कविता: थोड़ा पास आओ तो बात बन जाए – विवेक मिश्रा

थोड़ा पास आओ तो बात बन जाए
थोड़ा मुस्करायो तो बात बन जाए
रिश्तों में कड़वाहट अच्छी नहीं होती
थोड़ा मिठास ले आओ तो बात बन जाए।


जिंदगी सिखाती है जीने के सब सबक
तुम भी समझ जाओ तो बात बन जाए
दोस्तों की भीड़ लगाने से कुछ नहीं होता
कोई एक दोस्त बनाओ तो बात बन जाये।


दुनिया में कोई ऐब होता नहीं बुरा
वक्त रहते निकल आओ तो बात बन जाए
वक्त नहीं चलता कभी अपने हिसाब से
थोड़ा तुम ही बदल जाओ तो बात बन जाए


तुम ढूंढते हो जो सुकून दुनिया की भीड़ में
खुद में उसे पाओ तो बात बन जाए
दौलत और शोहरत ही काफी नहीं होती
जिंदगी खुल के जी पाओ तो बात बन जाए


अपने लिए किया तो क्या किया तुमने
भला औरों का कर जाओ तो बात बन जाए
यादों में डूब जाने से कुछ नहीं होता
किसी को याद रह जाओ तो बात बन जाए।


दुनिया की इस भीड़ में सब खो गए जैसे,
किसी को ढूंढ कर लाओ तो बात बन जाए
नफरतों से नहीं प्यार से चलती दुनिया
जो थोड़ा प्यार फैलाओ तो बात बन जाए।


इस फेसबुक और वाट्सअप ने कर दिया खत्म,
पुराना वक्त फिर लाओ तो बात बन जाए
इश्माइली के दौर ने लिखना भुला दिया
कोई एक गीत लिख पाओ तो बात बन जाए।

कवि: विवेक मिश्रा, लंदन

विवेक मिश्रा, लंदन
विवेक मिश्रा, लंदन

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