नीली कश्मीरी आँखों ने
आज़ाद सा ख़्वाब सजाया था,
जब वीर मराठों ने माथे
केसरिया तिलक लगाया था।
उत्तर के उजले हिम से पिघल
जब गंगा नीचे आती है,
पंजाब की बलिदानी धरती,
धानी सी चुनर लहराती है।
मरु से तपती तलवार प्रखर
रजवाड़ी शान कहाती है
बंगाल की माँग में सिंदूरी
क्रांति की लाली सजाती है।
तब लाल किले की प्राचीरें
जन मन की धुन बिखराती है
दिल बनकर बसी हुई दिल्ली
आज़ादी याद दिलाती है।
दो ख़ून मुझे, आज़ादी लो
नारा नेताजी लगाते हैं
सुखदेव, भगत, आज़ाद, पटेल,
माटी को तिलक बनाते हैं।
हे ब्रह्मपुत्र तेरे पानी में
दांडी का नमक घुल जाता है
एक मोहन चंपारण आकर
महात्मा बनकर जाता है।
जहाँ राजमहल के राजकुंवर
पा ज्ञान शुद्ध हो जाते हैं
उस गया की पावन धरती पर
सिद्धार्थ बुद्ध बन जाते हैं।
गंगा की हर हर काया में
काशी जब भस्म लगाती है
उज्जैन की ओजस्वी धरती
महाकाल का वंदन गाती है।
अपने आलय जाकर मेघा
जब राग मल्हार सुनाता है
रोम रोम इस धरती का
प्रेम से भीग जाता है।
आकाश कुसुम सी कावेरी
कितनों का मन ललचाती है
अपनी कंचन की काया से
सीमाएँ छूकर जाती हैं।
ईश्वर के अपने ही घर में
जब शारद सुर में गाती हैं
दक्षिण की कन्या पुलकित हो
हिंदसागर गले लगाती है।
माला के मोती से बिखरे
कुछ द्वीप सुदूर मुस्काते हैं
जय हिंद के नारे लगा रहे
हिंद में ही गोते खाते हैं।
है बाँह पसारे सागर में
माँ भारती प्रेम लुटाती है
रिपु लिपटे तन से काँटों से
उन पर भी स्नेह लुटाती है।
धरती-अंबर परिवार मेरा
ये भाव भारती लाती है
जिस देह में बसते देश कई
उसे एक गणतंत्र बनाती है।
आराधना झा श्रीवास्तव