जो जितना बड़ा धूर्त, उसके व्यवहार में उतनी विनम्रता नज़र आएगी। उसकी भाषा में उतना ही लालित्य होगा । लोग चकित हो जाएंगे, अरे! यह कितना महान व्यक्ति है। लेकिन जैसे ही लोग उनसे रू-ब-रू मिलेंगे, सारा भ्रम जाता रहेगा। इस अकाट्य सत्य को अगर आज के कॉर्पोरेट और सोशल मीडिया के दौर में देखें, तो यह धूर्तता एक बकायदा ‘कला’ का रूप ले चुकी है। आजकल बाज़ार में ‘सच्चाई’ का भाव टमाटर से भी सस्ता चल रहा है, और ‘विनम्रता’ का भाव आसमान छू रहा है। नियम बड़ा सीधा है—भीतर जितना बड़ा खोखलापन होगा, बाहर उतनी ही चमकीली पैकेजिंग होगी।
एक सज्जन हैं। नाम है उनका, श्रीमान विनीत कपटी। विनीत नाम तो अच्छा है लेकिन बाद में उनके आचरण को देखकर लोगों ने उन्हें कपटी कहना शुरू कर दिया। विनीत जी जब सोशल मीडिया पर लिखते हैं या मंच से बोलते हैं, तो उनकी भाषा में इतना लालित्य, इतना रस और इतनी शालीनता होती है कि सुनने वाले को लगता है साक्षात् सरस्वती जी उनके कंठ में आकर बैठ गई हैं। उनकी हर दूसरी लाइन में सादर प्रणाम…आपका अनुज और वसुधैव कुटुंबकम् जैसे शब्द ऐसे तैरते हैं, जैसे चाशनी में डूबा रसगुल्ला। लोग भावुक होकर कहते हैं, “अहा!कलयुग में साक्षात देवता अवतरित हुए हैं ।”
उनकी इस अतिशय विनम्रता और ‘लल्लो-चप्पो’ भाषा से सम्मोहित होकर एक दिन हमारे सीधे-साधे शर्मा जी उनसे ‘रू-ब-रू’ मिलने पहुँच गए। शर्मा जी को लगा था कि वहां जाते ही विनीत जी बोल उठेंगे,
“अरे वाह शर्मा जी!आपकी आने से मेरी कुटिया पावन हो गई!” लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ ।शर्मा जी जैसे ही कपटी जी के आलीशान दफ्तर के केबिन में घुसे, सारा लालित्य धुआं हो गया। मंच पर “परहित सरिस धरम नहिं भाई” का पाठ पढ़ाने वाले विनीत जी, असल जिंदगी में अपने चपरासी पर चिल्ला रहे थे, “अबे गधे की दुम!चाय में चीनी कम है,तेरी सैलरी से कटूँगा ।”
शर्मा जी को देखते ही उनके चेहरे की वह ‘दिव्य मुस्कान’ ऐसे गायब हुई, जैसे पुलिस को देखकर जेबकतरा गायब होता है । कपटी जी ने शर्मा जी को ऊपर से नीचे तक घूर कर देखा और बेहद रूखे स्वर में बोले,”जल्दी फरमाइए, क्या काम है? मुझे कहीं निकलना है!”
शर्मा जी का मुँह खुला-का-खुला रह गया। उनका वो ‘महान व्यक्ति’ वाला भ्रम चंद सेकेंडों में वैसे ही टूट गया जैसे शीशे का गिलास पत्थर से टकराकर टूटता है।
लौटते वक़्त शर्माजी सोच रहे थे, अतिशय विनम्रता और भाषा का लालित्य एक प्रकार का ‘सुरक्षा कवच’ है। धूर्त लोग जानते हैं कि अगर वो सीधे बात करेंगे, तो उनका असली चेहरा,जो कि काफी बदसूरत है, तुरंत दिख जाएगा। इसलिए वे शब्दों का ऐसा इत्र छिड़कते हैं कि सामने वाले को उनकी भीतरी दुर्गंध का अहसास ही न हो। इसलिए हुजूर, अगली बार जब कोई आपसे ज़रूरत से ज़्यादा झुककर बात करे, उसकी भाषा में शहद से ज़्यादा मिठास हो, और वह बात-बात पर खुद को आपका ‘दास’ बताए… तो समझ लीजिएगा कि जेब कटने वाली है या फिर कोई बहुत बड़ा चूना लगने वाला है!
गिरीश पंकज