शिखा वार्ष्णेय के प्रथम उपन्यास पर एक पाठकीय समीक्षा
हाल ही में शिवना प्रकाशन, मध्यप्रदेश से प्रकाशित शिखा वार्ष्णेय का पहला उपन्यास ‘अस्मि’ पढ़ा। जब पहली बार ‘अस्मि’ का नाम सुना, तो परिधि जैन का काव्य-संग्रह याद आया, लेकिन दोनों कृतियाँ अलग-अलग प्रकृति की हैं। शिखा मूलतः यात्रा-वृत्तांत, संस्मरण, कहानियाँ, कविताएँ तथा सामाजिक मुद्दों पर आलेख लिखती रही हैं। उपन्यास जैसी विस्तृत विधा में प्रवेश करना किसी भी लेखक के लिए एक चुनौती जैसा होता है। लेकिन लेखिका ने इसे बखूबी निभाया है। ‘अस्मि’ को पढ़ते हुए पाया, शिखा ने इस चुनौती के माध्यम से स्त्री के अस्तित्व से जुड़े एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न को कथा के केंद्र में रखा है।
‘अस्मि’ संस्कृत की अस् (होना) धातु का उत्तम पुरुष, एकवचन का रूप है, जिसका अर्थ है- मैं हूँ। अंग्रेज़ी में कहें तो I Am या I Exist। यह केवल अपने अस्तित्व की घोषणा नहीं, बल्कि अपने होने का बोध भी है। अस्म से ही ‘अस्मि’, ‘अस्मत’ और ‘अस्मिता’ जैसे शब्द बने हैं, अस्मि का एक अर्थ ‘कड़ा और मजबूत’ भी होता है। इस अर्थ में ‘अस्मि’ अस्मिहीन कथानायिका एला के अस्मिवान होने की कहानी भर नहीं है। यह उस स्त्री की कहानी है, जो पत्नी और माँ की भूमिकाओं में इतनी अधिक सिमट गई है कि धीरे-धीरे अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व को ही भूल बैठी है, या कहें कि उसे भुलवा दिया गया है। उसकी इच्छाएँ, रुचियाँ, आकांक्षाएँ और सपने परिवार की अपेक्षाओं के नीचे दबते चले गए हैं। वह घर में मौजूद है, सबकी जरूरतों का ध्यान रखती है, जिम्मेदारियाँ निभाती है, लेकिन क्या वह सचमुच वहाँ है? क्या उसके होने का कोई स्वतंत्र अर्थ भी है? यह प्रश्न उपन्यास के शीर्षक को गहरी अर्थवत्ता देता है। एला की यात्रा अपने भीतर की उस स्त्री से दोबारा मिलने की यात्रा है, जिसे उसने स्वयं भी लगभग भुला दिया था। वह अपने प्रति संवेदनहीन-सी हो चुकी है, लेकिन परिस्थितियाँ उसे फिर से एक जीवंत मनुष्य बनाती हैं। इस तरह यह एक कमजोर और दब्बू चरित्र के भीतर आत्मविश्वास तथा दृढ़ता पैदा होने की कहानी भी है। एक ऐसी स्त्री की कहानी, जो जीवन और मृत्यु के बीच से गुजरते हुए अपने भीतर के ‘अस्मि’ से मिलती है और अंततः अपने ‘इकिगाय’ तक पहुँचती है।

एला वनस्पति विज्ञान में स्नातक है और अपनी पढ़ाई में अव्वल रही है। उसे चित्रकारी का शौक है, बल्कि यह कहना अधिक उचित होगा कि चित्रकारी उसके व्यक्तित्व का ऐसा हिस्सा है, जिसे वह कभी पूरी तरह छोड़ नहीं पाई। उसकी शादी दिल्ली के एक संपन्न परिवार में हुई है। उसका पति राजीव एक सफल कारोबारी है, जिसके लिए पैसा, सामाजिक प्रतिष्ठा और भौतिक सुख-सुविधाएँ ही जीवन की सफलता के प्रमुख मानक हैं। एला अपने चौदह वर्षीय बेटे अंकुर, पति और ससुर के साथ रहती है। बाहर से देखने पर उसका जीवन किसी तरह की कमी से मुक्त दिखाई देता है। अच्छा घर, आर्थिक सुरक्षा, परिवार और सामाजिक प्रतिष्ठा- आखिर जीवन की सफलता के लिए इससे अधिक और क्या चाहिए? लेकिन इसी प्रश्न के भीतर उपन्यास की विडंबना छिपी है। किसी व्यक्ति के पास तमाम सुविधाएँ हो सकती हैं, फिर भी वह अपने ही जीवन में अनुपस्थित हो सकता है। एला के साथ भी कुछ ऐसा ही है।
कहानी की शुरुआत एक रोमांचक घटना से होती है। एला अपने पति और बेटे के साथ स्काई डाइविंग के लिए जाती है। पैराशूट में गड़बड़ी के कारण वह एक घने जंगल में गिर जाती है और बेहोश हो जाती है। कथानक की दृष्टि से यह घटना निर्णायक मोड़ का काम करती है। जिस स्त्री का जीवन अब तक दूसरों द्वारा तय की गई सीमाओं के भीतर चलता रहा है, वह अचानक ऐसी जगह पहुँच जाती है, जहाँ उसके परिचित संबंध, सामाजिक पहचान और रोजमर्रा की सुविधाएँ- सब उससे छिन जाते हैं। उसके सामने जीवन का एक बिल्कुल नया भूगोल है। यह दुर्घटना केवल एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच जाने की घटना नहीं, बल्कि एला के पुराने जीवन और संभावित नए जीवन के बीच की सीमा भी है।
जब उसे होश आता है, तो वह खुद को एक अनजान, खूबसूरत पहाड़ी गाँव ‘सनौली’ में पाती है। वहाँ की स्थानीय महिलाएँ- पीताम्बरी (कैजा), गीतु और हिरुली- उसकी जान बचाती हैं और कई दिनों तक उसकी देखभाल करती हैं। दूसरी ओर, राजीव और अंकुर पाँच दिनों तक तलाश करने के बाद यह मान लेते हैं कि एला की मृत्यु हो चुकी है। ठीक होने पर एला किसी तरह दिल्ली के एक होटल में रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम करने वाली अपनी दोस्त रेवा से संपर्क करती है। बातचीत के दौरान उसे पता चलता है कि उसके परिवार ने उसे मृत मान लिया है और धीरे-धीरे सब अपने-अपने काम में व्यस्त हो गए हैं। इस क्षण एला को अपने अस्तित्व की अनुपस्थिति का जो अहसास होता है, वह किसी दुर्घटना से कम भयावह नहीं है। जिस परिवार के लिए वह वर्षों तक जीती रही, उसकी दुनिया में उसके न रहने से कोई ऐसा खालीपन पैदा नहीं हुआ, जिसे भरा न जा सके। उसके जीवित होने की खबर मिलने पर भी क्या उसकी वापसी को उसी तरह स्वीकार किया जाएगा, जैसे किसी खोई हुई वस्तु के वापस मिल जाने पर उसे स्वीकार कर लिया जाता है? क्या परिवार को उसकी जरूरत है, या केवल उसके द्वारा निभाई जाने वाली भूमिकाओं की?
यहीं से एला के भीतर बदलाव शुरू होता है। वह सनौली में ही रहने का फैसला करती है। यह निर्णय पहली नजर में अव्यावहारिक, बल्कि कुछ हद तक अस्वाभाविक भी लग सकता है। एक संपन्न परिवार की स्त्री, जिसके पास दिल्ली में तमाम सुविधाएँ हैं, वह उन सबको छोड़कर ऐसे गाँव में रहने का निर्णय क्यों लेती है, जहाँ न शिक्षा की पर्याप्त व्यवस्था है, न आधुनिक सुविधाएँ और न ही मोबाइल नेटवर्क? लेकिन एला के निर्णय को केवल सुविधाओं के तुलनात्मक मूल्य से समझना संभव नहीं है। उसके लिए सनौली वह जगह बन जाता है, जहाँ उसे पहली बार अपने होने का एहसास होता है। दिल्ली में वह अपने परिवार के बीच रहकर भी अकेली थी, जबकि सनौली में अपरिचित लोगों के बीच उसे अपनापन मिलता है। यह विरोधाभास उपन्यास का एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न सामने रखता है- क्या घर वही है, जहाँ हम रहते हैं, या वह जगह है, जहाँ हमें अपने होने की स्वीकृति मिलती है?
एला का चरित्र ही उपन्यास का सबसे मजबूत पक्ष है। शुरुआत में वह एक ‘चलती-फिरती गुड़िया’ की तरह दिखाई देती है, जिसकी अपनी कोई स्वतंत्र इच्छा नहीं है। उसके पति को उसकी चित्रकारी का शौक भी पसंद नहीं है और वह उसका मजाक उड़ाता है। धीरे-धीरे एला अपने शौक से दूर होती चली जाती है। यह दूरी केवल चित्रकारी से नहीं, बल्कि अपने व्यक्तित्व के उस हिस्से से है, जिसमें उसकी वास्तविक खुशी बसती है। घरेलू जीवन में स्त्रियों के साथ अक्सर ऐसा होता है कि उनकी रुचियों को पहले गैरजरूरी बताया जाता है, फिर उन्हें समय की बर्बादी कहा जाता है और अंततः स्त्रियाँ स्वयं भी उन्हें अनावश्यक समझने लगती हैं। सबसे बड़ी विडंबना यही है कि कभी-कभी दूसरों द्वारा थोपी गई धारणा धीरे-धीरे हमारी अपनी धारणा बन जाती है।
सनौली पहुँचकर एला का अपनी कला से दोबारा जुड़ना इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि वह केवल चित्र बनाना शुरू नहीं करती, बल्कि अपने भीतर दबे हुए व्यक्तित्व को भी फिर से जगह देती है। प्रकृति के बीच रहकर उसके भीतर की कलाकार जागती है। वह आसपास के लोगों को समझती है और अपनी शिक्षा का उपयोग नए ढंग से करने लगती है। गाँव की हकीम आमा के संपर्क में आकर वह वनस्पति विज्ञान के अपने पुराने ज्ञान को फिर से व्यवस्थित करती है और उसे जीवन और समाज के लिए उपयोगी बनाती है। उपन्यास में जापानी जीवन-दर्शन ‘इकिगाय’ का समावेश इसी आत्मखोज को व्यापक अर्थ देता है। अरचु, गाँव का एक लड़का, एला को बताता है कि इकिगाय का अर्थ है- जीवन का वह उद्देश्य या मकसद, जो हमें रोज सुबह उठने की वजह देता है।
गाँव के बच्चों को पढ़ाना, लोगों की मदद करना, चित्र बनाना और प्रकृति के साथ समय बिताना- इन गतिविधियों में एला को वह आनंद मिलने लगता है, जो उसके पहले के जीवन में कहीं खो गया था। एला का सनौली में रहना केवल उसके व्यक्तिगत जीवन को नहीं बदलता, बल्कि गाँव के जीवन में भी सकारात्मक परिवर्तन लाता है। वहाँ एक छोटा डाकघर खुल जाता है, बच्चों की पढ़ाई में सुधार आता है और विदेशी सैलानियों का आना भी बढ़ जाता है। एला बच्चों को पढ़ाने लगती है, जिससे वे हाईस्कूल की परीक्षाओं में पहले की तुलना में कम फ़ेल होने लगे हैं। कहानी में रियो और जे यानी जागृति के माध्यम से लेखिका ने सामाजिक स्वीकृति तथा व्यक्ति की स्वतंत्र पहचान से जुड़ा एक और संवेदनशील मुद्दा उठाया है। रियो को उसके माता-पिता ने उसकी अलग (समलैंगिक) रुचियों और व्यक्तित्व के कारण विदेश भेज दिया था। एला और रियो के अनुभव एक जैसे नहीं हैं- एला का संघर्ष विवाह और पारिवारिक भूमिकाओं में अपने व्यक्तित्व के लोप से जुड़ा है, जबकि रियो का अनुभव अपनी लैंगिक पहचान और सामाजिक स्वीकृति के प्रश्न से संबंधित है। फिर भी दोनों के अनुभवों के बीच एक साझा सूत्र है- किसी दूसरे व्यक्ति को यह तय करने का अधिकार क्यों हो कि हमें किस तरह का जीवन जीना चाहिए?
राजीव का घर सुविधाओं से भरा हुआ है, लेकिन वहाँ अपनापन नहीं है। राजीव का चरित्र मुझे लगभग एक असंवेदनशील खलनायक जैसा लगा। वह एला को एक स्वतंत्र व्यक्तित्व वाले मनुष्य की तरह देखने में असमर्थ है। उसकी दृष्टि में पत्नी का महत्त्व काफी हद तक उसके द्वारा निभाई जाने वाली घरेलू भूमिकाओं से निर्धारित होता है। उसके व्यवहार से पितृसत्तात्मक मानसिकता का वह रूप सामने आता है, जिसमें पुरुष की इच्छाओं और निर्णयों को स्वाभाविक माना जाता है, जबकि स्त्री की इच्छाओं को गैरजरूरी या अव्यावहारिक समझ लिया जाता है। लेकिन निजी तौर पर मुझे राजीव के चरित्र में किसी एक सकारात्मक पहलू का न होना थोड़ा खटकता है। यदि उसमें कुछ मानवीय कमजोरियाँ, कोई भावनात्मक द्वंद्व या अपने व्यवहार को लेकर कभी-कभार आत्मसंदेह भी दिखाई देता, तो उसका चरित्र अधिक जटिल और ज्यादा वास्तविक बन सकता था। इससे एला का संघर्ष भी अधिक प्रभावशाली हो सकता था। अंकुर का किरदार इस संदर्भ में उम्मीद जगाता है। वह नई पीढ़ी का प्रतिनिधि है। शुरुआत में वह अपनी माँ को मुख्यतः एक गृहिणी के रूप में देखता है, लेकिन सनौली में एला के नए जीवन और उसकी खुशी को समझने के बाद उसके दृष्टिकोण में बदलाव आता है। वह यह समझने लगता है कि उसकी माँ का जीवन केवल उसके माँ होने तक सीमित नहीं है। उसके भी अपने सपने, रुचियाँ और इच्छाएँ हैं।
उपन्यास के अंत में अंकुर का पत्र इस बदलाव को और अधिक अर्थपूर्ण बना देता है। वह एला को लिखता है कि वह अपनी गर्लफ्रेंड सृष्टि के साथ ग्रीस जा रहा है। सृष्टि को भी प्राकृतिक जगहें पसंद हैं। वह जहाँ कागज और पेंसिल देखती है, वहीं पेड़, पहाड़, झरने और नदियाँ बनाने लगती है। इस छोटे-से प्रसंग में मुझे उपन्यास की एक बड़ी संभावना दिखाई देती है। अंकुर अपनी माँ के भीतर की कलाकार को समझने लगा है और अब वह सृष्टि की रुचियों को भी सहजता से स्वीकार करता है। यह दिखाता है कि पिछली पीढ़ी की तुलना में नई पीढ़ी अधिक संवेदनशील हो रही है। मुझे लगता है कि उपन्यास का अंत थोड़ा और विस्तार माँगता है। पढ़ते-पढ़ते अचानक पाँच साल के समयांतराल का उल्लेख आता है और उपन्यास समाप्त हो जाता है। पाठक के मन में स्वाभाविक रूप से कई प्रश्न उठते हैं। इन पाँच वर्षों में एला और अंकुर के संबंधों में क्या बदलाव आए? क्या राजीव कभी एला के निर्णय को समझने की कोशिश करता है? क्या एला का सनौली में बस जाना स्थायी रूप से उसके जीवन का हिस्सा बन जाता है? इन प्रश्नों के उत्तर देना अनिवार्य नहीं था, लेकिन इनमें से कुछ को विस्तार मिलता तो अंत अधिक संतोषजनक हो सकता था। इसी तरह, जागृति यानी जे और रियो की कहानियों को भी कोई स्पष्ट परिणति दी जा सकती थी। इन पात्रों की उपस्थिति पाठक के मन में उत्सुकता पैदा करती है, लेकिन आगे चलकर वे बिना किसी स्पष्ट निष्कर्ष के कथा से लगभग लोप हो जाते हैं। लगता है कि लेखिका का ध्यान एला के चरित्र को सँवारने में इतना अधिक केंद्रित हो गया है कि अन्य पात्रों को उतना विस्तार नहीं मिल पाया, जितनी संभावनाएँ उनके भीतर थीं।
अरचु का चरित्र भी इसी संदर्भ में याद आता है। वह गाँव में दुकान चलाने वाला एक लड़का है, जिसे किताबें पढ़ने का शौक है। खाली समय में वह शहर से लाई हुई किताबें पढ़ता रहता है या आने-जाने वाले लोगों से बातचीत करता है। एला जब अतीत की स्मृतियों से परेशान होती है, अपराधबोध या असमंजस महसूस करती है, तो वह अरचु से बात करने चली जाती है। शिखा लिखती हैं कि एला एक दिन अरचु से पूछती है, “यह ज़िंदगी है क्या, अरचु? इसके मायने क्या हैं? बस नियति जिस ओर ले जाए, कभी इंसान को वह मिलता है क्या, जो वह चाहता है? बस ढोता रहता है दूसरों के बनाए नियम।” अरचु उसे इकिगाय के बारे में बताता है। वह कहता है कि जीवन के लिए सबसे आवश्यक है इकिगाय- ऐसा मकसद, जो व्यक्ति को रोज सुबह उत्साह और प्रसन्नता के साथ उठने की वजह दे। वह यह भी बताता है कि उसने इस विषय पर एक किताब शहर से खरीदी थी और वह किताब एला को पढ़ने के लिए देगा। बातचीत के दौरान वह कहता है कि जिंदगी बहुत सरल है, हम ही उसे मुश्किल बना देते हैं। इस प्रसंग को पढ़ते हुए एला की तरह पाठक भी कुछ देर अरचु की समझ पर हतप्रभ रह जाता है। क्या सचमुच इकिगाय वही है, जो एला को सनौली में मिल गया है? अरचु की बातों से एला को अपने जीवन के कुछ ऐसे सूत्र समझ में आने लगते हैं, जिन्हें वह दिल्ली में रहते हुए शायद कभी पहचान नहीं पाई थी।
आज जब नई पीढ़ी के एक बड़े हिस्से के बारे में कहा जाता है कि उसका ध्यान रीलों, सोशल मीडिया और त्वरित मनोरंजन तक सीमित होता जा रहा है, तब अरचु जैसा पात्र उम्मीद जगाता है। वह किताबें पढ़ता है, सोचता है, लोगों से संवाद करता है और जीवन के प्रश्नों पर अपनी तरह से विचार करता है। उसकी बौद्धिक जिज्ञासा बताती है कि पढ़ने की आदत व्यक्ति को अपने छोटे-से भौगोलिक संसार से बाहर निकलकर व्यापक दुनिया से जोड़ सकती है। फिर भी, मुझे उसका चरित्र थोड़ा अधूरा चित्रित हुआ लगता है। वह एला के लिए विचारों का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत बनता है, लेकिन उसके अपने सपनों, संघर्षों और भविष्य के बारे में बहुत कुछ जानने को नहीं मिलता। यदि उसके जीवन की संभावनाओं को भी थोड़ा विस्तार मिलता, तो वह एक सहायक पात्र से आगे बढ़कर अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व के साथ सामने आ सकता था। यह कितनी सुखद बात है कि इकिगाय जैसी जीवन-दर्शन से जुड़ी किताबें सनौली जैसे दूरदराज के गाँव तक पहुँच रही हैं और वहाँ पढ़ी भी जा रही हैं। अरचु का किताबों के प्रति लगाव मुझे केवल एक पात्र की विशेषता नहीं लगता, बल्कि यह साहित्य के बदलते भूगोल की ओर भी संकेत करता है। कोई किताब किसी छोटे गाँव की दुकान तक पहुँचती है, वहाँ कोई लड़का उसे पढ़ता है और फिर उसकी बातों से किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन में बदलाव आता है- यह अपने आप में एक सुंदर सांस्कृतिक प्रक्रिया है। थोड़ा कयास लगाते हुए कहूँ तो चूँकि लेखिका की स्कूली शिक्षा उत्तराखंड में हुई है, इसलिए संभव है कि उनके अपने भौगोलिक और सांस्कृतिक अनुभवों ने सनौली जैसे पहाड़ी गाँव की कल्पना को अधिक सहज बनाया हो। उपन्यास में जंगलों, पहाड़ों, नदियों और ग्रामीण जीवन का जो चित्र मिलता है, उसमें प्रकृति के प्रति आत्मीय लगाव दिखाई देता है। बेशक, साहित्य में किसी स्थान का चित्रण केवल लेखक के निजी अनुभव पर निर्भर नहीं करता; कल्पना, शोध और दूसरे लोगों के अनुभव भी उसमें भूमिका निभाते हैं। फिर भी, किसी लेखक के अपने जीवन और परिवेश की स्मृतियाँ उसकी रचना में किस तरह प्रवेश करती हैं, यह देखना दिलचस्प होता है।
यहाँ रुककर मैं सोचता हूँ कि यदि मैं शिखा की जगह इस उपन्यास का लेखक होता, तो क्या करता? शायद मैं एला को पूर्वोत्तर भारत के किसी पहाड़ी गाँव के जंगलों में गिराता। यह केवल स्थान बदलने की कल्पना नहीं है। पूर्वोत्तर भारत की भौगोलिक, भाषाई और सांस्कृतिक विविधता एला की आत्मखोज को एक अलग आयाम दे सकती थी। जब वह वहाँ की ग्रामीण महिलाओं के बीच पहुँचती, तो एक बिल्कुल नए भाषाई परिवेश का सामना करती। स्थानीय लोगों की भाषा न समझ पाना, अपनी जरूरतें व्यक्त करने में कठिनाई होना और धीरे-धीरे उनके शब्दों, अभिव्यक्तियों तथा जीवन-पद्धति को समझना- ये सभी अनुभव उसकी यात्रा को एक नया अर्थ दे सकते थे। भाषा सीखना यहाँ केवल संवाद का व्यावहारिक साधन नहीं होता, बल्कि दूसरे समुदाय के अनुभवों, स्मृतियों और सांस्कृतिक संसार में प्रवेश करने का माध्यम भी बनता। इससे एला के चरित्र का एक और पक्ष भी विकसित होता। वह दिल्ली में रहते हुए एक नई भाषा नहीं सीख पाई थी, जिसका उसे ‘गिल्ट’ भी था। यदि नए परिवेश में वह जरूरत और आत्मीयता के कारण एक नई भाषा सीखती, तो उसके भीतर का पुराना अपराधबोध भी मिट सकता था। साथ ही, उत्तर भारत और पूर्वोत्तर भारत के बीच एक सुंदर भाषाई तथा सांस्कृतिक सूत्र बनता। कल्पना कीजिए कि जब अंकुर अपनी माँ को गाँव के लोगों से उनकी स्थानीय भाषा में बात करते देखता, तो उसे कितना अच्छा लगता! वह अपनी माँ को केवल चित्र बनाते या बच्चों को पढ़ाते हुए नहीं, बल्कि एक नए संसार से संवाद स्थापित करते हुए देखता। एला की ‘अस्मि’ में तब एक और सितारा जुड़ जाता। यह मेरी अपनी पाठकीय कल्पना है, उपन्यास की कोई अनिवार्य कमी नहीं कि एला पूर्वोत्तर भारत में क्यों नहीं जाती। फिर भी, किसी रचना को पढ़ते हुए यह सोचना कि यदि कहानी किसी दूसरे भूगोल में घटित होती तो उसके अर्थ कैसे बदलते, मेरे लिए साहित्य पढ़ने का एक दिलचस्प हिस्सा है।
उपन्यास की भाषा काफी प्रवाहपूर्ण और भावनात्मक रूप से समृद्ध है। पहाड़ों की प्रकृति, जंगलों और नदियों का वर्णन इतना जीवंत है कि पाठक को स्वयं वहाँ पहुँचने का अनुभव होता है। लेकिन संवादों के मामले में मुझे गीतु और कैजा जैसे ग्रामीण पात्रों की भाषा में कुछ असंगतियाँ दिखाई दीं। एक ओर वे बिल्कुल देहाती ढंग से बोलती हैं, दूसरी ओर कैजा के संवादों में ‘संभवतः’, ‘प्रसन्न’ और ‘पीड़ा’ जैसे अपेक्षाकृत औपचारिक शब्द आ जाते हैं। यह जरूरी नहीं कि ग्रामीण पात्र कठिन या संस्कृतनिष्ठ शब्दों का इस्तेमाल न कर सकें। भाषा का प्रयोग शिक्षा, अनुभव, व्यक्तिगत रुचि और सामाजिक संपर्क के आधार पर अलग-अलग हो सकता है। लेकिन जब किसी पात्र की बोली को विशेष रूप से ग्रामीण परिवेश से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है, तो उसके शब्द-चयन और वाक्य-विन्यास में एक निरंतरता की अपेक्षा स्वाभाविक है। यदि पात्रों की भाषा में स्थानीय बोलचाल की विशिष्टता थोड़ी और विकसित होती, तो उनकी सांस्कृतिक पहचान अधिक विश्वसनीय बन सकती थी। मुझे ‘अस्मि’ पढ़ते हुए एक और बात की खुशी हुई कि आज भी दूरदराज के इलाकों में ऐसे लोग हैं, जो किसी अनजान, दुर्घटनाग्रस्त और असहाय व्यक्ति को देखकर उसकी मदद करने के लिए आगे आते हैं। सनौली की महिलाएँ एला को जंगल में पड़ी हुई पाती हैं और बिना उससे अधिक सवाल किए उसे अपने घर ले जाती हैं। वे कई दिनों तक उसकी देखभाल करती हैं। यह व्यवहार किसी औपचारिक जिम्मेदारी या लाभ की अपेक्षा से पैदा नहीं होता, बल्कि सहज मानवीय संवेदना से पैदा होता है। आज जब समाज में अविश्वास, असुरक्षा और स्वार्थ की चर्चा बार-बार होती है, तब ऐसे प्रसंग मनुष्य की सहज करुणा में विश्वास बनाए रखते हैं।
लेकिन इस प्रसंग के साथ मेरे मन में कुछ सवाल भी उठते हैं। एला एक स्त्री है और उसे बचाने वाली भी स्त्रियाँ हैं। एक क्षण के लिए सोचता हूँ कि यदि एला को उन महिलाओं के बजाय ग्रामीण पुरुषों ने पाया होता, तो कहानी का रुख कैसा होता? क्या उसकी सुरक्षा को लेकर उसके मन में अलग तरह के भय पैदा होते? इसी तरह, यदि एला स्त्री न होकर एक पुरुष होती और उसे ग्रामीण महिलाएँ घायल अवस्था में पातीं, तो क्या वे उसी सहजता से उसे अपने घर ले जातीं? क्या गाँव का सामाजिक परिवेश उस स्थिति में कुछ अलग प्रतिक्रिया करता? खैर, ये सवाल उपन्यास की कथा से बाहर के हैं, इन्हें बस एक पाठक की अनावश्यक कल्पनाएँ भर माना जाए। जाहिर है, ‘अस्मि’ हर उस स्त्री की कहानी है, जिसने घर-परिवार की जिम्मेदारियों के बीच अपने सपनों को पीछे छोड़ दिया है। शिखा वार्ष्णेय ने खूबसूरती से दिखाया है कि किसी स्त्री के लिए अच्छा पति, अच्छा घर और अच्छा बेटा ही उसकी खुशी की गारंटी नहीं होते। ये सभी उसके जीवन के महत्त्वपूर्ण हिस्से हो सकते हैं, लेकिन उसके पूरे अस्तित्व का विकल्प नहीं। समस्या तब पैदा होती है, जब स्त्री से अपेक्षा की जाती है कि वह दूसरों की खुशी के लिए अपने होने को ही भुला दे।
और अंत में, शिखा वार्ष्णेय को इस पहले उपन्यास के लिए बधाई और साधुवाद। लेकिन उनसे भी अधिक बधाई और साधुवाद उन आत्मीय एवं वरिष्ठ साथियों को, जिन्होंने लेखिका पर स्वयं लेखिका से पहले विश्वास किया। जिन्होंने बार-बार ‘उपन्यास की ओर बढ़ो’ कहकर प्रेरित किया और उनके भीतर छिपी रचनात्मक संभावना को आकार लेने का अवसर दिया।
शायद इसी प्रश्न के साथ ‘अस्मि’ का शीर्षक अपने सबसे गहरे अर्थ में हमारे सामने आता है- मैं हूँ। मेरा भी अस्तित्व है। और अपने होने का अर्थ तय करने का अधिकार भी मेरा है।
प्रो. जय कौशल
आसीसीआर विजिटिंग प्रोफ़ेसर
भारतीय अध्ययन विभाग,
सोफिया विश्वविद्यालय
‘सेंट क्लिमेंट ओह्रिडस्की’, सोफिया, बुल्गारिया।


पुस्तक की समीक्षा पढ़कर ऐसा लग रहा है जैसे प्रो.जय कौशल ने उपन्यास को उसके समस्त चरित्रों और उपन्यास की नायिका के चरित्रचित्रण को अपनी पैनी साहित्यिक दृष्टि से ध्यानपूर्वक सारगर्भित रूप में प्रस्तुत कर सुधि पाठकों के मन में ईला की पूरी कहानी को पढ़ने की जिज्ञासा पैदा कर दी है। यह समीक्षा आलोचना के समस्त सोपानों पर खरी उतरती है और अंत में उपन्यास की नायिका इला को एक अन्य परिस्थिति में डालकर कहानी को विस्तार भी दिया है जो व्यक्तिश: मुझे बहुत रोमांचक लगा । समीक्षा में पुरुष दृष्टि से कहानी की व्याख्या बहुत मायने रखती है । प्रोफेसर जय कौशल को अक्षय बधाई एवं शुभकामनाएं साथ ही उपन्यास की लेखिका को साधुवाद।