कमज़ोर जितनी चाह होती है
दूर उतनी ही राह होती है
पंछी उड़ते हैं आसमानों में
पर ज़मीं पे निगाह होती है
आदमी रहता है ज़मी पे मगर
आसमानों की चाह होती है
जिंदगी बुलबुले सी इंसा की
आरज़ू बेपनाह होती है
दायरा ग़म का जितना लम्बा हो
उतनी लम्बी ही आह होती है
जो भी आता है ठहर जाता है
सियासत ऐशगाह होती है
कपिल कुमार