अद्भुत है दास्तान सृष्टि के निर्माण की
सर्वव्यापी विश्व में असीम ब्रह्मांड की।
वही ब्रह्मांड भीतर खिला है जो विस्तृत है बाहर
विस्मित हृदय पूछे कौन है यह विचित्र सृजनहार
जो सूक्ष्मता में है वही असीम में भी समाया है
निर्लेप प्रभु , अतुल्य , गहन यह तेरी माया है
आंतरिक कोमलता से हुई दिव्यता अर्जित
निश्चल व्यवहार से है व्योम भी सुगंधित
स्वर्णिम सूर्य करें सौरमंडल को प्रकाशित
चमकता चंद्र हुआ है हर ग्रह पर विराजित
युगों युगादि से खोज रहे विद्वान
ब्रह्मांड की व्यापकता का ढूंढ रहे प्रमाण
जीवन के मूल आधार और ब्रह्मांड का रिश्ता अनूप
‘रूही’ समझे बस इतना इस व्यापकता का मानव ही एक प्राणी प्रतिरूप
वंदना “रूही” खुराना