जब कार्य ही विश्राम हो
और गति ही आराम हो।
श्री राम जैसा संघर्ष हो
श्री कृष्ण जैसा विमर्श हो।।
जब हनुमान जैसी वीरता हो
और अर्जुन जैसी एकाग्रता हो।
तब जीत का संशय कहाँ?
और हार का भी भय कहाँ?
जब कर्त्तव्य ही पूजा हो
और ध्येय ही मंज़िल हो।
जब संघर्ष ही एषणा हो
और चुनौती ही प्रेरणा हो।
जब बढ़ते कदम एक आस हो
और आत्मशक्ति ही विश्वास हो।
तब गंतव्य पाने का संशय कहाँ?
और कुछ खोने का भय कहाँ?
जब परमार्थ ही सुपथ हो
और कर्म ही स्वधर्म हो।
जब शौर्य-धैर्य सुमंत्र हो
और पथ स्वयं गंतव्य हो।।
जब अर्जुन-सा लक्ष्य हो
और अभिमन्यु सा साहस हो।
तब विजयरथ रुकता कहाँ?
और सम्मान फिर झुकता कहाँ?