9 August 2026 | Sunday | रविवार | श्रावण | एकादशी | विक्रम संवत 2083

मातृभूमि से दूर बसने की व्यथा

जन्मभूमि माँ !
तू वहां मैं यहाँ।
तुझ से दूर इस विदेश में बस कर
जीती हूँ हर पल तेरा ही नाम लेकर
बरसों बीत गये बिछड़े गोद से तेरी
फिर भी लगता है  तू हरदम है पास मेरी
क्या इसी को कहते हैं जन्म-जन्म का नाता


सात समुन्दर पार जाकर भी जो टूट नहीं जाता
इसीलिए तो कभी एकाकीपन मुझे नही काटता
तेरी यादों की सवारी पर तय जो करती हूँ रास्ता।
जन्मभूमि माँ, क्यों होती हैं स्मृतियाँ तेरी सदा सुख की
आँचल में तेरे रह कर भी काटी हैं घड़ियां मैंने दुख की।

विविधतापूर्ण है मेरे देश का रंग, रूप व धार्मिक आस्थाएं
मेरे भारत की एकता के अनोखेपन की यही हैं विशेषताएं
विश्व के देश-विदेशों का करती हूँ यात्रायें मैं जब भी
नहीं दिखता मेरे  देश भारत से बेहतर कोई कभी भी
दुख में हो या सुख में जब तेरी याद में बेचैन होती हूं मैं
तभी जन्मभूमि तेरी गोद में समाने के लिए तड़पती हूं मैं
प्रवास में रहने की क्या यही होती है वेदनादायक सज़ा
अन्यथा क्यों नहीं ले सकती हूँ मैं, रहकर प्रवास का पूरा मज़ा।

– पाॅपी डे उर्फ अपरूपा बसु डे

Leave a Comment