कविता: मीरांगिणी – प्रदीप अग्रवाल 

ए मेरी मीरांगिणी
इतना भी न कर प्रेम मुझसे
कि मेरे मौन को फिर से
स्वर लेना पड़ जाए।

ए मेरी मीरांगिणी
इतना भी न कर प्रेम मुझसे
कि फिर से मुझे
अवतार लेना पड़ जाए।

अंतरा १ (कृष्ण)

मैं जो सर्वत्र हूँ, अनाम हूँ
तेरी एक दृष्टि में ठहरता हूँ।
तेरी भक्ति के तप में
निराकार होकर भी
छाया ढूँढने लगता हूँ ।

मैं लीला बनकर आया था
बंधन से परे रहने को
पर तेरा प्रेम
मुझे फिर से
मर्यादा सिखाने लगता है।

अंतरा २ (मीरा)

यदि तुम ठहरते हो प्रभु
तो वह मेरी चाह नहीं
तुम्हारी ही लीला का
एक विराम है।

मैंने तो प्रेम किया है
न कोई प्रश्न है
और न ही कोई सीमा

मैंने तो बस तुम्हें
हर श्वास में जिया है
पत्थर में नहीं, शास्त्र में नहीं
अपने अस्तित्व में उतारा है।

तुम कहते हो — “इतना मत चाहो”
पर मुझसे प्रेम का माप मत पूछो
जहाँ तुम हो, वहीं मेरी मुक्ति है

वहीं मेरा धाम है
और जहाँ मैं हूँ
वहीं तुम्हारी लीला पूर्ण होती है।

ए मेरी मीरांगिणी
इतना भी न कर प्रेम मुझसे
कि ईश्वर को फिर से
मनुष्य न होना पड़ जाए।

Pradeep Aggrawal

कवि: प्रदीप अग्रवाल, लंदन

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