पुस्तक समीक्षा: क्लाइडोस्कोप: सतरंगी स्मृतियां : ख़ुदेजा ख़ान

हर किसी के जीवन के अपने क्लाइडोस्कोप होते हैं लगातार रंग बदलते, आकृति ग्रहण करते, नये दृश्य गढ़ते हुए। इन रंगों, आकृतियों और दृश्यों में कितना कुछ घटित होता रहता है, निर्मित होता है,परिवर्तित होता है इसका लेखा-जोखा जब लिखा जाता है तो पता चलता है कि यह वह सतरंगी स्मृतियां हैं जिनके सहारे जीवन आगे बढ़ता रहता है।आगे बढ़ते हुए सांस लेता है, धड़कता है जिसे हम “ज़िन्दगी” कहते हैं यदि यह न हो तो जीने की कल्पना क्या संभव हो पाएगी; शायद नहीं। गति ही जीवन है, रुक जाना…. नहीं रुकना तो है ही नहीं, लेखिका दिव्या माथुर को तो बिल्कुल भी नहीं। जिन्होंने जन्म ही ऐसे घर में लिया जहां स्वर्गीय पिता सूफ़ी मिज़ाज के थे।जो बचपन में उन्हें और अपने शिष्यों को रामायण, क़ुरआन शरीफ़, गीता, गुरु ग्रंथ साहब आदि ग्रंथों के अंश सुनाया करते थे। मतलब एक साझी विरासत के पैरोकार।परिवार के सभी बुजुर्गवार उर्दू और फारसी के विद्वान थे और घर में सरल हिंदुस्तानी बोली जाती थी। इसी आब ओ हवा ने इनको विनम्र,आडंबरहीन और शालीन बनाया। बचपन से ही घर में भजन कीर्तन और संगीत का माहौल था। लेकिन जीवन कभी भी एक सरल रेखीय नहीं होता यह पुस्तक इस अवधारणा की पुष्टि करती है। लेखिका की जीवटता, प्रारब्ध या नियति, जो भी कहें लेकिन दृढ़ इच्छा शक्ति और आत्म संकल्प ने वह करवाया जो कठिन तो था असंभव नहीं। भारत की अपनी दिलेर और दिलदार मित्र जगजीत की हवाई टिकट की स्पॉन्सरशिप के बूते डेनमार्क के कोपन हेगन फिर ओडेंस पहुंचना सिर्फ इसलिए कि बच्चों को एक सुखद, सुरक्षित एवं शिक्षित जीवन दे सकें।इस प्रवास के पीछे अवश्य ही कारण बहुत पुख़्ता रहे होंगे फिर भी ये निर्णय एक स्त्री के अदम्य साहस को दर्शाता है, जो दो बच्चों की माँ भी है।

ख़ैर सफ़र शुरू होता है; इसी के साथ शुरू होता है संघर्ष- आजीविका का, एक अदद नौकरी का और बच्चों के स्थायी भविष्य का।लेखिका का स्वभाव क्योंकि कला, साहित्य और संगीत में रचा बसा था इसलिए जब लंदन में 1992 में नेहरू केंद्र की स्थापना हुई तब वहां गोपाल कृष्ण गांधी जैसे समर्पित भाव से काम करने वाले व्यक्तित्व का सहयोग मिला और ये अवसर मील का पत्थर साबित हुआ।इन्हें कार्यक्रम अधिकारी की नौकरी मिली तो जैसे आशाओं को पंख मिल गए। यहां पर इनका एक से बढ़कर एक कलाकारों, लेखकों और शख़्सियतों से रूबरू होना जीवन पर्यंत के लिए अविस्मरणीय अनुभव में बदल गया।

अपने इन अनुभवों को कुल पच्चीस अध्यायों में विभक्त कर लिखा गया है। शुरुआती अध्याय बचपन, संयुक्त परिवार और दादा- दादी ( बाबा-अम्मा), माता-पिता,भाई -बहन से संबंधित है जो हमें उस समय के कालखंड में ले जाते हैं जब एक रसोई में एक साथ पूरे परिवार का भोजन पकता था। प्रायः सब मिलजुल कर रहते थे। जैसे-जैसे पुस्तक के पन्ने पलटते जाते हैं हम भी इस सफ़र के सहयात्री बनते जाते हैं जहां मामा की भूतिया हवेली का सफर ऊंट पर बैठकर तय किया गया था।बाद में इनके ममेरे भाई-बहन भी दिल्ली आकर बस गए बेशक इसमें लेखिका का बड़ा योगदान व प्रोत्साहन रहा। अपने बाबा( दादा) को जिस शिद्दत से लेखिका याद करती हैं वह बड़ा ही दिलचस्प है; याद करें भी क्यों न, आखिर उनके कलावादी संस्कारों की नींव- दादा बिशन दयाल ‘शाद’ जैसे चित्रकार, शानदार कलाकार और शायर के सानिध्य में पड़ी। यही नहीं बचपन के खेल, कंचे, और कोना-कोना अब भले ही समय की गति में खो गए। लेकिन इनका विस्मृति होना जीते जी तो मुमकिन नहीं। 

divya mathur, kaleidoscope

कुछ रोचक प्रसंगों में अपनी कला और कल्पना के आधार पर चिकित्सा आशुलिपि की ईजाद कर डालना तो है ही। स्नायु सम्बंधी संन्धिवात की घोर पीड़ा में वैद्य द्वारा कोकीन का पाउडर दे देना भी कम आश्चर्य में नहीं डालता। हालांकि इससे इन्हें आराम भी मिला। अपने कैंसर के ऑपरेशन के दौरान ‘हेलुसिनेशन’ जिसे एनेस्थीसिया की भारी मात्रा का कारण बताया गया लेकिन लेखिका इसे अपने पूर्वजन्म का संकेत मानती हैं जो गांधी की मृत्यु के बाद भी इन्हें हुआ था। इस प्रसंग को पढ़ना विस्मित करता है।

अपनी छोटी बहन के घर ओस्लो नार्वे की यात्रा के दौरान दो सौ नग्न मूर्तियों का पार्क जिसे अम्मा ने ‘नंगया द पार्क’ की संज्ञा दे दी।और अम्मा कहती भी क्या…. पत्थरों पर तराशी ऐसी मूर्तियां कम से कम भारत के पार्कों में तो नहीं दिखतीं। सार्वजनिक स्थलों को ऐसी मूर्ति कला से दूर रखा जाता है। नार्वे के तट पर फ्योडर्स (गहरी संकरी खाइयों) को देखना अवश्य ही लोमहर्षक रहा होगा। इसी सिलसिले में आपको कुछ और देश की यात्राएं करने का मौक़ा मिलता है।आयरलैंड- स्वीडन- डेनमार्क की यात्रा के दौरान लैपटॉप और पावर डिस्क का सिक्योरिटी चेक में फंसे रह जाना लेखिका के लिए रंग में भंग के जैसा परेशान कर देने वाला अनुभव रहा।पाठक भी सोचने लगा कि जाने अब क्या होगा? इटली-बोलोनिया( बोलोन)-फ्लोरेंस और वेनिस। हर जगह की भाषा अपने आप में कितनी अजीबो ग़रीब होती है जैसे -इटली में होटल को एलबर्गो, प्लेटफार्म को बिन और स्टेशन को स्टेजियान कहते हैं। महान चित्रकार माइकल एंजेलो, लियोनार्दो डा विंची, प्रसिद्ध कवि दांते और खगोल शास्त्री गैलीलियो का शहर फ्लोरेंस कला का प्रमुख केंद्र है। नहरों पर बने पुल, पुलों पर बने छोटे-छोटे बाज़ार और बाज़ार में घूमते सैलानी। मठों, महलों, चर्चों की दीवारें चित्रकला से अटी हुईं ।भाषा का संकट था ही, इसलिए मैनेजर सुबह नींद से जगाए कि न जगाए इसलिए लेखिका तकिए से कहकर सोईं और समय पर जाग भी गईं। यह बड़ा पुराना टोटका है ऐसे ही इनकी भाषा में भी कई प्रचलित ख़ानदानी बोलचाल के शब्दों का प्रयोग हुआ है जो अब सुनाई नहीं देते। वेनिस यानी वेनेज़िया जहां दो सौ नेहरों के ज़रिए यातायात केवल नौकाओं से होता है।एक सौ बीस द्वीपों के ऊपर बसा वेनिस शहर मानो समुद्र से जन्मा हो।छोटे से वेनिस में चौतीस संग्रहालय तथा आठ नाट्यशालाएं हैं और हाथ की सफाई (जेब कतरी) ऐसी कि हाथ चूमने के बहाने कलाई घड़ी गायब कर दें और इसे नाम दें ‘इटालियन जॉब’ का।

अब चलते हैं भारत के राजभवन कोलकाता की सैर करने। 1870 में स्थापित इस भवन की भव्यता व वास्तुशिल्प की ख़ूबसूरती के साथ राजसी आथित्य ने लेखिका को निहाल कर दिया। प्रसिद्ध ठुमरी गायिका गिरिजा देवी से भेंट, पुराना चिड़ियाघर, साइंस सिटी, शांतिनिकेतन इत्यादि लेखिका के जीवन की महत्वपूर्ण यादों में प्रमुख स्थान पर है और रहेंगे। इनका वर्णन पढ़कर ही सच्चा आनंद लिया जा सकता है। इसके अलावा जिन लोगों का पुस्तक में ज़िक्र हुआ है उनमें ख्यातिनाम- नरेंद्र कोहली, विनम्र और बड़े व्यक्तित्व के मालिक- डॉ. कमल किशोर गोयनका, साहित्य पुरोधा- राम दरस मिश्र, प्रतिष्ठित लेखिका- चित्रा मुद्गल जिनकी फैन स्वयं लेखिका भी है और उन्हें एक साहसी और विदुषी महिला मानती हैं। इन सब के साथ बिताए अस्मरणीय पलों को अपने संस्मरणों में करीने से पिरोया गया है।

वैश्विक स्तर पर हुए साहित्य महोत्सव में भी दिव्या माथुर की महत्वपूर्ण भूमिका रही जैसे – बायादोलीद- स्पेन में भारत महोत्सव, यहां पर कला, संस्कृति, संगीत और नृत्य का रोमांचक अनुभव रहा। उन्मेष अभिव्यक्ति का उत्सव- शिमला में भारतीय डायस्पोरा (भारत से बाहर बसे भारतीयों) के साथ सम्मेलन के सभी प्रमुख विषय ध्यानाकर्षित करते हैं मसलन-साहित्य और सिनेमा, विश्व की कालजयी कृतियां और भारतीय लेखन, आदिवासी भाषाओं में लेखन, विदेशी भाषाओं में भारतीय साहित्य, मीडिया और साहित्य, भारत में भक्ति साहित्य, अनुवाद के माध्यम से सांस्कृतिक एकता, मातृभाषा का महत्व, पूर्वोत्तर का साहित्य वाचिक महाकाव्य, प्रवासी भारतीय साहित्य, साहित्य और स्वाधीनता आंदोलन, भारतीय लोक साहित्य। विश्व रंग महोत्सव- भोपाल, इसमें तीस देशों के पांच सौ से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। पहली बार थर्ड जेंडर कवियों द्वारा एक काव्यसत्र भी आयोजित किया गया।मानबी बंद्योपाध्याय कॉलेज की पहली ट्रांसजेंडर प्रिंसिपल हैं उनके साथ दस कवियों का एक समूह था। वैश्विक चिंताओं, विश्व कविता आदि पर डेढ़ हज़ार लोगों का जमावड़ा और पंद्रह सौ लेखक, कलाकारों की भागीदारी उल्लेखनीय ही कही जायेगी।
जयपुर साहित्य उत्सव- साउथ बैंक दो लिपियों में लिखी जाने वाली एक ही भाषा- ‘ हिन्दी, उर्दू, हिन्दुस्तानी ‘पुस्तक का यह आलेख उन लोगों के दिमाग़ों के दरवाज़े खोलने के लिए महत्वपूर्ण है जो हिंदी- उर्दू को खांचों में बांटकर देखते हैं। दोनों भाषाओं की जड़ें एक ही साहित्यिक परंपरा में है; जिसे अमीर ख़ुसरो ने ‘हिंदी’ या ‘हिंदवी’कहा था जिसे हम ‘हिंदुस्तानी’ कहते हैं। पटना में आयोजित -ग्लोबल मीट यहां महामहिम राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम साहब को सुनना अप्रतिम अनुभव देता है तो खजुराहो- नृत्य महोत्सव शास्त्रीयता की छटा बिखेरता है।


भारोपीय हिंदी महोत्सव- लंदन, इसमें चौदह देश के नब्बे नामचीन साहित्यकारों ने भाग लिया। इतना बड़ा महोत्सव बिना किसी सरकारी या ग़ैर सरकारी संगठनों की वित्तीय सहायता के केवल वातायन के सदस्यों के द्वारा पैसा इकट्ठा करके किया जाना एक उपलब्धि मानी जानी चाहिए।
‘वातायन यूके’ द्वारा त्रिदिवसीय आयोजन की सफलता का श्रेय दिव्या माथुर पूरी टीम को देती हैं।यहां भी विषयों की चर्चा उल्लेखनीय है- सांस्कृतिक और व्यावसायिक क्षेत्र में अनुवाद, प्रवासी लेखन, यूरोप में हिंदी शिक्षण, साहित्य और सिनेमा। लगभग दो सौ पृष्ठों की इस किताब को पढ़ने से 20वीं और 21वीं दोनों सदी के भीतर आए बदलावों और महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विचार करने के लिए बहुत कुछ मिलता है। सबसे बड़ी बात हम इन संस्मरणों को वैसे ही आत्मसात कर सकते हैं जिस तरह लेखिका ने इसे जिया, महसूस किया और लिखा।भाषा की संप्रेषणीयता कहीं भी अवरोध पैदा नहीं करती ये भी इसकी सहज विशेषता है।

पुस्तक – क्लाइडोस्कोप: सतरंगी स्मृतियाँ

प्रकाशक -अद्विक पब्लिकेशन 

संस्करण-(2026) 

पटपड़गंज, दिल्ली 

मूल्य -₹350/-

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