सात दिन, सात रंग – हिन्दी की ज्योति के संग: गुरुकुल यूके

लंदन। ब्रिटेन में हिंदी की अग्रणी संस्था “गुरुकुल यूके” ने शानदार कार्यक्रमों के विभिन्न सत्रों के साथ हिंदी पखवाड़े को मनाया। कार्यक्रम के कुछ सत्र ऑनलाइन हुए तो बहुत से अलग-अलग स्थलों में भी – ऐसा ही एक शानदार आयोजन लन्दन स्थित चेम्सफोर्ड में आयोजित हुआ। ये कार्यक्रम 19 से 26 सितम्बर तक आयोजित हुए जिसमें बच्चों से लेकर वरिष्ठ साहित्यकारों तक ने सहभागिता की। काव्य-पाठ, अंतरराष्ट्रीय परिचर्चाओं, हिन्दी अंताक्षरी और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से हिन्दी के विविध स्वरूप सामने आए।

पखवाड़े का शुभारंभ 19 सितम्बर को ब्रिटेन में रह रहे बच्चों के काव्य-पाठ से हुआ। बच्चों ने हिन्दी कविताओं के माध्यम से अपनी प्रतिभा और भाषा के प्रति लगाव को अभिव्यक्त किया। कार्यक्रम में डिप्टी हाई कमिश्नर (DHC) की गरिमामयी उपस्थिति ने बच्चों का उत्साह बढ़ाया। विदेश में हिन्दी सीख रही नई पीढ़ी के लिए उनका प्रोत्साहन विशेष प्रेरणादायी रहा।

20 सितम्बर को ब्रिटेन के कवियों ने अपनी रचनाओं से साहित्य के विविध रंग बिखेरे। हास्य, संवेदना, जीवन-दर्शन और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रचनाओं ने कार्यक्रम को जीवंत बनाया। इस अवसर पर डॉ. अनुराधा जी की उपस्थिति ने आयोजन की गरिमा बढ़ाई। पखवाड़े को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप देते हुए 21 सितम्बर को ‘विदेशों में देवनागरी लिपि—स्थिति, संभावनाएँ एवं चुनौतियाँ’ विषय पर परिचर्चा आयोजित की गई। नीदरलैंड्स, जर्मनी, क़तर और बुल्गारिया सहित विभिन्न देशों से जुड़े वक्ताओं ने देवनागरी के शिक्षण, वर्तमान स्थिति और भविष्य की संभावनाओं पर अपने अनुभव साझा किए।

22 सितम्बर को ‘ब्रिटेन में हिन्दी—वर्तमान स्थिति, चुनौतियाँ और भविष्य की संभावनाएँ’ विषय पर चर्चा हुई, जबकि 23 सितम्बर का आयोजन ‘भारतीय संस्कृति और हिन्दी’ को समर्पित रहा। वक्ताओं ने विदेश में हिन्दी के शिक्षण और प्रचार-प्रसार के साथ भारतीय संस्कृति और हिन्दी के परस्पर संबंध पर अपने विचार रखे। गंभीर साहित्यिक चर्चाओं के बीच 24 सितम्बर की हिन्दी अंताक्षरी ने आयोजन में संगीत और स्मृतियों का रंग घोल दिया। ब्रिटेन में रह रहे प्रतिभागियों ने हिन्दी गीतों के माध्यम से बीते दौर की यादों को फिर से जिया। कार्यक्रम ने यह भी रेखांकित किया कि प्रवासी जीवन में हिन्दी केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि स्मृतियों और सांस्कृतिक जुड़ाव का माध्यम भी है।

25 सितम्बर का दिन नई पीढ़ी की हिन्दी अभिव्यक्ति के नाम रहा। यूके में रह रहे बच्चों ने हिन्दी के प्रति अपने विचार और भावनाएँ साझा कीं तथा कविताओं की प्रस्तुतियाँ दीं। विदेश में पली-बढ़ी नई पीढ़ी को आत्मविश्वास के साथ हिन्दी में अभिव्यक्त होते देखना आयोजन का विशेष आकर्षण रहा।

पखवाड़े का समापन 26 सितम्बर को चेम्सफोर्ड में आयोजित समारोह एवं पुरस्कार वितरण के साथ हुआ। बच्चों और वयस्कों ने अपनी काव्य प्रस्तुतियों से कार्यक्रम को साहित्यिक रंग प्रदान किया। इस अवसर पर हिन्दी भाषा के शिक्षण, संरक्षण, सेवा और प्रचार-प्रसार में योगदान देने वाले समर्पित व्यक्तियों को गुरुकुल यूके की ओर से ‘हिन्दी संवाहक सम्मान’ प्रदान किया गया। आयोजन में भारतीय उच्चायोग का सहयोग और प्रोत्साहन महत्वपूर्ण रहा। विशेष रूप से बच्चों के कार्यक्रम में DHC की उपस्थिति ने विदेश में हिन्दी सीख रही नई पीढ़ी का मनोबल बढ़ाया। पूरे पखवाड़े में डॉ. अनुराधा जी की निरंतर सहभागिता भी उल्लेखनीय रही। उनका मार्गदर्शन, स्नेह और प्रोत्साहन आयोजकों एवं प्रतिभागियों के लिए संबल बना। गुरुकुल यूके ने आयोजन से जुड़े सभी वक्ताओं, कवियों, विद्वानों, बच्चों, अभिभावकों, सहयोगियों और हिन्दी प्रेमियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

सात दिनों का यह आयोजन केवल हिन्दी दिवस मनाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके केंद्र में यह विचार रहा कि विदेश में हिन्दी की वास्तविक निरंतरता तभी संभव है जब नई पीढ़ी भाषा को केवल पढ़े नहीं, बल्कि उससे जुड़े, उसमें अपनी बात कहे और उसे अपनी सांस्कृतिक पहचान के एक जीवंत हिस्से के रूप में आगे बढ़ाए।

सात दिनों में हिन्दी का अनुपम संसार सजाया है

शब्द-शब्द में प्रेम का उजियारा फैलाया है।

यह अंत नहीं, नवयात्रा का मंगल आह्वान है

पीढ़ी-पीढ़ी हिन्दी पहुँचे बस यही अरमान है।।

इंदु बारोठ, गुरुकुल यूके

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