आज पिया मुझसे रूठ गए
अचानक ही अजीब अनोखी सी बातें करने लगे,
कहने लगे कि..
हर रोज़।
आँखों में सिर्फ काजल ही क्यों प्रिये
आत्म विश्वास की चमक क्यों नहीं,
अधरों पे सिर्फ लाली ही क्यों प्रिये
वाणी में अधिकारों की सुर्खियाँ क्यों नहीं।
वैसे तो..
हर कोई कहा करता है कि
चाँद सा सुंदर चेहरा हो तुम,
चाह यही है ये मेरी कि
अब से सूरज सा तेजस्वी मुखड़ा कहलाई जाओ तुम।
यूँ तो..
बालों की चाँदी ने दे दिया अनुभव भरपूर
सालों ने घड़ी की सुइयों पे भी चलती रही तुम,
पर करती रही अरमानों को अपने हमेशा चूर चूर
परिवार की खुशियों के लिए बस जो जीती रही तुम।
पहली बार उनकी ऐसी नाराज़गी से,
प्रफुल्लित थी पर हैरान भी,
न जाने कैसे पढ़ लिए उन्होंने,
मन की अलमारी में बंद अनकहे मेरे ख्वाबों के पत्र।
फिर उन्होंने कहा कि..
डायरी मिली मुझे तुम्हारी पिछले हफ्ते
किचन की एक दराज में चम्मच ढूँढ़ते ढूँढ़ते,
गला रुँध गया मेरा आत्मग्लानि से
आँखें भर आई हर पन्ना पढ़ते पढ़ते,
तुम प्रेम और समर्पण से परिवार बंधती रही
और मैं.. काम में मसरूफ
तुम्हारे सपनों को नज़रअंदाज़ करता रहा,
हर दुख में.. सुख में, धूप में.. छाँव में
जीवन के हर मोड़ पे,
अकेला नहीं खड़ा कभी मैं
क्योंकि तुम पास थी,
कमज़ोर नहीं पड़ा कभी मैं
क्योंकि तुम साथ थी।
ज़िंदगी हमारी तुमने संवारी है,
अब मेरी बारी है..
तुम्हारी आँखों में जो सपना है
वो आँखों तक नहीं रहना चाहिए,
साकार उन्हें करने के सफ़र में
मुझे फिर से तुम्हारा साथ चाहिए।
आज पिया मुझसे मेरे लिए ही रूठ गए..
अनकहे मेरे ख्वाबों को साथ जीने की बातें करने लगे।
रचनाकार – अंतरा राकेश तलम