मुझे याद है
माँ रोज़ फ़ोन करती थी
और एक ही सवाल पूछा करती थी-
तू कैसा है ?
खाना समय पर खाता है कि नहीं?
क्यों इतना दुबला हो गया है ?
कुछ अपना भी ख्याल रखा कर ?
इधर बहुत लापरवाह हो गया है तू
और मैं काम की व्यस्तता
की वजह से
झुँझला जाता था
बीच में बात काट देता था
यह कह कर कि-
‘बाद में फ़ोन करता हूँ ना’
और यह बाद कभी नहीं आता था
उससे वायदे करने के बाद भी
उसे बाद में फ़ोन नहीं कर पाता था
कि उसकी बात सुन सकूँ
अपनी ख़ैरियत बतला सकूँ
माँ ‘हैं’ से ‘थीं’ हो गईं हैं
मेरी ज़िंदगी में अवसाद बो गई हैं
मेरा फ़ोन अब भी रिंग करता है
पर मैं उसकी वह बातें सुन नहीं पाता हूँ
मेरी माँ की वह प्यार भरी आवाज़
कौन पूछेगा मेरी सलामती को आज
आज मैं संजीदगी से महसूसता हूँ कि
काश! मैंने उसकी बातें सुनी होती
उसके नेक इरादे को समझा होता
उसपर अमल किया होता
तो यह आत्मग्लानि तो नहीं होती कि
माँ को मैंने समय रहते समय नहीं दिया
अपनी मनमानी की
उस निःस्वार्थ प्यार-दुलार
और माँ की ममता को
हमेशा के लिए खो दिया !
डॉ. कृष्ण कन्हैया