भगवान राम सीता और लक्ष्मण जब अयोध्या से बन को चले,रास्ते में गंगा नदी पड़ी। राम ने केवट को कहा हमें पार उतार दो। केवट ने शर्त रखी के जब तक मैं तुम्हारे चरण कमल नहीं धो लूंगा तब तक तुम्हें नाव पर नहीं चढ़ाऊंगा। इस शर्त को राम ने स्वीकार किया और बोले-
कृपासिंधु बोले मुसुकाई।
सोइ करु जेहिं तव नाव न जाई॥
बेगि आनु जलपाय पखारू।
होत बिलंबु उतारहि पारू॥
अच्छा भैया अब तुम जल्दी से हमारे चरण धो लोऔर हमें पार उतार दो। भला भगवान को कौन सी देर हो रही है। क्या भगवान को कोई रेल पकड़नी है या हवाई जहाज पकड़ना है। हाँ, उन्हें देर हो रही है। जितनी आतुरता भगवान से मिलने के लिए भक्त की होती है उससे अधिक आतुरता भगवान को होती है भक्त से मिलने के लिए। भगवान भी तो तरसते हैं अपने से दूर हुए भक्त को आलिंगन करने को। इसलिए वह कह रहे हैं कि “होत बिलंबु उतारहि पारू”। हमें देर हो रही है, तुमसे मिलने के लिए।

केवट ने काठ का एक बर्तन लिया और राम के चरण धोए । चरण धोने से जो चरणामृत बना उसे स्वयं पिया, बच्चों को पिलाया और अपने पितरों को भी छींटा दे दिया। भगवान का एक भक्त भी यदि परिवार में पैदा हो जाए तो सब को पर उतर देता है।

उतरि ठाढ़ भए सुरसरि रेता। सीय रामु गुह लखन समेता॥
केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा॥
नाव से पहले सीता जी, फिर राम, फिर निषाद और उसके बाद लक्ष्मण। यह हमें भी सीखना चाहिए। कभी रेल में चलें तो पहले स्त्री को चढ़ाएं फिर स्वयं चढ़ें। उतरे तो भी ऐसे ही उतरें। गोस्वामी जी ने बहुत सुंदर लिखा है। केवट उतरि दण्डवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा॥
भगवान को संकोच हुआ कि केवट को किराया तो दिया ही नहीं। वह तो खाली हाथ थे। कुछ लेकर नहीं आए थे।
पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी॥
कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई॥
अपने पति के मन की बात जानने वाली सीता जी ने अपनी हीरे की अंगूठी उतार कर दे दी। राम ने केवट को दी तो केवट ने भगवान के चरण पकड़ लिए। भगवान आज आपके चरण धोकर मुझे सबसे बड़ी मजदूरी मिल गई है। मेरे जन्म जन्म के दोष मिट गए हैं। मेरा दरिद्र समाप्त हो गया है। हे भगवान अगर आप देना ही चाहे तो जब आप लौट कर आयें तो आप जो भी दोगे मैं उसे स्वीकार कर लूंगा। इस बहाने से केवट कहना चाहता है कि कृपया चौदह वर्ष के बाद आएं तो मेरी ही नाव में आना। वह यह भी कहना चाहता है कि अब मैने आपको पार उतार दिया और जब मैं आपके द्वार पर आऊं तो आप मुझे पार उतर देना। केवट बहुत ही अनूठा भक्त है भगवान करे ऐसे भक्त प्रत्येक घर में पैदा हो।
आचार्य हरि भारद्वाज
लेखक, साहित्यकार
