राम-केवट प्रसंग – आचार्य हरि भारद्वाज

ram-kevat-prasang

भगवान राम सीता और लक्ष्मण जब अयोध्या से बन को चले,रास्ते में गंगा नदी पड़ी। राम ने केवट को कहा हमें पार उतार दो। केवट ने शर्त रखी के जब तक मैं तुम्हारे चरण कमल नहीं धो लूंगा तब तक तुम्हें नाव पर नहीं चढ़ाऊंगा। इस शर्त को राम ने…

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दुर्गा सप्तशती: ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी

Durga Saptshati, ashish mishra, namaste bharat

ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते।। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ नव दुर्गा की पूजा या नव रात्र के दिनों में – माँ दुर्गा की आराधना और “दुर्गा सप्तशती” के ये श्लोक ना सुनने में आए, ना पढ़ें जाएँ ऐसा…

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Radiant Smiles: Bringing Hope and Happiness to Underprivileged Children

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Underprivileged Children supported by Radiant Smiles Community Events CIC. Every child deserves a chance to dream and the tools to chase that dream. For the many children in Delhi and Odisha who have grown up without parents or without means, that chance does not come automatically. Radiant Smiles Community Events…

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पुस्तक समीक्षा: क्लाइडोस्कोप: सतरंगी स्मृतियां : ख़ुदेजा ख़ान

khudeja khan

ज़िन्दगी के साथ क़दमताल करते यादों के कारवां  हर किसी के जीवन के अपने क्लाइडोस्कोप होते हैं लगातार रंग बदलते, आकृति ग्रहण करते, नये दृश्य गढ़ते हुए। इन रंगों, आकृतियों और दृश्यों में कितना कुछ घटित होता रहता है, निर्मित होता है,परिवर्तित होता है इसका लेखा-जोखा जब लिखा जाता है…

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यात्रा-वृत्तांत: जिब्राल्टर जलसंधि कराता ‘तान्जिर’ – डॉ. आरती लोकेश

aarti lokesh

तान्जिर शहर के नाम के उच्चारण में बहुत दुविधा थी। लैटिन में यह ‘टिंगिस’ था, पुर्तगाली भाषा में ‘टैंजेर’, स्पैनिश में टांजीर, फ़्रैंच में ‘तान्जे’, अंग्रेज़ी में आने के बाद ‘तान्जीयर’ जैसा हो गया। इसका अरबी नाम ‘तंजाह’ है। सभी विदेशी इसे तान्जिर कहते हुए मिले तो वही हमने भी…

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दो ग़ज़लें : बलजीत सिंह ‘बेनाम’

baljeet singh benaam

1. तुम्हारी यादें इनकी ज़ेबों में हरदम कंगाली है भिखमंगों की यार कहाँ दीवाली है। जागी आँखों से मैंने सपना देखा हर इक चेहरे पर छाई ख़ुशहाली है किस पर अब विश्वास करें इस दुनिया में हर डाली को काट रहा ख़ुद माली है। जनता को बहकाता झूठे वादों से…

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कविता: ये मोहब्बतें पुरानी-सी – विवेक दाधीच

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letterbox के ज़माने कीये मोहब्बतें पुरानी-सीकिसी ख़ुशबू वाली चिट्ठी-सीकिसी भीगी शाम सुहानी-सी एक काँपते हाथ को थामतादूसरा काँपता हाथदोनों काँपते हाथअब काँपते साथ साथऔर यूँ बटोर के भरोसाचलते कदम बा कदमएक slow, romantic beautiful कहानी सीletterbox के ज़माने कीये मोहब्बतें पुरानी-सी चमकते बाल, झूलते गालटिमटिमाती आँखें, आँखों मे सवालजैसे की…

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चार ग़ज़लें – गिरीश पंकज

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जहाँ कभी था वहीं आज जहाँ कभी था वहीं आज वो कुंठित बेचाराअपने में ही घुलता रहता चिंतित बेचारा जीवन भर नाकाम रहा बस इसीलिए अब तोदेख किसी की असफलता को हर्षित बेचारा देख ज़माने की उपलब्धि राख हुआ जाएइसलिए खुद उपलब्धि से वंचित बेचारा दूजों को निपटाना है पर…

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कवयित्रि: एक माँ एक कुम्हार – अंकिता साहिबा

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बहुत सारे लोग पूछते हैं – कैसा चल रहा है आपका पोस्टपार्टमऔर मदरहुड का सफ़र?शिक़ायतें तो बहुत हैं, मगर ज़िंदगी से कोई शिक़ायत नहीं।क्योंकि इस बार हमने कुम्हार का क़िरदार निभाया है।एक नन्हे से जीवन को आकार दिया है,उसे गढ़ा है, सँवारा है और अब उसे बेहतर बनाने में व्यस्त…

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कविता: मीरांगिणी – प्रदीप अग्रवाल 

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ए मेरी मीरांगिणीइतना भी न कर प्रेम मुझसेकि मेरे मौन को फिर सेस्वर लेना पड़ जाए। ए मेरी मीरांगिणीइतना भी न कर प्रेम मुझसेकि फिर से मुझेअवतार लेना पड़ जाए। अंतरा १ (कृष्ण) मैं जो सर्वत्र हूँ, अनाम हूँतेरी एक दृष्टि में ठहरता हूँ।तेरी भक्ति के तप मेंनिराकार होकर भीछाया…

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