नेह का मंत्र लिख श्वाँस के दीप पर,
वर्तिका सम हृदय को पुरोहित करें ।
काव्य की सर्जना का दिवाकर उगा,
वेदना के तिमिर को तिरोहित करें ।।
हो जटिल वीथिका पर सशंकित हृदय,
भोर की दीप्त संभावना को गढ़ें ।
व्याकरण में न उलझे रहें देह की,
चित्त की सौम्य प्रस्तावना को पढ़ें ।।
शब्द की सीपियों में गहन अर्थ को,
साम्यता से निभाकर नियोजित करें ।
काव्य की सर्जना का दिवाकर उगा, वेदना के तिमिर को तिरोहित करें ।।
भाव का जब निरंकुश वृथा वेग हो,
अश्रुधारा नयन की नियंत्रित करें ।
बीज संवेदना का सुरक्षित रहे,
प्रार्थनाएँ हृदय मध्य संचित करें ।।
हर्ष का हो सदा ही सुलभ आगमन,
दुःख की योजना को विलंबित करें ।
काव्य की सर्जना का दिवाकर उगा, वेदना के तिमिर को तिरोहित करें ।।
प्रीत के दीप उर – देहरी पर जला,
सर्जना के महल हम सजाते रहें ।
काव्य की साधना में रहें लीन हम,
छन्द की ताल पर गीत गाते रहें ।।
काव्य उत्सव मना मंच पर हर्ष का,
ज्ञानदा मातु को हम विमोहित करें ।
काव्य की सर्जना का दिवाकर उगा, वेदना के तिमिर को तिरोहित करें ।।
संगीता चौबे ‘पंखुड़ी’