प्राण हो तुम तिरंगे के तुमको नमन।
आज स्वाधीन तुमसे हमारा वतन।।
चूम फाँसी का फन्दा मिटे देश पर।
काला पानी सहे न थके लेश भर।
सिर झुके हैं हमारे करें आचमन।
poem
कोई मुझे सिखला देना – अतुल पुष्करणा
आध्यात्मिक बने हम कैसे, कोई मुझे सिखला देना।
मन में ज्ञान का दीपक या, भक्ति का सूर्य जला देना।।
ब्रह्मांड
अद्भुत है दास्तान सृष्टि के निर्माण की
सर्वव्यापी विश्व में असीम ब्रह्मांड की।
वही ब्रह्मांड भीतर खिला है जो विस्तृत है बाहर
विस्मित हृदय पूछे कौन है यह विचित्र सृजनहार
ख़्वाब चला गया – जितेंद्र गुप्ता | कविता
ख़्वाब चला गया
आँख खुली तो, फिर ख़्वाब चला गया,
जी बहलाने का एक, बहाना चला गया।
याद रहता नही कुछ भी, अब यादों के सिवा,
यादों में खोकर, जीने का सहारा रह गया।