जो जितना बड़ा धूर्त, उसके व्यवहार में उतनी विनम्रता नज़र आएगी। उसकी भाषा में उतना ही लालित्य होगा । लोग चकित हो जाएंगे, अरे! यह कितना महान व्यक्ति है। लेकिन जैसे ही लोग उनसे रू-ब-रू मिलेंगे, सारा भ्रम जाता रहेगा। इस अकाट्य सत्य को अगर आज के कॉर्पोरेट और सोशल मीडिया के दौर में देखें, तो यह धूर्तता एक बकायदा ‘कला’ का रूप ले चुकी है। आजकल बाज़ार में ‘सच्चाई’ का भाव टमाटर से भी सस्ता चल रहा है, और ‘विनम्रता’ का भाव आसमान छू रहा है। नियम बड़ा सीधा है—भीतर जितना बड़ा खोखलापन होगा, बाहर उतनी ही चमकीली पैकेजिंग होगी।