सुनो बेटा!
क्या मम्मी, सुबह सुबह!
सुनिये
शाम को बात करते हैं।
बेटा,
अरे अभी-अभी तो घुसा हूँ घर में
सुनिये
चाय तो शांति से पी लेने दो
बे
माँ प्लीज़,
कम से कम रात को तो
सु नि ये
तुम्हें कुछ काम नहीं है क्या?
कितना बोलती हो?
एक धीमी प्रक्रिया चल रही है
संवाद शेष हो चुका है
पलायन
ग़लत है,
बिल्कुल ग़लत!
पर,
तुम्हारी दृष्टि से परे।
शुतुरमुर्ग बनकर
कब तक रहोगे मित्र।
अंधकार को सच,
कब तक कहोगे मित्र।
सूर्य की चमक
नहीं करेगी
तुम्हें अंधा
धीरे-धीरे,
छँट जायेगा
सारा अँधेरा।