इक आस हरदम ही बे-आस रही
मैं ताउम्र खुद की बनकर प्यास रही
जुबां पकी इतनी कि सड़ने लगी
तबियत में सभी के मगर खटास रही
ठीक उतनी ही दूरी रही दोनों में
जितनी कि मैं उसके आस पास रही
सँवारते रहे ताउम्र जिस्मों के मकाँ
रूहें सबकी ही मगर बे-लिबास रही
कैसे रखते ख्वाबों से रिश्ता कोई
आँखें ही नींदों से जब ना-शनास रही
मैं ठहरी दीवानी रजनीगंधा की और
उसकी पसंद सदा ही अमलतास रही
नीतू सिन्हा “नीत”