते हैं – कैसा चल रहा है आपका पोस्टपार्टमऔर मदरहुड का सफ़र?शिक़ायतें तो बहुत हैं, मगर ज़िंदगी से कोई शिक़ायत नहीं।क्योंकि इस बार हमने कुम्हार का क़िरदार निभाया है।एक नन्हे से जीवन को आकार दिया है,उसे गढ़ा है, सँवारा है और अब उसे बेहतर बनाने में व्यस्त…
Read More →कविता: मीरांगिणी – प्रदीप अग्रवाल
ए मेरी मीरांगिणीइतना भी न कर प्रेम मुझसेकि मेरे मौन को फिर सेस्वर लेना पड़ जाए। ए मेरी मीरांगिणीइतना भी न कर प्रेम मुझसेकि फिर से मुझेअवतार लेना पड़ जाए। अंतरा १ (कृष्ण) मैं जो सर्वत्र हूँ, अनाम हूँतेरी एक दृष्टि में ठहरता हूँ।तेरी भक्ति के तप मेंनिराकार होकर भीछाया…
Read More →कविता: घर आँगन – निधि गुप्ता
बचपन से किताबों में डूबी रहीकि मेरी अपनी किताब ही कहीं खो गईलिख-लिखकर मिटाती रहीजाने किससे मैं अपनी प्रतिभा छुपाती रही। छोड़ दिया जिस चौखट को लड़कपन मेंबहुत कुछ रह गया मेरा माँ के उस आँगन में। आज भी जब कलम मिल जाती हैतो चेहरे पर कलियाँ खिल जाती हैंकलम की…
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