दुर्गा सप्तशती: ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी

ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते।।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

नव दुर्गा की पूजा या नव रात्र के दिनों में – माँ दुर्गा की आराधना और “दुर्गा सप्तशती” के ये श्लोक ना सुनने में आए, ना पढ़ें जाएँ ऐसा बहुत कम होता है। दुर्गा सप्तशती मार्कण्डेय पुराण के लगभग सात सौ श्लोकों का संकलन है। इसके तेरह अध्याय तो हैं ही इसके अलावा कुछ बहुत ही प्रसिद्ध श्लोक व स्तुतियाँ, महात्म्य हैं जैसे कीलक, कवच, अर्गला एवं कुञ्जिका स्तोत्र आदि।

माँ दुर्गा का सिंह पर आरूढ़ होना साहस का प्रतीक है। उनके हाथों में धारण किए गए शस्त्र अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की याद दिलाते हैं। उनका मातृरूप करुणा और संरक्षण का संदेश देता है। और महिषासुर पर उनकी विजय यह प्रेरणा देती है कि अहंकार और अत्याचार कितना भी शक्तिशाली क्यों न दिखाई दे, उसके सामने सत्य, साहस और सामूहिक संकल्प की भूमिका कभी समाप्त नहीं होती।

इसके देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र हमें संयमित, विनीत और विनम्रता का भाव सिखाता है:-

न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो

न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः ।

न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलापनं

परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम्॥

हे माता! न तो मैं मंत्र जानता हूँ और न ही यंत्र। मुझे तुम्हारी स्तुति (बड़ाई) करना भी नहीं आता। न तो मैं तुम्हारा आह्वान करना जानता हूँ, न ध्यान लगाना और न ही कोई पौराणिक कथा। मुझे तुम्हारी पूजा की मुद्राएँ और विलाप (करुण पुकार) भी ज्ञात नहीं हैं। हे माँ! मैं तो बस इतना जानता हूँ कि तुम्हारी शरण में जाने से सारे क्लेश (दुख) दूर हो जाते हैं।

इसी स्तोत्र में आगे की पंक्तियाँ बहुत प्रसिद्ध हैं: “कुपुत्रो जायेत क्वचिदपिकुमाता न भवति” (पुत्र कुपुत्र हो सकता है, लेकिन माता कभी कुमाता नहीं होती)

नवरात्रि के दिनों में मंदिरों से लेकर घरों तक दुर्गा सप्तशती का पाठ सुनाई देता है। कहीं दीप प्रज्वलित होते हैं, कहीं चंडी पाठ होता है और कहीं भक्त माँ के चरणों में अपनी मनोकामनाएँ अर्पित करते हैं। किंतु दुर्गा सप्तशती का महत्त्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। यह ग्रंथ मनुष्य के भीतर चलने वाले संघर्ष, समाज में व्याप्त बुराइयों और धर्म तथा अधर्म के बीच के द्वंद्व को समझने का एक गहन आध्यात्मिक आधार भी प्रस्तुत करता है।

जिस प्रकार योग कर्म का सर्वोत्तम ग्रंथ गीता है उसी प्रकार ‘दुर्गा सप्तशती’ शक्ति उपासना का श्रेष्ठ ग्रंथ माना जाता है।

 

आज के समय में, जब तकनीकी प्रगति के साथ-साथ मानसिक तनाव, सामाजिक असमानता, हिंसा, नैतिक संकट और असुरक्षा जैसी चुनौतियाँ भी हमारे सामने हैं। तब दुर्गा सप्तशती का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है। श्री मार्कंडेय पुराण में शक्ति की उपासना 700 श्लोकों में की गयी है। यही भाग सप्त+शती यानी सप्तशती बन गया। वैसे तो ये साकार ब्रह्म का ग्रंथ है लेकिन ईश्वर के निराकार होने की पुरज़ोर घोषणा भी करता है। पहले ही अध्याय में मेधा ऋषि बताते हैं कि ये देवी सभी प्राणियों में वास करती हैं। संपूर्ण ब्रह्माण्ड इन्ही की रचना है। ये ही सभी को मोह में डाल कर संसार का संचालन करती हैं और जिसपर ये प्रसन्न होती हैं उन्हें मोह से मुक्त कर देती हैं।

यानि इसकी यदि आप व्याख्या करें तो इस संसार में जितने भी पदार्थ है सब पंच तत्वों से बने हैं और उन सबमें माता चेतना रूप से व्याप्त है। यही उनका वास्तविक रूप है। अर्थात् इन्ही पंच तत्वों व सभी प्राणियों में चेतना रूप से उनकी आराधना करना ही उनकी सच्ची आराधना है।

यही बात यदि आप इस ग्रंथ से समझ जायें तो यही उसका समुचित लाभ है, निश्चित आपकी आध्यात्मिक उन्नति होगी।

कुञ्जिका स्तोत्र दुर्गा सप्तशती (चंडी पाठ) का एक अत्यंत शक्तिशाली और गोपनीय स्तोत्र है, जिसे माँ दुर्गा की कृपा शीघ्र प्राप्त करने का मार्ग माना जाता है। इसे सप्तशती का “संक्षिप्त बीज मंत्र रूप” कहा जाता है, और इसका पाठ करने से दुर्गा सप्तशती के संपूर्ण पाठ के समान फल प्राप्त होता है।

दुर्गा कवच कवच का पाठ शरीर, मन और प्राणों की रक्षा के लिए किया जाता है। इसके पाठ से नकारात्मक ऊर्जा, भय, शोक और शत्रुओं से सुरक्षा मिलती है। इसमें नौ दुर्गाओं (शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री) का वर्णन और उनसे रक्षा की प्रार्थना होती है।

अर्गला स्तोत्र: अर्गला का शाब्दिक अर्थ ‘दरवाजे की कुंडी या सांकल’ होता है। जिस प्रकार बिना कुंडी खोले घर में प्रवेश नहीं किया जा सकता, उसी तरह अर्गला स्तोत्र से महाशक्ति की कृपा का द्वार खुलता है। इसमें बार-बार यह प्रार्थना की जाती है:“रूपंदेहिजयंदेहियशोदेहिद्विषोजहि“

अर्थात: हे माँ! मुझे रूप दें, जय दें, यश दें और शत्रुओं का नाश करें।

कीलक स्तोत्र: कीलक का अर्थ है ‘कील’ या ‘बंधन’। जिस प्रकार किसी वस्तु को कील से जड़ दिया जाता है, उसी प्रकार दुर्गा सप्तशती के मंत्रों की शक्ति को कीलक द्वारा बांधा या केंद्रित किया जाता है ताकि साधना का पूरा फल साधक को प्राप्त हो सके

इस पवित्र ग्रंथ को तीन मुख्य भागों—प्रथम चरित्र (महाकाली), मध्यम चरित्र (महालक्ष्मी), और उत्तम चरित्र (महासरस्वती) में विभाजित किया गया है। संक्षेप में इनके अध्याय:

1. प्रथम चरित्र (गोंड/महाकाली स्वरूप)

  • अध्याय 1 (मधु-कैटभ वध): भगवान विष्णु के योगनिद्रा में होने पर उनके कान के मैल से उत्पन्न मधु और कैटभ नामक असुरों का वध करने के लिए माँ महाकाली प्रकट हुई थीं।

2. मध्यम चरित्र (महालक्ष्मी स्वरूप)

  • अध्याय 2 (महिषासुर की सेना का वध): महिषासुर के अत्याचारों से तंग आकर सभी देवताओं ने अपने तेज को सम्मिलित किया, जिससे देवी दुर्गा प्रकट हुईं। इस अध्याय में देवी और महिषासुर की सेना के बीच भीषण युद्ध का वर्णन है।
  • अध्याय 3 (महिषासुर वध): माँ दुर्गा अत्यंत उग्र रूप धारण कर महिषासुर के सेनापतियों और अंत में महिषासुर का वध करती हैं।
  • अध्याय 4 (इन्द्रादि देवताओं द्वारा देवी स्तुति): महिषासुर के वध के बाद प्रसन्न होकर इंद्र सहित सभी देवता माँ दुर्गा की स्तुति करते हैं, जिसे ‘शक्रादि स्तुति’ भी कहा जाता है

3. उत्तम चरित्र (महासरस्वती स्वरूप)

  • अध्याय 5 (देवताओं द्वारा देवी की स्तुति और दूत संवाद): शुम्भ-निशुम्भ के अत्याचारों से पीड़ित देवता हिमालय पर जाकर माँ पार्वती की स्तुति करते हैं। देवी अत्यंत सुंदर रूप (अम्बिका) धारण करती हैं और शुम्भ का दूत सुग्रीव उनके पास विवाह का प्रस्ताव लेकर आता है, जिसे माँ ठुकरा देती हैं।
  • अध्याय 6 (धूम्रलोचन वध): शुम्भ के आदेश पर जब असुर धूम्रलोचन माँ दुर्गा को बलपूर्वक पकड़ने आता है, तो देवी अपनी एक ही हुंकार से उसे भस्म कर देती हैं और उनकी सिंह सेना बाकी असुरों का नाश करती है।
  • अध्याय 7 (चण्ड-मुण्ड वध): जब असुर चण्ड और मुण्ड देवी पर आक्रमण करते हैं, तो माँ के ललाट से अत्यंत उग्र रूप वाली देवी कालिका (काली) प्रकट होती हैं। वे चण्ड-मुण्ड का वध करती हैं, जिसके कारण उनका नाम ‘चामुण्डा’ पड़ता है।
  • अध्याय 8 (रक्तबीज वध): इस अध्याय में महापराक्रमी असुर रक्तबीज के साथ युद्ध का वर्णन है, जिसके रक्त की हर एक बूंद जमीन पर गिरने से नया राक्षस पैदा हो जाता था। माँ काली उसका सारा रक्त जमीन पर गिरने से पहले ही पी जाती हैं और उसका वध करती हैं।
  • अध्याय 9 (निशुम्भ वध): इस अध्याय में देवी और असुर राजा शुम्भ के भाई निशुम्भ के बीच भयंकर युद्ध होता है और अंततः माँ दुर्गा उसका संहार करती हैं।
  • अध्याय 10 (शुम्भ वध): भाई निशुम्भ की मृत्यु के बाद शुम्भ अकेला युद्ध के मैदान में आता है। माँ दुर्गा अपने सभी रूपों (नवदुर्गा/मातृकाओं) को स्वयं में समाहित कर लेती हैं और अकेले ही शुम्भ का वध कर त्रिलोकी को भयमुक्त करती हैं।
  • अध्याय 11 (नारायणी स्तुति): शुम्भ-निशुम्भ के वध के बाद समस्त ब्रह्मांड में खुशहाली छा जाती है और सभी देवता मिलकर माँ की पावन ‘नारायणी स्तुति’ करते हैं। माँ प्रसन्न होकर उन्हें भविष्य में भी संकट के समय रक्षा करने का वरदान देती हैं।
  • अध्याय 12 (देवी-चरित्र के पाठ का महात्म्य): इसमें स्वयं माँ दुर्गा इस सप्तशती पाठ की महिमा और इसके श्रवण एवं कीर्तन से मिलने वाले फलों और लाभ (फलश्रुति) के बारे में बताती हैं।
  • अध्याय 13 (सुरथ और वैश्य को वरदान): कथा के अंत में, महर्षि मेधा की बातें सुनकर राजा सुरथ और वैश्य समाधि नदी तट पर माँ की मिट्टी की मूर्ति बनाकर घोर तपस्या करते हैं। माँ प्रसन्न होकर प्रकट होती हैं और राजा सुरथ को उनका खोया राज्य (और अगले जन्म में सावर्णि मनु होने का वरदान) तथा वैश्य को संसार के मोह से मुक्ति और मोक्षदायी परम ज्ञान प्रदान करती हैं।

इस तरह दुर्गा सप्तशती मुख्यतः दुर्गाश्तोत्तरशतनाम स्त्रोत्र से लेकर कुञ्जिका स्तोत्र के बीच कई अलौकिक श्लोकों एवं स्तोत्र पाठों का संकलन है। इसका का संदेश यही है कि शक्ति का सर्वोच्च रूप विनाश नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा, जीवन का संरक्षण और कल्याण की स्थापना है।

माँ दुर्गा की आराधना तभी सार्थक है, जब हमारे भीतर का भय साहस में, अहंकार विनम्रता में और स्वार्थ सेवा में परिवर्तित हो जाए।

यही शक्ति की साधना है, यही संस्कृति का सार है और यही माँ दुर्गा के संदेश की शाश्वत प्रासंगिकता है।

आप सभी पर माँ दुर्गा का आशीर्वाद बना रहे।

ashish mishra
namsastey bharat

8 thoughts on “दुर्गा सप्तशती: ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी”

  1. Bahut sundar vyakhya maa k divy rupo ki. Saralta k saath sankshipt me poora saar likh diya , maa Jagat janni sada aapk saath hain. Jai Ambe

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  2. अत्युतम संपादकीय, सप्तशती का सार्थक विवेचन, धन्यवाद और बधाई

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  3. आशीष जी,

    सर्वप्रथम आपको इस सुन्दर पत्रिका के लिए अशेष बधाई 🙏🎉

    मैंने पहली बार “दुर्गा सप्तशती” को पढ़ा।
    आपने संक्षेप में हर अध्याय की जानकारी दी।यह ज्ञानवर्धक है उनके लिए जो विस्तार से नहीं जानते।
    सर्व कल्याण की भावना यही तो धर्म का मूल है। माॅं दुर्गा की उपासना जो भी मन से करता होगा।नि: संदेह वो स्त्री का सम्मान करता होगा।
    स्तोत्र की शक्ति, सत्य की, न्याय की, मानवता की है।
    अभी बस सम्पादकीय ही पढ़ा है।
    शेष रचनाएं भी पढ़ती हूं।
    पत्रिका का प्रारूप सुन्दर, सरल,सुगठित है।

    हार्दिक शुभकामनाएं

    ख़ुदेजा
    जगदलपुर/छत्तीसगढ़/भारत

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    • ख़ुदेजा जी नमस्कार, आपने पढ़ा भी और समझा भी। सच कहा आपने – धर्म सर्व कल्याण को बात करता है, संभाव की बात करता है। विशेष टिप्पणी के लिए धन्यवाद 🙏

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