कविता: “पाँव” – डॉ नंदिता साहू

भीड़ से भरे रास्ते पर चलते है 

कई जोड़ी पाँव

कोई रफ़्तार से भागता हुआ

ज़िन्दगी की राह को नापता हुआ।

कोई नपे तुले अंदाज़ में

सफ़र काटता हुआ।

किसी के संग एक जोड़ी पाँव और है

सफ़र ख़त्म ना हो, इस आस में टहलता हुआ।

एक जोड़ी पाँव ऐसा भी जो बमुश्किल चल रहा है

कदम कदम को अपने मानो गिन रहा है।

एक आलता लगाये पाँव की जोड़ी

दौड़ रही है एक नन्हें पावों की जोड़ी के पीछे

और आस – पास के कुछ जोड़ी पाँव

भी उसे लपकने को ललायित

अपनी लय तोड़ चुके हैं।

और एक पाँव धूल में लिपटा

जो अभी उठकर खड़ा हुआ है

सहारा लेकर काठी का

दे रहा है दुआएँ हर आते-जाते उन जोड़ीदार पावों को

जिन्होंने क़ीमत नहीं पहचानी है उन पाँवों की।।

nandita sahu

डॉ नंदिता साहू

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