तान्जिर शहर के नाम के उच्चारण में बहुत दुविधा थी। लैटिन में यह ‘टिंगिस’ था, पुर्तगाली भाषा में ‘टैंजेर’, स्पैनिश में टांजीर, फ़्रैंच में ‘तान्जे’, अंग्रेज़ी में आने के बाद ‘तान्जीयर’ जैसा हो गया। इसका अरबी नाम ‘तंजाह’ है। सभी विदेशी इसे तान्जिर कहते हुए मिले तो वही हमने भी पकड़ लिया। तान्जिर मोरोक्को में बंदरगाहों के लिए जाना जाने वाला शहर है। यह मोरोक्को की ग्रीष्मकालीन राजधानी भी है। इसकी स्थिति बहुत रणनीतिक है। यह स्ट्रेट ऑफ़ जिब्राल्टर पर मौजूद है। यह जलस्थल ही स्पेन को अफ्रीका महाद्वीप से अलग करता है। इस स्थान पर भूमध्य सागर जिब्राल्टर स्ट्रेट से होकर अटलांटिक महासागर से मिलता है यानी यह दो विशाल और विशालतम जलदेहों की संधि कराता है। इसे यूरोप का प्रवेश द्वार भी कहते हैं। इसी कारण यहाँ के निवासी स्वयं को आधा यूरोपीयन ही मानते हैं।
तान्जिर विले स्टेशन ‘अल बोरक’ लाइन का आखिरी पड़ाव है। स्टेशन के पास ही ‘हिल्टन तान्जिर सिटी सेंटर’ और ‘तान्जिर सिटी मॉल’ हैं जो इस स्टेशन को यात्रियों से सदाबहार किए रहती हैं। यह स्टेशन केवल बुलेट ट्रेन का ही नहीं, अन्य सामान्य ट्रेनों के लिए भी है अत: यह सदा भरा हुआ और आबाद रहता है। यह स्टेशन भी ‘कासा वोयेजर्स’ जैसा ही सुंदर था। शायद उससे कुछ और बड़ा भी था। इसमें बने शॉपिंग सेंटर को निहारते हुए हम इसकी इमारत से बाहर आए तो दो तरह की टैक्सियाँ दिखीं। छोटी नीली टैक्सी की बजाय हमने सफेद टैक्सी करने की वही गलती की जो अकसर नए मुसाफ़िर किया करते हैं। नीली टैक्सी तीन सवारियों को बिठा सकती है और शहर के भीतर के लिए होती है जबकि सफेद वाली शहर के बाहर के लिए, एयरपोर्ट के लिए आदि-आदि। हम इसकी झक्क सफेदी से आकर्षित हो गए और मात्र साढ़े तीन किलोमीटर दूर अपने होटल तक का भुगतान तीन-चार गुना पैसे देकर किया। ‘ऑक्सीडेंटल’ होटल 4 दिन के लिए पूर्व ही आरक्षित कराया हुआ था।
आरक्षित तो किराए की कार भी कराई हुई थी किंतु दिए हुए नम्बर पर कई बार फोन घुमाने पर भी कोई कॉल उठाने को तैयार नहीं था। घंटे भर में होटल के चेक-इन का काम हुआ तो हमने किराये की कार के दफ्तर जाना उचित समझा। किस्मत से दफ्तर खुला था और उसमें कर्मचारी हमारी प्रतीक्षा कर रहा था। हमें दो-तीन घंटे यूँ ही फोन करने में गँवा देने का अफसोस हुआ। खैर, कागज़ी कार्यवाही पूरी कर हमने कार ली तो ऐसे लगा जैसे किसी ने हमारी बेड़ियाँ खोल कर पंख लगा दिए हों। बिना कार के हमें बहुत असहाय महसूस हो रहा था। मनुष्य अपनी ही आदतों का गुलाम ऐसे ही होता है। तान्जिर में 4 दिन ठहरने की योजना थी। जानकारों ने बताया था कि यह हमें बहुत पसंद आने वाला है। इस दिन और अगले दिन तान्जिर के स्थानीय दर्शनीय स्थल घूमकर तीसरे दिन नीले शहर ‘शेफ़शॉवन’ जाने का विचार था। चौथे दिन फिर तान्जिर घूमकर रात की बुलेट ट्रेन पकड़ने की पूर्व-योजना थी।
आज का आधा दिन तो निकल चुका था। हमने पास वाली जगहों का चुनाव किया। ‘सोक्को पेतीत स्क्वैयर’ तथा ‘ग्रांड सोक्को स्क्वैयर’ देखने का निश्चय किया। यह होटल से मात्र 7 किलोमीटर दूर था। ये दोनों स्थान ही एक छोटी पहाड़ी पर घनी आबादी के बीच स्थित थे। 15 मिनट की ड्राइव हमें उसके बहुत पास तक ले गई। वहाँ की तंग गलियों में कार ले जाने की हमारी हिम्मत न हुई तो हमने ‘बाब-अल मरसा’ की पार्किंग में कार को सुरक्षित किया और पैदल ही आगे बढ़ गए। शाम हो चुकी थी और हल्की गुलाबी ठंड वातावरण को घेरने लगी थी। बीच-बीच में मामूली बूँदा-बाँदी भी हो जाती थी। पुराने किले के किसी दरवाज़े के समान ‘बाब-अल मरसा’ से गुज़रते हुए थोड़ी-सी चढ़ाई करते ही हमारी दृष्टि कुछ अन्य देखने लायक स्थानों पर पड़ी। यहाँ ‘बाब-डार-डेबाग़’, ‘मदीना डे बाब अल मरसा’ और सबसे शानदार ‘टेरेस बेले वू’ थी। इसी टेरेस से ‘पोर्ट डे तान्जिर विले’ और ‘तंजा मरीना बे’ के सौष्ठवपूर्ण दृश्य मिलते थे। अभी हमने अपनी आँखों को अपने गंतव्य की ओर मोड़ा और आगे चलते रहे। हम एक छोटी मार्केट से निकल रहे थे जो ‘मदीना’ नामक स्थान में ही थी। यहाँ परंपरागत रीति की दुकानें बनीं थीं जिनके लकड़ी के बड़े से कपाट, धूप से बचाने के लिए लकड़ी की ही दुछत्ती (शेड), उसके ऊपर लटकती अरबी डिज़ाइन की लालटेन और गली की दीवारों पर लटकते चौकोर गमले, किसी पुराने ज़माने में ले जा रहे थे जैसे।
‘सोक्को पेतीत स्क्वैयर’ या ‘पेतीत सोक्को’ एक फ्रांसीसी-स्पेनी मिश्रित नाम है जिसमें ‘पेतीत’ शब्द फ्रांस से आया है जिसका अर्थ है छोटा; और स्पेनी ‘सोक्को’ अथवा ‘ज़ोको’ रूप बदलकर अरबी भाषा में ‘सूक’ शब्द बन, बाज़ार के लिए प्रयोग किया जाता है। अंग्रेज़ी का ‘स्क्वैयर’ जोड़ा गया है क्योंकि यह यहाँ के ‘कसबाह’ क्षेत्र की महत्त्वपूर्ण जगहों के बीच पड़ने वाला चौराहा है। छोटी-छोटी गलियों की तुलना में यह कुछ खुला इलाका है जिसमें चारों तरफ़ सजावटी सामान और खाने-पीने की दुकानें हैं। आकर्षण-केंद्र होने के कारण यहाँ बनी इमारतें साफ़-सुथरी, चमकदार और सजावटी हैं। लोग यहाँ बैठकर ‘पुदीना चाय’ पीते हैं और इस क्षेत्र का दौरा पूरा करते हैं।
इस दिन पूरे मोरोक्को में ईद मनाई जा रही थी। सब जगह बहुत भीड़-भाड़ थी। अत: यहाँ से गुज़रते हुए हमने आगे ‘ग्रांड सोक्को’ जाने की बजाय पुन: नीचे की ओर जाना उचित समझा और अपनी छूटी हुई जगहों में से सबसे सुंदर ‘टेरेस बेले वू’ पर जा पहुँचे। यह बहुत सुरुचिकर स्थान था। इस प्रकार की विशेष छतों के लिए यह स्थान प्रसिद्ध है। यह जानना बहुत रुचिकर है कि यहाँ पर इस प्रकार की छतें बनाने का प्रचलन क्यों है। तान्जिर छोटी-छोटी पहाड़ियों पर बसा हुआ शहर है। यहाँ घरों का दरवाज़ा जिस गली में खुलता है, उसी गली में आगे बढ़ते हुए, या उस गली से मुड़कर अगली गली, चढ़ाई के कारण उन्हीं घरों की सपाट छत तक पहुँच जाती हैं। छतों के ऊपर इस टेरेस को ऊपरी गली से आने-जाने योग्य बनाकर खुला रखा जाता है या इसमें कोई रेस्टोरेंट इत्यादि खोला जाता है। यहाँ से जो दृश्य ‘जिब्राल्टर जलमुक्ता’ का, बंदरगाह का, समुद्रतट का मिलता है, वह कहीं और से असंभव है। ‘कसबाह’ की भूलभुलैया वाले गली-कूचों से निकल खुले नीले आसमान के नीचे अथाह समुद्र का नज़ारा बहुत तरोताजा कर देने वाला होता है। जैसे-जैसे शहर में निर्माण कार्य बढ़ता है, ऐसा सुदूर दृश्य ऊँचाई से ही मिल सकता है, उसी के लिए साज-सज्जा के साथ ऐसी टेरेस का घेराव किया जाता है। कलाकारों, चित्रकारों को यहाँ प्राकृतिक प्रेरणा मिलती है। इसे बनाने वाले को परोपकार का पुण्य भी मिलता ही होगा।
बहुधा एक सीध में बने मकानों की छतें भी आपस में जुड़ी होती हैं और अगर वे केवल निजी इस्तेमाल के लिए न हों तो एक से दूसरी छत पर भी आसानी से जाया जा सकता है और तान्जिर की खाड़ी का पूरा सौष्ठव आँखों में भरा जा सकता है। छायादार गलियों के दोनों तरफ़ बेल में टँके बूटे-से जड़े हुए मकान आती-जाती भीड़ को झाँकते थे जैसे। थोड़ा-सा भटक कर ही सही, हम उसी टेरेस बेले वू पर पहुँच गए। ‘टेरेस बेले वू’, ‘बेल्लाली आर्ट म्यूज़ियम’ की छत पर बना है। इसे विशेष रूप देते हुए लकड़ी के खम्भों पर पड़ी हुई बाँस की छत बनाई गई थी। हर दो खम्भों के बीच सुंदर झरोखों का निर्माण हो रहा था। यहाँ अलग ही रौनक मेला लगा हुआ था। बहुत-से सैलानी इस आभा को निहारते हुए विश्राम कर रहे थे। आने-जाने वालों के लिए यहाँ निशुल्क प्रवेश था।
स्थानीय वेशभूषा पहनाकर पर्यटकों की तस्वीरें निकालने वाली कई टोलियाँ अपना सामान जमाए हुए थीं। एक दुशाला ओढ़ाकर, सिर पर बेंत की टोपी और कुछ गहनों से सजकर हमने भी स्थानीय रूप में तस्वीरें निकालीं। पीछे दूर तक बंदरगाह, समुद्र, लगून के उस ओर की पहाड़ियाँ मोहक लगती थीं। ऐसा लगता है कि आप आसमान से धरती की पेंटिंग देख रहे हों। सायंकाल सूर्य का अटलांटिक में विलय होते क्षितिज को देखना अत्यंत आह्लादकारी है। ऐसी छतें सपाट ही बनी हुई थीं। इन पर कोई ढलान की आवश्यकता नहीं थी कि बहुत कम ही यहाँ बरसात होती है। ऐसी छत पर से तान्जिर का 360 डिग्री दर्शन होता है।
इस टेरेस से सटी हुई टेरेस थी ‘बोर्ज अल हजोई’ की। यह एक म्यूज़ियम था और उसकी छत पर छोटी तोपें सजी हुई थीं। बच्चे इनके आस-पास खेलते हुए फुदक रहे थे। इसी से नीचे बाब अल मरसा को सीधी गली जाती थी। इस गेट से निकलकर सामने तट की रौनक में घुल जाने के लिए हम पहाड़ी से नीचे आ गए। नीचे आते ही सबसे पहले एक ढहे हुए किले के दर्शन हुए। इसका कुछ हिस्सा सुरक्षित है और उसमें शाम चार बजे तक प्रवेश किया जा सकता है। इस किले के पीछे ही कई पाँच सितारा होटल भी बने हुए हैं। सड़क के पीछे इस टूटे किले की मीनार ‘बोर्ज डार अल बारूद’ नाम से खड़ी हुई चौराहे की शान बढ़ाती है। चौराहे के ठीक विपरीत दिशा में ‘लल्ला आबला’ मस्जिद भी अपनी मोरक्कन सादगी की छटा बिखेरती है। हमने इसे भी नज़दीक से देखा। कुछ स्थानीय बालक मग़रेब की नमाज़ अदा कर मस्जिद से बाहर आ रहे थे। हमने उनसे बातचीत करनी चाही तो वे लजा गए। कुछ आगे तक जाकर तान्जिर फैरी टर्मिनल भी देखा। चलते-चलते और मौसम का आनंद लेते मरीना बे तक की सैर की। यहाँ बस स्टैंड बना हुआ था जिस पर तान्जिर सिटी टूर का पूरा नक्शा बना था। उसकी तस्वीरें लेने से आगे का कार्यक्रम सुनिश्चित करने में हमें सुविधा हुई।
ईद का दिन होने के कारण सपरिवार स्थानीय लोग छुट्टी का जश्न मना रहे थे। बहुत-से नवविवाहित जोड़े एक ही रंग और डिज़ाइन के परिधान में खिले-खिले घूम रहे थे। यह रंग-नियोजन बहुत लुभा रहा था। सभी बहुत खुश लग रहे थे। शाम को हम ‘हिल्टन तान्जिर सिटी सेंटर’ घूमने गए। यह तांजेर विले स्टेशन के चौराहे को पार कर के ही है। इसके आसपास निर्माण कार्य के चलते अवरोधक लगे हुए थे। बहुत घूमने पर इसके पास कार छोड़ने का स्थान मिल सका। वहाँ से काफी पैदल चलकर ही मॉल में पहुँचा जा सका। मॉल बहुत बड़ी और आधुनिक थी। लगभग सारे बड़े और कीमती ब्रांड वहाँ अपनी चमक और अकड़ के साथ शोरूमों में सजे हुए थे। युवाओं का खूब जमघट था। सैलानी भी बहुत थे। हमने घूम-घूमकर वहाँ का रौनक-मेला देखा, खाना खाया और वापस टहलते हुए कार तक आ गए।

अगले दिन होटल की विशाल जलपान शाला में नाश्ते के साथ हमने कुछ मधुर यादें भी कैमरे में कैद कीं। आज घूमने की जगहें सुनिश्चित कीं जिनमें ‘पार्क पर्डिकेरिस’, ‘जार्डिन डोनाबो’, ‘हरक्यूलिस केव’ तथा ‘केप स्पार्टल’ प्रमुख थीं। रास्ते में समुद्र तट की सुषमा, ‘हाफा गार्डन’, ‘मर्कला गार्डन’ और ‘मर्कला बीच’ ने हमें कार में ब्रेक लगाने पर मजबूर कर दिया। एक ओर हिलोरें मारता अटलांटिक महासागर और दूसरी ओर हरी पहाड़ियाँ, यह पूरा मार्ग ही शानदार था। ‘मर्कला बीच’ को पर्यटकों के टहलने और सुस्ताने की सुविधा के लिए तैयार किया गया था। यहाँ अनेक कोणों से प्रकृति को समेटते हुए तस्वीरें ली गईं। आगे रास्ता समुद्र तट से हटकर शहर के मध्य से भी निकलता था। पूरा तान्जिर ही छोटी-छोटी पहाड़ियों पर बसा होने के कारण यहाँ भी मार्ग के दोनों ओर पहाड़ियों के सुंदर नज़ारे मिलते थे।
‘पार्क पर्डिकेरिस’ भी पहाड़ियों पर बना हुआ जंगल था। इसे रमीलात वन के नाम से भी जाना जाता है और पहले ‘विला ऐडोनिया’ या ‘नाइटिंगेल्स का स्थान’ कहा जाता था। शहर के रमीलात इलाके में स्थित यह एक सार्वजनिक पार्क है, जो लगभग 70 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। यह जेबेल कबीर पहाड़ी की उत्तरी ढलानों पर, जिब्राल्टर जलडमरूमध्य की ओर मुख किए हुए स्थित है। इसके पश्चिम में केप स्पार्टेल रिज़र्व और पूर्व में जेबेल कबीर रॉयल पैलेस है। इस पार्क का नाम ग्रीक-अमेरिकी प्रसिद्ध व्यक्ति आयन हैनफोर्ड पर्डिकेरिस के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने 1870 के दशक में इसे विकसित किया था। उन्होंने इस स्थान पर एक विला का निर्माण भी कराया। उनसे खरीदने के बाद 1930 में, मराक्केश के प्रभावशाली शासक थामी एल ग्लाउई ने इसे अपने निवास के रूप में इस्तेमाल किया। उनकी मृत्यु और 1956 में मोरक्को की स्वतंत्रता के बाद, यह पार्क राज्य की संपत्ति बन गया। एक समय उपेक्षा का शिकार रहने के बाद, 2015 में इसका नवीनीकरण शुरू हुआ। इस शाही विला को एक विरासत केंद्र में बदल दिया गया, जिसका उद्घाटन 2022 में ही किया गया था।
यह पार्क सैकड़ों विभिन्न वनस्पति प्रजातियों का घर है। घने पेड़ों से घिरा हुआ यह एक तरह से वन संरक्षण के अंतर्गत बना हुआ पार्क जैसा था। इसमें बहुत-सी वानस्पतिक प्रजातियों और वन्य पशु-पक्षियों का संरक्षण भी किया गया था। पार्क का निरीक्षण करने के लिए जगह-जगह लकड़ी की मचानें बनी हुई थीं। लम्बी पगडंडियाँ घूमने वालों के लिए बनी थीं और उसके किनारे आराम के लिए लकड़ी की बेंचें थीं। पानी पीने के लिए बने नल के आसपास मोरक्कन बाथ वाले विशेष मोज़ेक डिज़ाइन से सजावट थी। बहुत-से लोग पिकनिक मनाने वहाँ आए हुए थे और वहीं बार-बी-क्यू लगाकर, खाद्य पकाकर उसका भक्षण कर रहे थे।
पार्क के प्रवेश द्वार से अंदर ही अंदर चलते जाओ तो ऊँचाई से समुद्र के दर्शन पुन: होते हैं। हम वहीं तक गए। पार्क के बाहर ‘ले मिराज’ नाम से आधुनिक कैफ़े है। इस पार्क को देखने की कोई टिकट नहीं है और पार्किंग निशुल्क है।
आस-पास का मुआयना करते हुए हम कार से ‘जार्डिन डोनाबो’ पहुँचे। यह बहुत-सी नवीन पौध को संजोए एक बोटेनिकल गार्डन है। इसमें प्रवेश की टिकट 50 दिरहम प्रति व्यक्ति की दर से लेनी होती है। यह पारंपरिक शैली से बनाया हुआ बगीचा है। इसके अंदर गुलाब, हिबिस्कस, लैवेंडर, आईवी के अलावा पुदीना, मिर्ची के बाग भी हैं। सब्ज़ बाग के साथ ही कुकिंग स्कूल भी है। इसमें एक बड़े तालाब के साथ ही समुद्र को निहारने की टेरेस भी हैं। चाइनीज़ गार्डन, मोरक्कन गार्डन, मेडिटरेनियन गार्डन और कुछ कैफ़े भी इसके अंदर ही हैं। रॉक गार्डन और फव्वारों से यह सुसज्जित है। इसमें घूमते हुए ऊष्णकटिबंधीय वृष्टिवन में घूमने का अहसास होता है।
‘केप स्पार्टल’ नाम से दो जगहों पर गूगल हमें ले जाता है। पहली जगह पर कार एक नियत स्थान ही जा सकती है। उससे आगे पैदल चढ़ाई करने पर इसी नाम का एक चर्च आता है जिसकी मीनार दूर से दिखती है। लेकिन मुख्य जगह यह न होकर, थोड़ी दूर पड़ती है जहाँ कार से आसानी से जाया जा सकता है। यह पहाड़ों की तलहटी में समुद्र के किनारे एक प्राकृतिक पिकनिक स्पॉट है। इसे थोड़ा-सा सँवारा गया है ताकि यहाँ पूरे दिन को पिकनिक मनाने वाले सुविधा से आ सकें। गाड़ियाँ खड़ी करने का पर्याप्त स्थान सपाट व समतल किया गया हुआ था। धरती ऊबड़-खाबड़ किंतु घास के हरे कालीन से सँवरी हुई थी। किनारे पर 100 फुट ऊँची-ऊँची चट्टानें थीं जो इस स्थान की प्राकृतिक शोभा को संजोने का काम करती थीं। बड़ी-बड़ी चट्टानों और नीले समुद्र के पर्दे के आगे खड़े होकर तस्वीरें खिंचवाना अच्छा अनुभव रहा। यह स्थान समुद्र से थोड़ी ऊँचाई पर है अत: यहाँ तट को विकसित नहीं किया गया है और यह छोटे-बड़े बेडौल पत्थरों और चट्टानों के किनारों पर पड़े होने के कारण विशेष और अभूतपूर्व दृश्य दिखता है।
‘केप स्पार्टल’ लाइटहाऊस भी थोड़ी दूरी पर ही है। उसके लिए कुछ पीछे की ओर जाना पड़ता है। यह समुद्रतल से 1000 फीट की ऊँचाई पर है। यही स्थान जिब्राल्टर जलडमरू का प्रवेश स्थल भी है। यही अफ्रीका महाद्वीप का उत्तरी-पश्चिमी शीर्षबिंदु भी है। केप स्पार्टल के पास स्पार्टल तट है, जो एक डूबा हुआ द्वीप है और कुछ लोगों का मानना है कि यह पौराणिक अटलांटिस द्वीप का स्थान था। इसका पुनर्निर्माण 2020 में हुआ। इस स्थान पर अब एक समुद्री संग्रहालय, भोजनालय, जैविक पार्क आदि हैं। कहते हैं इसी स्थान से अटलांटिक महासागर और मेडिटरेनियन सागर आपस में टकराते हुए दिखते हैं। दोनों के पानी का रंग अलग-अलग दिखाई देता है। ऐसा आँखों से तो नहीं नज़र आया किंतु जहाज़ से समुद्र में थोड़ा अंदर जाकर नज़र आता होगा। देखा नहीं, फिर भी इस बात का अहसास ही बहुत अच्छा लगा। एक महासमुद्र के अंतिम छोर के किनारे आप पहुँच गए, यह भाव भी कम रोमांचक न था। इससे आगे ‘बुहेंदिया बीच’ पर भी बहुत पर्यटक घूमते हुए दिखे। थोड़ा और आगे ‘अचाकर बीच’ पर ड्रोमेडरी स्पॉट है जहाँ समुद्र किनारे बहुत से ऊँट सवारी के लिए मौजूद थे। यहाँ पर्यटक सूर्यास्त के दर्शन के लिए आते हैं और संध्या समय नवविवाहित जोड़े नारंगी रंग में अपने प्यार के गुलाबी रंग घोल देते हैं। अपने कूबड़ पर अरबी गद्दी को सजाए, झुंड में बैठे ऊँटों की प्यारी-सी तस्वीरें चलती कार से ही निकालीं।
दस मिनट में ही हम ‘हरक्यूलिस केव’ पहुँच गए थे। पार्किंग में स्थान भी सुविधा से मिल गया था। एक गलियारे से होकर हरक्यूलिस केव के पास बने दालान में हम पहुँचते हैं। गलियारे में इन गुफ़ाओं तथा हरक्यूलिस के बारे में बीसियों सूचनापटों द्वारा जानकारी दी गई थी। उसे पढ़ते-पढ़ते ही हम आगे बढ़ रहे थे।
हरक्यूलिस गुफ़ा तान्जिर शहर की पैतृक और प्रतीकात्मक पहचान है। तान्जिर घूमने आने वाले इस स्थान का भ्रमण अवश्य ही करते हैं। यह अपने प्राकृतिक महत्व, पुरातात्विक मूल्यों व महान अतीत-कथा के लिए प्रसिद्ध है। यह चूना पत्थर की घुलनशील चट्टानों के बीच बनी आकर्षक भू-आकृति है जो जल व जलीय रसायन के पारस्परिक टकराव व घिसाव से मोकले के रूप में उत्पन्न हुई है। प्रागैतिहासिक काल में मानव ऐसी गुफ़ाओं में सुरक्षा के लिए निवास किया करता था।


हरक्यूलिस केव प्रांगण में स्मृति-चिह्न, स्थानीय वेश तथा खान-पान की दुकानें भी थीं। मुख्य गुफ़ा प्रांगण के बाईं ओर से उतरती सीढ़ियों से नीचे जाकर थी। कुछ सीढ़ियों बाद टिकट काउंटर था जिस पर छोटी लाइन थी। वहाँ हमने 80-80 मोरक्कन दिरहम की दो टिकटें खरीदीं। प्रबंधन समिति द्वारा लोगों को अंदर छोटे-छोटे समूहों में भेजा जा रहा था। जल्दी ही हमारी बारी भी आ गई।
एक छोटी पहाड़ी की तलहटी में यह अति सुंदर गुफ़ा थी। इस गुफ़ा की एक दीवार में बने हुए अपरदनीय छिद्र से सीधा अटलांटिक महासागर दिखाई देता है। इस छिद्र अथवा खिड़की की आकृति गुफ़ा के अंदर से बाहर देखने पर हरक्यूलिस के मुख के समान है और समुद्र की ओर से देखने पर यह अफ्रीका का नक्शा बनाती है। गुफ़ा के अँधेरे से मोकले की फोटो लेने पर बीच में दिखता नीला आसमान और मूँगिया समुद्र का बहुत ललित चित्र उभरता है। समुद्र का पानी गुफ़ा के अंदर पूरे अधिकार के साथ बेरोक-टोक आता है। अत: सुरक्षा की दृष्टि से इसके तले तक सैलानियों को जाने नहीं दिया जाता। इसके ऊपर एक बालकनी जैसी निर्मिति से यह नज़ारा देखा जा सकता है। पानी के बहाव के कारण यहाँ भी फर्श अधिकतर गीला ही रहता है। गुफ़ा के अंदर हरक्यूलिस के मुख से आती रोशनी के अलावा सर्वत्र अँधेरा है। पानी द्वारा चट्टानों में हुए कटाव को टॉर्च जलाकर देखा व समझा जा सकता है जिसके लिए हमने मोबाइल में मौजूद टॉर्च बटन का इस्तेमाल किया। अँधेरा और भीतरी हिस्सा होने के कारण गुफ़ा का तापमान काफ़ी कम था। हल्की ठंड का अहसास हो रहा था जबकि हमने पहले से ही गर्म कपड़े पहन रखे थे।
हरक्यूलिस केव ऐतिहासिक महत्त्व की कंदरा है। ग्रीक और रोमन दंतकथाओं के अनुसार यूरोप और अफ़्रीका महाद्वीपों को अलग करने के बाद हरक्यूलिस ने इस कंदरा में आराम किया था। इन्हें अलग करने के लिए उसने विभाजित रेखा के दोनों ओर के स्थानों पर दो खंभे लगाए थे। यूरोप की तरफ़ यह जिब्राल्टर की चट्टान के नाम से जाना जाता है। अफ़्रीका की ओर से इसे मूसा पर्वत के रूप में पहचाना जाता है। गुफ़ा में आराम के बाद हरक्यूलिस ने वे बारह कार्य सम्पन्न किए जो उसे सौंपे गए थे। ये 12 काम हरक्यूलिस की शक्ति, साहस और दृढ़ता की शौर्य-गाथा बन सामने आए।

हरक्यूलिस केव से बाहर निकलकर छज्जे पर धूप सेंकते हुए सामने अटलांटिक समुद्र एक नीली दरी के जैसा दिखाई देता है। केव से निकलकर सामने की सीढ़ियों से उतरकर समुद्र तट तक जाने का रास्ता है। यहाँ भी ऊँट मालिक पर्यटकों की कृपा के लिए आस लगाए बैठे मिले। कुछ देर यहाँ घूमकर, कॉफी इत्यादि पीकर हम वापसी की राह हो लिए।
दिन अभी हमारे हाथ में बाकी था तो हमने लौटते हुए ‘पैलेस 9 एवरिल’ तथा ‘ग्रांड सोक्को’ देखने का मन बनाया। ग्रांड सोक्को से थोड़ी दूर एक पार्क के पास कार खड़ी करने की जगह दिखी तो उसके रखवालों के हाथ, वहीं कार को सौंप हमने पैदल चढ़ाई वाली लगभग 500 मीटर दूरी तय की और अपनी मनचाही जगह पहुँच गए।
‘पैलेस 9 एवरिल’ तथा ‘ग्रांड सोक्को’ वास्तव में आसपास ही हैं या यों कहो कि एक ही स्थान पर हैं। ग्रांड सोक्को एक बड़ा-सा चौराहा है। इसी के एक ओर पैलेस 9 एवरिल है। कभी-कभी इसे पैलेस 9 एवरिल स्क्वैयर भी कह दिया जाता है। ग्रांड सोक्को के चारों ओर बहुत-सी प्रसिद्ध इमारतें व मनोरंजन के गढ़ हैं।

पैलेस 9 एवरिल का पूरा नाम पैलेस 9 एवरिल 1947 है। यह जानना भी बहुत उत्तेजक रहा कि मोहम्मद पंचम राजा ने इस स्थान पर 9 अप्रैल 1947 को महती भाषण दिया था जिसमें उत्तरी प्रांतों की स्वतंत्रता तथा मोरक्को गणराज्य के एकीकरण की घोषणा की गई थी। मोरोक्को की पहचान की स्थापना के इस दिन को यादगार बनाने के कारण इस स्थान का यह नाम पड़ा। इसी से ‘एवरिल’ वास्तव में ‘एप्रिल’ और हिंदी का ‘अप्रैल’ है, यह समझ आया। उस समय में यह चौराहा बिना पटरी या बिना टैराकोटा ब्लॉक वाला, एक कच्चा चौराहा था। इस चौराहे पर सप्ताह में दो दिन बाज़ार लगा करता था। सार्वजनिक उत्सवों के दौरान यही मुख्य जश्न का स्थान होता था जहाँ दूर-दूर से कलाकार, फेरीवाले और विक्रेता मुनाफ़ा कमाने आया करते थे। बाद में यह स्थायी बाज़ार के रूप में विकसित हो गया। यह एक प्रकार से मुख्य शहर ‘मदीना’ का ऊपर की ओर से प्रवेश द्वार हो गया। यह चौराहा मात्र यातायात के चौराहे की पहचान से ऊपर उठकर मनोविनोद के विकल्प के लिए जाना गया। चौराहे पर एक घास का मैदान, बैठने के लिए दर्जनों बेंचें, बड़ा फव्वारा, फूलों वाला बागीचा, ऊँचे-ऊँचे पेड़, चारों ओर चलने के लिए ईंटों की पटरी और सागर को निहारता हुआ एक बड़ा-सा चबूतरा बन गया। आज इस स्थान पर बड़े-बड़े विदेशी नामी ब्रांडेड चीज़ों के शोरूम हैं। वैसे इसे चौराहा कहना इसकी तौहीन करना है। इस गोल घेरे से सात सड़कें अलग-अलग दिशाओं को जाती हैं। हाँ, इसे संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर, गतिशीलता और जीवंतता के मार्ग का चौराहा अवश्य कहा जा सकता है।
इसके चारों ओर की गर्वीली इमारतों में पैलेस 9 एवरिल तो है ही, ‘मेंडूबिया गार्डन’, ‘सिनेमा ए रिफ’, ‘सिद्दि बू-आबिद मस्जिद’, ‘बोर्ज कैथरीन’ आदि भी हैं। खरीदारी के लिए सोसायटी जनरल, कैफ़े, मिनी मार्केट भी हैं। ग्रांड सोक्को के पास ही पोपुलर ‘अल मिंज़ाह होटल’ भी है जिसके लिए महल की इमारत को होटल में बदला गया है। ग्रांड सोक्को चौराहा एक ऊँचे स्थान पर है जहाँ से चारों दिशाओं में ढलान है। आज इसके फव्वारे लोगों से घिरे हुए थे और फव्वारे के चबूतरे और बेंचों पर ढेरों मुसाफ़िर पसरे हुए थकान मिटा रहे थे। इसके सबसे ऊँचे छज्जे अथवा चबूतरे पर बड़ा खुला मैदान है जहाँ युद्ध में प्रयुक्त कई तोपें सजी हुई हैं। छुट्टी का दिन तो था ही। बहुत-से स्थानीय परिवार और सैलानी घूमने आए हुए थे। सारे ही बच्चे बारी-बारी तोपों के ऊपर चढ़ रहे थे और मुझे वीरेन डंगवाल की कविता ‘तोप’ याद आ रही थी-
अब तो बहरहाल
छोटे लड़कों की घुड़सवारी से अगर यह फारिग हो
तो उसके ऊपर बैठकर
चिड़ियाँ ही अकसर करती हैं गपशप
अपना बड़ा-सा मुँह खोले यह तोप अब दहाड़ती हुई नहीं, उबासी लेती हुई प्रतीत होती है। शायद यह मुँह खोल अपने साहसिक कारनामे बताना चाहती भी हो तो इस शोरगुल में उसे कौन ही सुन सकता है। यह शोर केवल मस्जिद से आती हुई अज़ान पर ही कुछ कम होता है अन्यथा अपनी मस्ती में यह बदस्तूर जारी रहता है। गुब्बारेवाले, आइसक्रीम, भुने मेवे, स्मृति-चिह्न आदि बेचने वाले भी इसी चहल-पहल का हिस्सा बने रहते हैं।
ग्रांड सोक्को का वातावरण परंपरागत सामग्री और स्थानीय संस्कृति का मुख्य दर्शनीय स्थल है। सबसे रोमांचक बात यह थी कि छोटी-छोटी बच्चियों को उनके माता-पिता पारंपरिक वैवाहिक ड्रैस पहनवाकर फोटो खिंचा रहे थे। हमने भी आकर्षित होकर उनसे आज्ञा ली और एक प्यारी-सी बच्ची की तस्वीर निकाल ली। उसके माता-पिता ने हमें यह भी बताया कि इस वेशभूषा को मोरक्कन ड्रैस मानने की गलती नहीं करनी है यह विशेष ‘तांजीरियन ड्रैस’ है। बच्ची के द्वारा पहने गए आभूषणों की आभा-प्रभा देखते ही बनती थी। वहीं पास में मोरक्कन वेश का पूरा सेट-अप था। उनसे लेकर वे कपड़े, हैट, आभूषण पहनकर, आलीशान शाही कुर्सी पर बैठकर तस्वीर निकालने के 100 मोरक्कन दिरहम वे लेते थे। हमने भी आधी-अधूरी सामग्री धारण कर दो-चार क्लिक तो कर ही लिए हालाँकि विक्रेता स्त्री ने हमारे मना करते-करते भी मुझे आभूषणों से लाद ही दिया था।
ग्रांड सोक्को की ऊँचाई के बारे में बताया ही था। यहाँ तोपों वाली जगह पर जो कम ऊँची बाउंड्री वॉल थी वहाँ बैठकर फिर से अटलांटिक महासागर हमारे अक्षिबिंदुओं को हर्षा रहा था। सोने पर सुहागा यह कि इस महाजलधि में एक विशालकाय जहाज़ भी विचरण कर रहा था जो चित्रों को एक केंद्र-बिंदु और अर्थ प्रदान कर रहा था। दिन ढलने तक हम इस आह्लादकारी वातावरण के आनंद में मग्न रहे। फिर पास में ही एक मैक्डोनाल्ड तलाशा। मैक्डोनाल्ड बहुत-से देशों में मिला ही था। दुबई, यू.ए.ई. में भी खूब सारी शाखाएँ हैं। ग्राहक स्वयं डिलीवरी काउंटर से सामन ले, इसके विपरीत यहाँ पर बेयरे ग्राहकों तक खाना ले जा रहे थे। हमने देखा कि हाथ में गर्म सामान की ट्रे उठाए बेयरे जब तक उसके असली मालिक को ढूँढते हैं तब तक वह खाना ठंडा हो चुका होता है। उससे यह सीख लेकर हमने अपना खाना खुद ही काउंटर से ले जाने के ज़िद की तो वे बड़ी मुश्किल से माने। यहाँ कुछ खाना पेट में डाल हम होटल आ गए।

आज होटल के पास का माहौल भी बदला हुआ मिला। इसके ठीक विपरीत जो खाली मैदान था उसमें मेला लगा हुआ था। यह शायद ईद का मेला था। हमने स्वयं को रोक नहीं पाए और होटल की पार्किंग में कार लगाकर फटाफट से उस उमंग भरे उल्लास में शामिल होने को घुस गए। भाग्य से प्रवेश निशुल्क था। बहुत-से छोटे-बड़े झूले, खेल की दुकानें थीं। मोरक्कन कपड़ों की दुकानें, बैग आदि वहाँ बिक रहे थे। बच्चे इधर से उधर भाग-भागकर अपनी पसंदीदा चीजें व खेल ढूँढ रहे थे। हर्षोल्लास की तरंगें दूर-दूर तक फैल रही थीं। अफ्रीकन रीति का गीत-संगीत भी बज रहा था। लगभग आधा घंटा वहाँ से स्फूर्ति अपने शरीर में भर इस दिन की हमने अपने होटल पहुँच इतिश्री की।
अगला दिन छठा दिन था। यह दिन नीले शहर यानी ब्लू सिटी कहे जाने वाले ‘शेफ़शॉवन’ के लिए निर्धारित था। इस दिन का भी बेसब्री से इंतज़ार था। बहुत-से पर्यटक तान्जिर आते ही पहले ‘शेफ़शॉवन’ देखने ही निकल जाते हैं। हम तान्जिर में 4 दिन थे तो हमने सब आराम-आराम से देखा। होटल से अच्छा नाश्ता कर हमने अपनी थर्मस खौलते पानी से भरी, चाय और कॉफ़ी मिक्स के सेशे रखे, कुछ सूखा खाने का सामान रखा और छतरी व जैकेट आदि लेकर निकले।
तान्जिर से शेफ़शॉवन का रास्ता 110 किलोमीटर था और ढाई घंटे में पहुँचने के हिसाब से ठीक था। लगातार पहाड़ियों के बीच से यह मार्ग गुजरता था और बीच-बीच में झीलों की उपस्थिति इस मार्ग को बहुत आनंदमय बनाती थी। रास्ते में दूर-दूर तक फैले खुले घास के मैदानों में भेड़ें चरती हुई दिखाई दीं। ऊन के गुच्छों से लदी हुई भेड़ें बहुत मनोरम दिखती थीं। इन्हें देख बचपन में सीखी गई नर्सरी राइम ‘बाबा-बाबा! ब्लैक शीप! हैव यू एनी वूल?’ याद आ गई।
कभी दूर पहाड़ियों पर घनी बस्तियाँ आँखों में भर जातीं तो कभी अकेले में तपस्या करते साधु जैसा कोई भवन या मस्जिद। कभी पहाड़ साथ-साथ चलते तो कभी घूमकर सामने आ टपकते। सड़क के इस बाजू ढलान, उस बाजू झील और झील के उस पार पहाड़ियाँ, ऐसा मोहक दृश्य देखकर हमने कार रोकी। वहीं किनारे पर कुछ पल ठहरकर थर्मस के गर्म पानी से चाय बनाई और खुशनुमा मौसम का लुत्फ उठाया। यह कोई जाना-माना स्थान न था अंत: वहाँ हमारे अलावा कोई और न रुका था। हमारे आसपास ही कई प्रकार की वनस्पति दिखाई दे रही थी। एक पीले रंग के फूल वाला पेड़ कई जगह फूलों से लदा हुआ पूरा का पूरा पीला ही दिख रहा था।
वाहद हजेरा नामक एक नदी की धारा आधे रास्ते के बाद से बहुत देर तक हमारे साथ-साथ चलती रही। बीच-बीच में बाँध और पुलिया बनाकर पानी को रोककर इकट्ठा किया गया था जो झील जैसा निर्माण करती थी। ‘मारटिल’ तथा ‘एनाखला’ नाम की दो ऐसी ही झील जैसे जल भराव थे जो पहाड़ों और पेड़ों से घिरे होने के कारण अत्यंत सुंदर दिखते थे। जहाँ से भी अच्छा दृश्य बनता था, हम वहीं रुकते थे। ऐसे रास्ते में 3-4 बार हम रुके। जब कभी नदी साथ न होती तो हरे घास के मैदान लुभाते रहते। छोटी-छोटी पहाड़ियाँ तो साथ चल ही रही थीं। पहाड़ियों के ऊपर सैर-सपाटे को निकले बादल अपनी छाया पहाड़ी पर डालते तो पहाड़ी काली-सी दिखती। बादलों के कारण मौसम खुशनुमा हो चला था। हल्की बूँदा-बाँदी भी हो रही थी।

तान्जिर से शेफ़शॉवन का यह पूरा मार्ग ही बेहद रोमांचक था। प्रकृति ने अपने मध्य थोड़ा खिसक के यह रास्ता बनाया हो जैसे। ‘शेफ़शॉवन’ शुरु होने से बहुत पहले ही हमें नीले रंग की मस्जिद और घर दिखाई देने लगे थे। मालूम होता था कि ब्लू सिटी का असर अब दूर तक फैलने लगा है। शेफ़शॉवन की सीमा शुरु होने पर पहले गोल चक्कर पर अरबी भाषा में شفشاون लिखा हुआ था। यहीं से ही सड़क के किनारे लगे हुए कलात्मक आकार के बिजली के खम्भे भी नीले रंग के हो गए थे। हमने अपनी कार की गति धीमी कर ली और इन नवीन अनुभवों का आनंद लेने लगे। मुख्य मार्ग पर ही फिर एक नीली मस्जिद और सुरक्षा चौकी आईं। अब हमने पार्किंग की खोज शुरु की किंतु पहाड़ी स्थानों पर ढलान वाली सड़कों पर ऐसी जगह पा लेना आसान नहीं होता, ये हम जानते थे। जहाँ भी पार्किंग की संभावना थी, वे सब पूरी तरह से भरी हुई थीं।
हमें पार्किंग छानते हुए दस मिनट बीत चुके थे। निराशा हमें घेरने ही वाली थी कि तभी हमारी कार को एक युवा लड़के ने रोका और पार्किंग के लिए अपने पीछे आने का इशारा किया। कोई और चारा न देख हम उसके पीछे कार चलाने लगे। वह आगे-आगे दौड़ता हुआ कोई डेढ़-दो सौ मीटर बाद हमें एक स्थान पर ले आया। पार्किंग की जगह तो थी किंतु वहाँ कार खड़ी कर लेने के लिए एक बाजीगर वाले कौशल की आवश्यकता थी। उसी ने गाड़ी जमाने में हमारी मदद की। उसके बाद उसने अपने पत्ते खोले कि वह वहाँ एक टूर गाइड है और वह हमें वे सब जगहें दिखा सकता है जो इंस्टाग्राम के लिए मशहूर हैं। हम हँसे बिना न रह सके क्योंकि हम पहले ही यह सोच रहे थे कि यह इतनी भाग-दौड़ कर हमारी मदद किस कारण कर रहा है।
वह एक भोला-भाला दिखता 20-22 साल का लड़का रहा होगा। उसका नाम अयूब था। हमने उससे पूछा कि वह हमें क्या-क्या दिखाएगा और साथ ही अपने शोध के अनुसार अपनी लिस्ट भी उसे बता दी। वह 200 मोरक्कन दिरहम में शाम तक हमें सब दिखाने के लिए राजी हो गया।
शेफ़शॉवन इंस्टा पर इतना लोकप्रिय है, हमें पता ही न था। हम ठहरे प्राचीनकाल के प्राणी, फेसबुक-व्हाट्सएप से आगे न बढ़े थे भले ही अकाउंट हर एप पर बना रखा था। उस दिन शुभ घड़ी में इंस्टा के भी भाग खुले जब अयूब ने हमारी कई सारी रीलें बनाईं और हमने इंस्टा महाराज को सौंपीं। इस मामले में ये आज की जेन-ज़ी के लोगों को साथ ले चलने का बहुत फायदा है। उसने हमें इंस्टाग्राम पर शेफ़शॉवन के पोपुलर चित्र दिखाए और हमें उन सभी बल्कि कुछ और भी नए और शोभित स्थानों पर ले गया। ऐसा भी जीवन में पहली बार हुआ था कि हम किसी शहर को इंस्टा की तस्वीरों की लोकप्रियता के अनुसार देख रहे थे।
वास्तव में यहाँ चप्पे-चप्पे पर नील बिखरा हो जैसे, ऐसा प्रतीत होता था। मानो यह जगह नीले समुद्र के अंदर है या आसमानी बादलों के ऊपर है, समझ ही न आता था। कभी लगता था कि आसमान इन पहाड़ियों की धरती पर बरस पड़ा है या समुद्र उछल के ऊपर आ बसा है। यूँ तो कई स्थानों पर नीले रंग के अलग-अलग हल्के-गहरे शेड भी मिलते थे परंतु वह सफ़ेद कपड़ों में नील लगाने वाले शाही नीले रंग से पुती दीवारों, छतों, फर्श का कोई जवाब नहीं था। हम स्वयं भी नीली नगरी में नीले कपड़े ही पहन कर गए थे तो बहुत उम्दा तस्वीरें निकलीं।
छोटी-छोटी तंग, घुमावदार, अंतहीन नीली-गीली गलियों, दरवाज़ों, मोकलों से गुज़रते हुए उसने हमें सारा शहर घुमाया। अधिकतर गलियों की ज़मीन अनगढ़ पत्थरों को सीमेंट से जमाकर बनाई गईं थीं। कभी तो बंद छत वाली कुछ गलियों में घुप्प अँधेरा और सुनसान होने से एक अनजाना डर भी लगता था फिर भी भगवान के भरोसे हम अयूब के पीछे-पीछे चलते रहे और वह हमारी तरह-तरह की स्टाइल में फ़ोटो उतारता रहा।
इंस्टा के अनुसार कई घर, जिन्होंने अपने अहातों को नीला पुतवाकर और उसे फूलदानों, नाश्ते की मेज, नक्काशीदार चायदानी, लटकते झूले, लैम्प, गमलों और दरियों से इस प्रकार सजा रखा था कि वे किसी मेहमान का स्वागत कर रहे हों और उन्हें पता ही था कि सैलानी हमारे घर की फ़ोटो अवश्य लेंगे और सोशल मीडिया पर पोस्ट करेंगे।
कई जगहों पर तो फ़ोटो लेने वाला स्थान संकरा होने के कारण लाइन लगी होती थी और नम्बर आने पर ही अयूब हमें उस जगह पर फ़ोटो के लिए ले जाता था। यह पूरा शहर एक भूल-भुलैया के समान ही था। यह सच है कि अगर हमने अयूब को साथ न लिया होता तो अंदर-अंदर घुसकर इन लोकप्रिय स्थानों और छिपे हुए नीलम व नीलमणियों को हम कभी न खोज पाते और शायद इतना प्रयास भी न करते। अयूब हमें भीड़ से बचाता हुआ ऐसे स्थानों पर पहले ले गया था जहाँ बाद में भीड़ होने वाली थी। वैसे तो वहाँ हर कोना सुरम्य, मनोहारी और चित्रात्मक था फिर भी अविस्मरणीय स्मृतियों के लिए वह हमें चुनिंदा स्थानों पर ले गया। प्रत्येक इस्लामिक शहर की भाँति ‘मदीना’ यहाँ भी शहर की सबसे शानदार मार्केट थी। इसमें नीली दीवारों पर बिक्री हेतु स्थानीय कलाकृतियाँ, फ़्रिज चुम्बक, वॉल हैंगिंग, स्कार्फ़, जैकेट, पर्स, छतरी, टॉप तथा अन्य हाथ के सामान की दुकानें थीं। एक बराबर दूरी पर दीवारों के ऊपर कतार से लगे हुए गमले और उनमें सुंदर फूल भी इसकी शोभा को बढ़ाते थे। ‘हाऊस ऑफ़ मोसाइक’ एक छोटा और तिमंजिला मकान था जिसे नीले रंग के साथ ही खूबसूरती से सजाया गया था। अंग्रेज़ी के ‘वी’ अक्षर की आकृति वाली गलियों के बीच वाले कोने पर बना होने के कारण इसका नज़ारा दोनों ओर से भरपूर मिलता था। मकान की सीढ़ियाँ घर के बाहर से ही ऊपर जाती हुई रंगीन गमलों से भरी हुई पूरी आसमानी लगती थीं।
सईद ओरेंज जूस शॉप भी कुछ कम कमाल की नहीं है। जूस तो पी ही सकते हैं पर साथ में बंदनवार के रूप में लटके संतरे और उसके पीछे से झाँकती नीली दीवार शानदार विरोधाभास पैदा करती झाँकी का आनंद भी ले सकते है। हमने यहाँ संतरे का ताज़ा जूस तो पियाही, साथ ही यही वह स्थान था जहाँ अयूब ने कई तरह की इंस्टा रील हमारी बनाईं। रील बनाने का उसका अंदाज़ बड़ा निराला था। वह कैमरे को पेंडुलम जैसा झुलाता हुआ किसी एक वस्तु के नज़दीक से दूर जाता और किसी और वस्तु के निकट जाकर रुकता। इसी दुकान के सामने शेफ़शॉवन की पेंटिंग भी दीवार पर बेचने के लिए सजी हुई थीं।
‘प्लेस एल हऊता’ एक चौराहा है जिसे ‘ऊता एल हम्माम’ भी कहते हैं जहाँ मोरोक्को के जीवन की अंदरूनी झलक मिलती है। पारंपरिक तौर पर नीले व सफेद पुते ऊँचे और एक मंजिले मकान, पर्यटकों के लिए दुकानें, रेस्तराँ तथा चौराहे के बीचों बीच फव्वारा बहुत चित्तरंजक लगता है। साथ ही खुली जगह होने के कारण नीले मकानों के ऊपर नीला आसमान और पीछे दिखती पहाड़ी चोटियाँ बहुत लुभावना दृश्य प्रस्तुत करती हैं। पूरे चौराहे की ज़मीन पर ईंटें बिछी हुई हैं। इस छोटे चौराहे पर बैठने के लिए बैंचें भी लगी हुई हैं तो अकसर राहगीर यहाँ कुछ क्षण बैठकर सुस्ताते हैं और नीले रंग की आभा का लुत्फ़ उठाते रहते हैं।
यहीं पर हमें शेफ़शॉवन का मतलब भी पता चला। अयूब ने ही हमें बताया कि इसका अर्थ है- पहाड़ की चोटी। शेफ़शॉवन रिफ़ पहाड़ों की तलहटी में 600 मीटर की ऊँचाई पर बसा हुआ है। इसके पीछे ही जेबेल-एल-कैला की चोटी दिखती है जो 1600 मीटर ऊँची है। शेफ़शॉवन के पास ही ‘तिसूका पहाड़’ भी है जो 2000 मीटर ऊँचा है।
इसके बाद हमने और भी बहुत-से नीले-नीले स्थान देखे जो निजी संपत्ति होते हुए भी सैलानियों के लिए निशुल्क दर्शन तथा फोटोग्राफ़ी के लिए उनके मालिकों ने रख छोड़े थे। हर स्थान एक से एक बढ़कर खूबसूरत था। लगता था कि मालिकों में होड़ लगी है कि कौन इंस्टा पर सबसे ज़्यादा पोपुलर है। कई स्थानों पर बैठने के लिए बेंत की कुर्सियाँ आदि भी थीं।
नीली टाइलें हों, नीला पेंट या नीले पुते दरवाज़े, इंस्टा पे पूर्वप्रसिद्ध सभी स्थल बहुत मनोहारी थे। कुछेक जगह विशिष्टता बनाए रखने को फ़िरोज़ी रंग का भी इस्तेमाल किया गया था। एक मकान के नीले दरवाज़े तक पहुँचने के लिए रंग-बिरंगी टाइल वाली सीढ़ियाँ बहुत मनभावन थीं। जब अयूब यह सब कुछ हमें घुमा कर दिखा चुका तो हमने उससे ऐसी जगह ले चलने को कहा जहाँ से पूरे शहर का दृश्य दिखता हो। उसने उँगली ऊँची कर हमें दिखाया कि वह हमें कहाँ ले जाने वाला है। कुछ नालों और नहरों के पास से गुज़रते हुए हमने पुलिया पर बैठकर तस्वीरें लीं।
दूर एक पहाड़ी की चोटी पर ‘स्पेनिश मॉस्क’ बनी हुई थी। वहाँ से शेफ़शॉवन का नयनाभिराम अविच्छिन्न दृश्य बनता है। कई पर्यटक हाइकिंग कर वहाँ जा रहे थे। इतना घूमने के बाद इतनी हिम्मत नहीं बची थी कि हम वहाँ तक चढ़ाई कर सकें तो हमने उसी पहाड़ी के सिरे पर जाना चुना जहाँ से सबसे जल्दी हमें पूरे नील-शहर के विराट दर्शन हो सकते थे। चूँकि यह स्थान बहुत ऊँचा नहीं था तो पूरे नहीं तो कुछ दर्शन हो ही रहे थे।
इसे देख कर याद आया कि जो पर्यटक ग्रीस में ‘कवाला’, ‘सेंटोरिनी’ या स्पेन में ‘हूस्कर’ जाना चाहते हों, वे शेफ़शॉवन हो आएँ, यह उनसे कहीं ज़्यादा रमणीक नीले मोतियों की माला है। हमें यहाँ से भी नज़ारा बहुत प्यारा लगा। अयूब का काम अब पूरा हो चुका था। वह हमें हमारी कार तक पहुँचाकर दूसरा ग्राहक देखने की जल्दी में लग रहा था। फिर भी हमारा लिहाज करते हुए उसने आराम से हमें कार के पास तक पहुँचाया। अब भूख हमारे सिर पर ताँडव करने लगी थी। चार बज रहे थे और हमने खाना नहीं खाया था। हमने कार के स्थान की पहचान के लिए वहाँ एक कैमिस्ट की दुकान की निशानी बनाई और रेस्टोरेंट की तलाश में निकल लिए। एक रेस्टोरेंट हमें मिल ही गया जहाँ वेज पिज्जा और फ्रेश जूस हमें तृप्त कर गया। हमने तसल्ली से खाया और अपनी तर्ज़ पर फिर से घूमने निकल गए। बाज़ार का दौरा किया। कुछ फ्रिज चुम्बक आदि खरीदे। कुछ और भी अपने हिसाब से तस्वीरें लीं। यहाँ चप्पे-चप्पे पर नीले रंग का जो सौंदर्य बिखरा पड़ा है उसे अपने कैमरे में समेटा। नीला रंग भी कितना सौष्ठव भर सकता है, यह पहली बार महसूस किया। फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए तान्जिर स्वप्न नगरी है।

अब वापसी में बादल अधिक काले होने लगे थे। कुछ शाम का धुँधलका और कुछ श्यामघन की कालिमा, हम नीलकमनीयता को आँखों में बसा कर वापस तान्जिर में अपने आवास की ओर चल पड़े। नीले-नीले शहर से अब लाल-लाल शहर में आ गए थे। आज तान्जिर में भी आसमान में बादलों का जमावड़ा था। हम शाम को भी होटल के कमरे में बैठे न रह सकते थे। आदत के मुताबिक हम तान्जिर के मुख्य तट ‘मलाबता बीच व पार्क’ में पहुँचे। हल्की बूँदा-बाँदी के बीच भी तट पर बने मलाबता पार्क में बच्चों के हुड़दंग चल रहे थे। तट पर किराए के स्कूटर व बग्गी वालों की भीड़ थी। युवा क्वैड बाइक राइड कर खुश हो रहे थे। छतरी और रोशनी वाले सजावटी रिक्शॉ भी थे। हमने ऐसे ही मजे के लिए तट के एक किनारे से दूसरे तक के लिए रिक्शॉ किया। मलेशिया के बाद मोरोक्को में रिक्शॉ की सवारी का आनंद मिला। फिर पैदल ही वापस आए और मलाबता के सामने भारतीय भोजनालय ‘क्ले ऑवन’ में रात्रिभोज के लिए गए। अंदर से इस रेस्टोरेंट की पंजाबी, राज्स्थानी और हरियाणवी मिश्रित सजावट बहुत भाई। उसमें हमने वेज बिरयानी खाई और वापस होटल आ गए।
अगले दिन होटल में नाश्ते में भी कुछ लोकल शाकाहारी व्यंजन परोसे गए थे। हमने इनका स्वाद चखा। मसिमन, हरशा, शेबाकिया, पोच्ड पेयर्स आदि। शेबाकिया एक मीठा व्यंजन है। आटे अथवा मैदा में दालचीनी, सौंफ और केसर मिलाकर गूँथा जाता है। इसकी लम्बी पट्टी बनाकर फूल की तरह लपेटा जाता है। इसे तेल में तलकर इस पर चाशनी या शहद लपेटकर सफेद तिल छिड़के जाते हैं। कुल मिलाकर यह शक्करपारे जैसा स्वाद देता है। मसिमन एक प्रकार से चीज़ की रोटी है। जैसे परांठे के अंदर थोड़ा चीज़ लपेटकर उसे चौकोर बेल लिया जाए और तवे पर सेंक लिया जाए तो मसिमन बन जाता है। मसिमन मिलने के बाद हमारे लिए परोसी जाने वाली सब्ज़ियाँ खा पाना आसान हो गया। पोच्ड पेयर्स या नाशपाती का मुरब्बा यहाँ खाने के बाद मीठे में खाया जाता है। यह शक्तिदायक और पोषण से भरपूर होता है।
आज हरशा या बतबूत टिक्की के जैसा दिखता है। यह कई प्रकार के अनाज व आटे के मिश्रण से बनता है। मक्का
का आटा इसमें मुख्य स्थान रखता है। इसमें सब्ज़ियाँ भरकर या बिना सब्ज़ी के गोल टिक्की बनाकर उथले तवे पर कम घी में सेंका जाता है। इन्हीं सब नए-नए व्यंजन के स्वाद चखे गए। आज का दिन तान्जि
में आखिरी दिन था। यह दिन यहाँ की सांस्कृतिक धरोहरों को जानने-समझने के लिए था। आज हम अपनी सूची में से ‘ला कसबाह दे तान्जिर’, ‘पैलेस दे ला कसबाह’, ‘बाब अल बहर’, ‘बाब हाहा’, ‘पैलेस मूले हाफ़िद’, ‘विला हेरिस पार्क’, ‘विला हेरिस म्यूज़ियम’ तथा कोई अच्छा-सा बीच आदि, ये सब लेकर निकले।
‘ला कसबाह दे तान्जिर’ और ‘म्यूसी दे कल्चर्स मेडिटरेनीर्म्स’ यानी संक्षेप में कसबाह म्यूज़ियम, होटल से लगभग सात किलोमीटर दूर था। आज की अन्य दर्शनीय जगहें भी आस-पास ही थीं। 15 मिनट में हम वहाँ पहुँच गए किंतु तंग गलियों से होकर गुज़रते हुए यह मुश्किल से ही हाथ आया। कुछ अन्य विदेशी पर्यटक भी रास्ते में मिले मगर हैरानी हुई कि उन्हें भी इसकी जानकारी न थी। यह अमूमन दस बजे से खुलता है। कसबाह म्यूज़ियम में भूमध्यसागरीय संस्कृति भरी हुई है जहाँ इतिहास और कला का प्रचुर संगम झलकता है। इसमें संग्रहीत वस्तुएँ कक्ष के भीतर और खुले आसमान के नीचे, दोनों प्रकार से प्रदर्शित हैं। यह पूर्व सुल्तान के महल में बनाया गया है। यह संग्रहालय सभ्यताओं के विकास के मार्ग में चौराहे की तरह तान्जिर की उपस्थिति को रेखांकित करता है। यहाँ पता चलता है कि अफ्रीका, यूरोप, एशिया ने किस प्रकार अपने सपने, भाषाएँ और संस्कृतियाँ फैलाई हैं। प्रत्येक कक्ष एक अंतरंग कहानी कहता हुआ उस संस्कृति को बखान करता है जिसने समुद्र किनारे बसे इस शहर को अद्यतन रूप दिया। यह याद दिलाता है कि तान्जिर का आकर्षण इसके श्रेष्ठ दृश्यों में ही नहीं इसके उस पक्ष में भी है जो इसके तट को इतिहास जगत से जोड़ता है।
इस संग्रहालय में कई रियाद हैं जिनका बीच वाला खुला आँगन मोज़ेक रीति में छोटी-छोटी टाइलों की पेंटिंग से बना है। अब इसके अधूरे-से प्रतीत होते उधड़े चित्र से राजाओं की वैभव गाथा और विलास प्रकृति प्रकट होती थी। तान्जिर शहर के इस्लामीकरण का इतिहास भी इस संग्रहालय में दर्ज है। किसी अन्य संग्रहालय की ही तरह इसमें भी पुराने समय के लकड़ी के नक्काशीदार दरवाज़े दीवार पर सँभालकर सजाए गए थे। चारों ओर कमरे वाले अहाते में मोज़ेक की टाइलें और खास मोरक्कन काम वाले लैम्प इत्यादि हमें पुरातन काल में ले जाते थे। हमने इसके कई कक्षों का निरीक्षण किया। तरह-तरह के पत्थर, औजार, बर्तन, मिट्टी के मर्तबान, आभूषण, भंडारगृह, भित्तीचित्र, राजाओं के सिंहासन, अस्त्र व कवच, मूर्तियों के भग्नावशेष थे। खुले आँगन में एक चबूतरे के ऊपर स्थापित एक नग्न मूर्ति ने अपनी तस्वीर लेने को बाध्य किया और जाना कि यह ईसा पूर्व के एक रोमन एथलीट की मूर्ति है जिसका मूल रूप ग्रीस में है। इस मूर्ति ने बरबस हमारा ध्यान खींचा क्योंकि ऐसी ही मूर्ति हमने बेल्जियम के एक चौराहे पर देखी थी जिसे ‘मैनिकन पिस’ कहते हैं।
इस संग्रहालय के साथ लगा हुआ था- ‘पैलेस दे ला कसबाह’। इसके यहाँ होने के कारण इस सड़क का भी यही नाम था। इस सड़क के अंत पर एक विराट दरवाज़ा लाल ईंटों का बना बाहर के दृश्य दिखाता था। वहाँ लगी भीड़ हमें अपनी ओर खींच रही थी लेकिन हमने पहले कसबाह पैलेस देखकर ही बाहर जाने का निश्चय किया।
विस्मित कर देने वाली बात यह थी कि इस महल में आर्ट गैलरी यानी कला प्रदर्शनी लगी थी सो लगे हाथ वह भी देख ली। इसमें क्यूबा के मशहूर नक्शानवीसी यानी मानचित्रकार विफ्रेडो लाम की मानचित्रकारी थी। क्यूबाई चित्रकार द्वय डोलोरे सोल्डेविला और संदु डार्ले की रीति से हटकर बनी कलात्मक पेंटिंग भी लगी थीं। बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में क्यूबाई कला में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। आकृतीय कला के वर्चस्व के विपरीत कलाकारों ने अमूर्त और भावनात्मक चित्रकारी को अपनाया। उपरोक्त दोनों चित्रकार ने इसी क्यूबाई कला को श्रद्धांजलि देते हुए नए मूल्यों और मान्यताओं को दर्शाया है जिसमें मूर्त रूप के स्थान पर प्रकाश, रंग और निराकारजन्य भावों को प्रधानता मिली है। कुछ ऐसे ही विचित्र चित्रों का उल्लेख भी किए देती हूँ। लकड़ी के फ्रेम में कसे हुए लकड़ी की छोटी-छोटी टाइलों से ज्यामितीय आकृतियों का निर्माण, ऐसी पेंटिंग से एक दीवार पूरी भरी थी। पर्यावरण को बचाते हुए कुछ अपशिष्ट अथवा व्यर्थ पदार्थों के इस्तेमाल से भी पेंटिग की रचना की गई थी। एक चित्र में समुद्र में बहती एक नाव को पोथियों व ग्रंथों से लदा हुआ दिखाया गया था। यह तैल-चित्र वाकई में बहुत कुछ कहता है। एक चित्र में हवाईजहाज जैसी आकृति के भीतर बहुत सी मानवीय आकृतियाँ पलायन, आप्रवासन और शरणार्थ के भावों को प्रदर्शित कर रही थीं। ऐसे भाव-प्रवण चित्रों से प्रदर्शनी भरपूर थी। कलाकृतियों में ठठेरे, लुहार, बढ़ई आदि के काम की कलाकृतियाँ भी मौजूद थीं।
कुछ ही चित्रों में बहुत-सा संसार समझकर हम बाहर आए और ‘बाब अल बहर’ के नीचे से दीवार के उस ओर पहुँचे तो वहाँ का नज़ारा देख हमारी आँखें आश्चर्य से फैल गईं। कसबाह छोटी पहाड़ी पर होने का तो अनुमान हमें था किंतु यह पहाड़ी के उस छोर पर है कि यहाँ के बहर बाब से पूरा तान्जिर पोर्ट दिखता होगा, यह अंदाज़ा हमें नहीं था। हालाँकि हमें नाम से यह स्वयं ही जान लेना चाहिए था। ‘बाब’ का अर्थ दरवाज़ा भी हमें मालूम था और ‘बहर’ का अर्थ समुद्र भी।





‘बाब अल बहर’ एक बहुत बड़े किले की ऊँची दीवार में बना था अत: उस ओर समुद्र होगा जिसे हम ऊँचाई से देख रहे होंगे, यह अहसास बहुत लुभावना था। यहाँ से तान्जिर के बंदरगाह का पूरा विहंगम दृश्य मिलता था। यहाँ तक कि बंदरगाह पर आए एक विराट क्रूस शिप का लुत्फ़ भी मिल रहा था। बंदरगाह पर जहाजों के खड़े होने की जगहें, मरम्मत के स्थान और सामान चढ़ाने-उतारने के डॉक सब बहुत साफ़ दिखाई दे रहे थे। लगता था कि हम हॉट एयर बेलून से यह सब देख रहे हों। यहाँ पर कुछ स्थानीय समान की बिक्री वाले भी मौजूद थे। हम काफ़ी देर तक इस दृश्य को एकटक निहारते रहे।
यहाँ से बाहर निकलकर सामने ही ‘बाब हाहा’ भी देखा। वह अब बहर दरवाज़े के तुलना में तुच्छ प्रतीत हुआ। इसका महत्त्व यही था कि यह ऊँचाई से नीचे कसबाह की रिहाइश की ओर ले जाता है। एक बार फिर कसबाह मदीना से गुज़रते हुए हमने कुछ बहुत ही आकर्षक मार्केट और दुकानों के चित्र निकाले। कुछ स्थानीय लोगों के साथ बातचीत की और उनकी सहमति से उनके चित्र भी उतारे। हमारा अगला पड़ाव ‘पलेस मूले हाफ़िद’ था। पलेस स्पेनी भाषा का शब्द है जो अंग्रेज़ी में पैलेस हो जाता है। यह यहाँ से लगभग 3 किलोमीटर दूर पहाड़ी सड़कों पर 12 मिनट का ड्राइव कर के था। कार खड़ी करने की समस्या को देखते हुए कुछ दूरी पर ही जैसे ही जगह मिली, कार टिका
ई और पैदल ही हम इस नए महल को देखने के लिए निकले। उसके पास पहुँच कर जाना कि इसे अब इटालियन इंस्टीट्यूशन में बदल दिया गया है और इंस्टीट्यूशन बंद होने के कारण यह बंद था किंतु हमने हार नहीं मानी और इसके रख-रखाव करने वाले मोरक्कन व्यक्ति से बातचीत की। उसने हम पर दया दिखाते हुए हमें इसमें पीछे से आने का रास्ता दिखाया और हमारे गाइड की तरह हमें सारी जानकारी दी। पैलेस मूले हाफ़िद एक शानदार महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक महल है। इसका निर्माण 1912 में इटली के स्थापत्य कला के आधार पर, सुल्तान अब्दल हाफ़िद की रिहाइश के लिए हुआ था। इसमें बड़े-बड़े कमरे गैलरी से बँधे हुए कतार में हैं। चारों ओर कमरे और बीच में एक बड़ा सा बगीचा है। ऊँचे कमरों में मंत्रमुग्ध करने वाला रंगीन टाइल तथा प्लास्तर का काम है, संगमरमर के फर्श व लकड़ी की नक्काशी की छतें हैं। प्रत्येक कमरे की छत से लटकता हुआ बेशुमार खूबसूरत मोरक्कन झूमर है। इन बड़े-से कमरों की खिड़कियाँ बाहर गैलरी में और गैलरी के खम्भों के बीच के झरोखे बगीचे में खुलते हैं। इन कमरों के दरवाज़े बहुत कलात्मक थे। सफेद महल में लाल-पीले रंग के दरवाज़े बहुत आकर्षक लग रहे थे। गैलरी के एक सीध में लगे हुए खम्भे दूर तक जाते बहुत सुंदर लग रहे थे। गैलरी से चार सीढ़ियाँ नीचे उतर बगीचे की प्राकृतिक शोभा को फव्वारों, चबूतरों, बैंचों और चलने के लिए गलियारों की मदद से और खूबसूरत बनाया गया था। फूलवाले पौधों से लेकर बड़े पेड़ इसमें थे। मजे की बात यह थी कि महल के रखवाले ने हमें इसके बारे में बहुत विस्तार से बताया किंतु वह अंग्रेज़ी ज़ुबान न जानता था तो सब कुछ अरबी में ही बताया जिसमें से कुछ हमारे पल्ले पड़ा और बहुत कुछ सिर के ऊपर से निकल गया।
अब दोपहर हो चुकी थी और हमें शाम को बुलेट ट्रेन से वापस कासा के लिए निकलना था तो हमने होटल जाकर चेक-आऊट किया और ‘क्ले ऑवन’ में खाना खाया। इसके बाद हमें ‘विला हैरिस’ देखना था जिसके सामने से इन चार दिनों में कई बार गुज़रे थे। यह एक बिना बाऊंड्री वाला खुला बड़ा पार्क था। जिसमें पूरे मैदान में घास का कालीन बिछा था। नए पौधों से लेकर शताब्दी पुराने पेड़ भी अपनी उपस्थिति पर इतरा रहे थे। पार्क के मध्य ‘विला हैरिस म्यूसी’ नामक एक संग्रहालय भी था। आज की तारीख में बहुत संग्रहालय हो गए थे तो और देखने की हमारी इच्छा न थी। हमने पार्क में खेलते और झूला झूलते बच्चों को देखकर मन बहलाया और कुछ झूलों पर स्वयं भी झूले। वहाँ पर बच्चों के आसपास ही घोड़ेवाले बच्चों को लालायित करते घूम रहे थे। कुछ बच्चे घोड़ों की सवारी भी कर रहे थे। बहुत-से वृद्धजन समय गुज़ारने के लिए पार्क में थे। पार्क में चहलकदमी करते-करते जब हम दूसरे छोर पर पहुँच गए तो हमने कुछ देर समुद्र तट पर बिताने का निश्चय किया। यहाँ से सामने ही ‘कसीनो तान्जिर’ की ओट में ‘घंदूरी बीच’ था। हमने वही चुना। इस पर कोई भीड़-भाड़ और शोर-शराबा न था। इस बीच पर विशाल चट्टानें इसे नैसर्गिक रूप से रमणीय बनाती थीं।


हम ऊँचाई वाली चट्टान पर, जिस पर आसानी से चढ़ा जा सके, चढ़कर बैठ गए ताकि दूर तक और दूर से आती-जाती समुद्री लहरों का आनंद ले सकें। लहरों का पानी चट्टानों की जमीन से दूर तक ही आ-जा रहा था तो हम निश्चिंत और सुरक्षित अनुभव कर रहे थे। ठंडी हवाएँ थपेड़े मार रही थीं। कुछ-कुछ घटाएँ भी हो चलीं थीं और हल्की बूँदा-बाँदी का अहसास होने लगा था। थोड़ी ही देर में समुद्र ने जैसे आक्रोश जताना शुरु किया और लहरों ने विशाल रूप धर चट्टान के ऊपर तक उछाल मारना शुरु कर दिया। ये लहरें जैसे ऊँची चट्टान पर झपट्टा सा मारने लगी थीं। पहले भी ऊँची लहरें देखी थीं लेकिन आज लहरें पिछले कुछ दिनों की तुलना में अप्रत्याशित रूप से अधिक ऊँची और रौद्र प्रतीत हो रही थीं। यहाँ हमने बहुत हैरतंगेज़ अनुभव किए जब लहरों ने एक विशालकाय दीवार का रूप लेकर तट की ओर बढ़ना शुरु किया और हम कुछ सोच-समझ पाते. इससे पहले ही उन 20-25 फुट ऊँची लहरों ने सहसा चट्टानों की कई मंज़िलें चढ़कर हमें सिर से पैर तक भिगो दिया। उनकी तीव्रता और गति इतनी प्रचंड थी कि वहाँ से हटने का मौका ही न था। उनका विकराल रूप मुझे साक्षात यमराज के दर्शन ही करा गया था। यह ही शुक्र की बात रही कि वे लहरें अपने साथ बहा न ले गईं। हमारे सारे बदन में झुरझुरी-सी दौड़ गई। उस खौफ़नाक दृश्य की कल्पना आज भी कँपा देती है।
कुछ देर वहीं हतप्रभ से बैठ हमने देखा कि समुद्र अब शांत हो चला है। जाने क्या प्राकृतिक हलचल हुई और वह आपदा उस क्षण ही बरसी थी, उसके बाद वह पुन: स्वाभाविक लहरों के रूप में आ गई। कुदरत की ऐसी शैतानी सुनी तो बहुत बार थी किंतु स्वयं ऐसी भयावहता से साक्षात्कार होगा, ऐसा न सोचा था। जान बची और लाखों पाए, वाली अनुभूति हो रही थी। गीले कपड़ों में ठंड लग रही थी तो हमने लिबास बदलने के लिए फिर से होटल की शरण ली। होटल के कर्मचारी भी यह किस्सा सुनकर स्तब्ध थे। हम स्वयं अभी तक सदमे में थे। हमारे पास अभी कुछ समय बाकी था किंतु अब हमारी हिम्मत जवाब दे चुकी थी। कपड़े बदलकर हमने होटल में ही कुछ देर विश्राम किया। वह खौफ़नाक दृश्य भुलाए न भूलता था। कॉफ़ी के मग में अपने आप को भुलाकर हमने तान्जिर से निकलने का काम किया।
किराए की कार को उसकी कम्पनी को लौटाया और टैक्सी पकड़ ‘तान्जिर विले रेलवे’ स्टेशन पर आ गए। स्टेशन पर बनी मॉल का मुआयना करने को भी हमें काफ़ी समय मिल गया। वहाँ के लगभग सभी शोरूम की अच्छी तरह पड़ताल की। एक सोरूम में अच्छी जैकेट मिल गई सो वह खरीद ली। निर्धारित बुलेट ट्रेन में सवार हुए। ट्रेन में हमारी मुलाकात हमारे सामने वाली सीट पर विराजी मोरक्कन माँ-बेटी से हुई। वे हम भारतीयों को मोरक्को में देखकर बहुत उत्साहित थीं। उन्हें यह जानकर अच्छा लगा कि हमने पूरे आठ दिन मोरक्को में गुज़ारे हैं और चार मुख्य शहरों का आनंद लिया है। उन्होंने हमें अगली बार ‘फैस’ और रेबात’ भी घूम आने की सलाह दी। बातचीत करते समय का पता नहीं चला और हम रात नौ बजे तक कासाब्लांका पहुँच गए। इस दिन के लिए भी आइबिस होटल में कमरा आरक्षित कर छोड़ा था क्योंकि स्टेशन से सटा हुआ होने के कारण इसके लिए टैक्सी आदि की आवश्यकता न थी। वहीं रैन बसेरा किया। इसके बाद एक दिन कासाब्लांका में पुन: गुजारकर अपनी प्रिय टर्किश एयरलाइन से दुबई लौट आए।
डॉ. आरती लोकेश
दुबई, UAE