जहाँ कभी था वहीं आज
जहाँ कभी था वहीं आज वो कुंठित बेचारा
अपने में ही घुलता रहता चिंतित बेचारा
जीवन भर नाकाम रहा बस इसीलिए अब तो
देख किसी की असफलता को हर्षित बेचारा
देख ज़माने की उपलब्धि राख हुआ जाए
इसलिए खुद उपलब्धि से वंचित बेचारा
दूजों को निपटाना है पर खुद ही निपट रहा
अकसर होता रहता है बस खंडित बेचारा
अपने भीतर कभी न झाँका है उसकी आदत
दूजों की कमियाँ बस करता संचित बेचारा
कुंठा और घृणा ही उसके जीवन का संचय
यही एक पूँजी कर पाया अर्जित बेचारा
अपनी ताकत देख न पाता भिड़ जाए सबसे
इसीलिए होता है भू पर लुंठित बेचारा
सच का नाम मिटा देते हैं
झूठे उसे हरा देते हैं
सच का नाम मिटा देते हैं
जो सच कहता है उसको अब
झूठे यहाँ सज़ा देते हैं
न्याय मिलेगा जल्दी कहकर
अकसर लोग हँसा देते हैं
अपने पर जब आती है तो
हम दो बात सुना देते हैं
थोड़ी-सी मुस्कान फेंक हम
बिगड़ी बात बना देते हैं
हम कमजोर नहीं दुश्मन को
फौरन मज़ा चखा देते हैं
कुछ रस्ते पर रखते पत्थर
पंकज उन्हें हटा देते हैं
यही लब्बोलुआब है
अपना सभी का बस यही लब्बोलुआब है
जब तक हमारी साँस है तब तक ही ख्वाब है
छोटा-सा पद है लेकिन रुतबा बहुत बड़ा
चेहरे पे उनके इन दिनों अलगई रुआब है
मेरी कमाई पूछते हैं लोग जब यहाँ
ईमान ही पूँजी है अपना ज़वाब है
उस आदमी को हम कहाँ पहचान पाएँगे
जिसका लिबास तो यहाँ केवल नकाब है
निर्धन भले है पंकज चेहरे पे तेज है
खुद्दार के हिस्से में रहता शबाब है
कोई भरम न पालो
जल्दी-जल्दी किसी को लेकर कोई भरम न पालो
वहम ज़हर के जैसा ही है पहले उसे निकालो
कुछ मजबूरी हो सकती है याद न वो कर पाया
चलो तुम्हीं ज़हमत थोड़ी- सी बढ़कर आज उठा लो
अपने जो होते हैं उनसे खेल कोई मत करना
रिश्ते क्या है काँच फ्रेम के इनको तनिक संभालो
मिलजुल कर के रहने का सुख पशु-पक्षी सिखलाते
ऊंच-नीच का चक्कर छोड़ो सबको गले लगा लो
राह कोई चलता गिर जाए उस पर मूरख हँसते
तुम इंसान अगर हो पंकज बढ़कर उसे उठा लो
