मुझे याद है
माँ रोज़ फ़ोन करती थी
और एक ही सवाल पूछा करती थी-
तू कैसा है ?
कविता
ब्रह्मांड
अद्भुत है दास्तान सृष्टि के निर्माण की
सर्वव्यापी विश्व में असीम ब्रह्मांड की।
वही ब्रह्मांड भीतर खिला है जो विस्तृत है बाहर
विस्मित हृदय पूछे कौन है यह विचित्र सृजनहार
अधूरी आस – नीतू सिन्हा “नीत”
इक आस हरदम ही बे-आस रही
मैं ताउम्र खुद की बनकर प्यास रही
जुबां पकी इतनी कि सड़ने लगी
तबियत में सभी के मगर खटास रही
ख़्वाब चला गया – जितेंद्र गुप्ता | कविता
ख़्वाब चला गया
आँख खुली तो, फिर ख़्वाब चला गया,
जी बहलाने का एक, बहाना चला गया।
याद रहता नही कुछ भी, अब यादों के सिवा,
यादों में खोकर, जीने का सहारा रह गया।
राष्ट्रकवि – मैथिलि शरण गुप्त
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को
आशीष मिश्रा की कवितायेँ
समय बहुत सा बीत गया
समय बहुत सा बीत गया
बहुत समय था रीत गया।
अनुभव आपहि बोलेगा
क्या हारा क्या जीत गया।।