बहुत सारे लोग पूछते हैं – कैसा चल रहा है आपका पोस्टपार्टम
और मदरहुड का सफ़र?
शिक़ायतें तो बहुत हैं, मगर ज़िंदगी से कोई शिक़ायत नहीं।
क्योंकि इस बार हमने कुम्हार का क़िरदार निभाया है।
एक नन्हे से जीवन को आकार दिया है,
उसे गढ़ा है, सँवारा है और अब उसे बेहतर बनाने में व्यस्त हूँ।
उस पर संस्कारों की सुंदर परत चढ़ा रही हूँ
उसे प्रेम से सजा रही हूँ
उसे इतना चमका रही हूँ कि कल
वह किसी और के जीवन की रोशनी बन सके।
उसे इतना मजबूत बना रही हूँ कि वह
किसी और के जीवन को सँवार सके
शिकायतों की गठरी खोलकर बैठूँगी
तो शायद सूची बहुत लंबी होगी।
इसलिए फिलहाल उसे एक कोने में बाँधकर
ताख पर रख दिया है।
अभी तो मेरा मन
इस गढ़े हुए, सुंदर, नन्हे से जीवन को
और भी बेहतर बनाने में लगा है।
और हाँ, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि
मैंने खुद को भुला दिया है।
ना – बिल्कुल नहीं।
बल्कि इस सफ़र में मैंने
खुद का एक अलग ही रूप पाया है।
एक ऐसा रूप, जो पहले से थोड़ा ज़्यादा धैर्यवान है
थोड़ा ज़्यादा मजबूत है
और शायद पहले से कहीं ज़्यादा प्रेम करना जानता है।
एक थकान ऐसी भी होती है
जिसे शिक़ायत नहीं, मुस्कान में बदलना आता है।
एक थकान ऐसी भी होती है,
जो हर मुश्किल को हँसकर गले लगा लेती है।
ये माँ की थकान ही तो है,
जो ख़ुद थककर भी दुनिया को सँभालने,
उसे सहलाने और उसमें रोशनी भरने का साहस देती है।
शायद यही मदरहुड है
खुद को खोना नहीं,
बल्कि अपने भीतर एक नई माँ को पाना।

अंकिता ‘साहिबा’, ब्रिटेन