प्रेम की भी पोषक हैं यादें
कभी बरसती भरी दुपहरी
कभी टपकती हैं शामों में
उछल कूद करतीं हृदय में
कभी निलय से आलिंदो में
…….
द्वदं की उद्घोषक हैं यादें
कभी किसी चेहरे पर रूककर
किसी बात में मिलें ठहरती
जो क्षण जीकर भूल चुके हम
उसकी प्रतियां लाकर रखतीं
……..
पीर सी इक शोषक हैं यादें
बौराई फिरती सावन में
बारिश के उस इंतज़ार में
कभी भाप बनकर उड़ जातीं
कभी खड़ी मिलती कतार में
……..
कितनी अवशोषक हैं यादें!
-पूजामिश्रा