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ख़्वाब चला गया – जितेंद्र गुप्ता | कविता

ख़्वाब चला गया

आँख खुली तो, फिर ख़्वाब चला गया, 
जी बहलाने का एक, बहाना चला गया। 
याद रहता नही कुछ भी, अब यादों के सिवा,
यादों में खोकर, जीने का सहारा रह गया। 



हर तस्वीर में देखता हूँ तेरा चेहरा, 
तेरे ख़्वाबों को अपना बनाता चला गया। 
ख़्वाबों में मेरे आकर, तेरा हँसना, 
तन्हाई में मुझको, दीवाना बना गया। 

ग़म भी नहीं कोई यहाँ, पर खुशियाँ भी नहीं, 
बस एक-एक करके सब, यारो का साथ भी चला गया। 
छुपाई ना गई मुझसे, मेरे दिल की ये हालत, 
तेरे लिए सपनों की, दुनिया बनाता चला गया। 

सिर्फ़ दिल ही था मेरा, सबसे बड़ा ख़ज़ाना, 
उसे भी मैं तुझ पर, लुटाता चला गया। 
पता नहीं क्यों मैं तेरे ख़्वाबों को, 
अपना बनाता चला गया।

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