कहानी: वापसी का सुख – डॉ. मनोज मोक्षेंद्र

कोई चौदह साल का होते-होते उसमें से बचपना तो गायब ही हो चुका था और वह हर बात को तर्क के आधार पर आंकने लगा था। पापा ने बार-बार उसे समझाया कि आम ज़िन्दगी में सब-कुछ तर्क के अनुसार नहीं चलता। भावना और जज़्बात के मुताबिक भी चीज़ों को आँकना चाहिए। पर, उसमें तो मैच्युरिटी समय से दस साल पहले ही घर करने लगी थी। माँ पूजा करके किसी और काम में लग जाती तब तक मंदिर में चढ़ाया हुआ प्रसाद कोई चूहा घसीट ले जाता। तब वह बड़े मज़ाकिया लहज़े में प्रसाद वाली खाली तश्तरी माँ के पास ले जाकर दिखाता, “देखो मम्मी, भगवान ने अभी भोग भी लगाया नहीं था कि चूहे महाराज उसे अपनी खुराक बना ले गए। भला, ऐसे भगवान की पूजा करने से क्या फ़ायदा जो अपने भोजन को चूहे से भी नहीं बचा सकते।” 

माँ कहती, “शुभ-शुभ बोलो बेटा! भगवान के बारे में ऐसे ख़यालात नहीं रखते। वरना, कोई अनिष्ट हो जाएगा।” 

वह था तो बालक ही; पर, माँ की प्रतिक्रिया पर एक सयाने की भांति ठहाके लगाने लगता, “वाह, भगवान उस चूहे का तो कुछ भी नहीं बिगाड़ सके जो उन्हें भूखा रख गया।”

बालिग होते-होते उसे तो अपने धर्म और समाज की सारी बातें ही बकवास लगने लगी। जब रंगभरी होली आती तो वह खुद को कमरे में तब तक बंद किए रखता, जब तक कि होली का हुड़दंग ख़त्म नहीं हो जाता। दीवाली में उसका जगमग रोशनी में दिल ही नहीं लगता। उस दिन भी वह छिपकर अँधेरे में बैठा रहता और जब माँ कहती कि बाहर जा, अपने भाइयों के संग पटाखे छोड़ ले तो वह तुनक कर कहता, “यह भी कैसा त्यौहार है जिसमें फ़िज़ूल बिजली खर्च की जाती है और पटाखे छोड़कर इतना प्रदूषण फैलाया जाता है कि अच्छे-अच्छों को घुटन के मारे दिल का दौरा पड़ जाए?”

उसकी अपने भाई-बहनों के बजाय, अमरीका  से लौटी अपनी मौसेरी बहन से अधिक बनती थी जो उम्र में उससे तो कोई 12 साल बड़ी थी ही। लेकिन, उससे उसके विचार बहुत मिलते-जुलते थे या यूँ कहा जाए कि उस पर उसका असर ज़्यादा ही पड़ता था। माँ उसे बार-बार टोकती थी, “नीतू से कम मिला-जुला करो। वह अच्छी लड़की नहीं है।” तब वह तनिक झन्ना उठता और एक बुज़ुर्ग की तरह गंभीर हो जाता, “मम्मी, उसमें क्या बुराई है? वह जो करती है, कहती है – उससे मैं पूरी तरह सहमत रहता हूँ। देखो, वह अकेले अमरीका  गई, आगे की पढ़ाई की और अब वह वहीं बढ़िया जॉब करके अच्छी कमाई भी कर रही है। मुझ जैसे लड़कों को तो उससे सबक लेना चाहिए। उसे इण्डिया में अब रहना ही कितने दिन है? उसकी छुट्टी के कोई तीन सप्ताह और बचे हैं; वह फुर्र से वापस अमरीका  चली जाएगी।’

“क्या अभी उसे तीन सप्ताह तक और रहना है? अरे बाप रे, तब तक तो वह तुम्हारे मन को नाबदान बना देगी।” मम्मी के माथे पर चिंता की लकीरों के साथ-साथ, आवाज़ में निराशाभरी भर्राहट थी। 

लेकिन, सुशीम को मम्मी की बात बिल्कुल अच्छी नहीं लगी। उसे तो किसी के मुंह से नीतू के बारे में अनाप-शनाप सुनना ऐसा लगता था जैसेकि किसी ने उसे तिमंजिली छत से धक्का देकर नीचे गिरा दिया हो। उसने तुनकते हुए कहा, “मम्मी, नीतू कह रही थी कि तूँ मेरे साथ अमरीका  चल। वहाँ, मैं तुझे गोबर की फिजूल कंडी से गोल्डन बाउल बना दूंगी।”

उसकी बात सुनकर मम्मी की छाती पर सांप लोट गया। वह कुछ पल तक इस तरह सन्न रह गई जैसे कि बंदूक की कोई गोली उसके सिर को छूती हुई निकल गई हो। 

एक दिन, मम्मी उस पर यानी सुशीम पर बेहद नाराज़ होते हुए चिल्लाने लगी, “अभी तुम बच्चे हो। तुम्हें क्या पता कि अच्छा क्या है, बुरा क्या है। बस, मैंने तुम्हें अच्छे से समझा दिया है कि नीतू के संगत में तुम बरबाद हो जाओगे।” 

मम्मी की बात का सुशीम मज़ाक उड़ाते हुए बोल पड़ा, “अब मैं क्या बताऊँ? नीतू दीदी कितनी भली हैं! कहती हैं कि यहाँ से सुशीम, निकल भागो, इस बेकार देश के जाहिल लोगों और दमघोटू आबोहवा के जंजाल से! खूब पढ़-लिख कर, बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेकर और जूते घिस-घिस कर भी बस! पेट भरने भर का जुगाड़ कर पाओगे। अगली बार जब मैं आऊंगी तो पासपोर्ट-वीज़ा तैयार रखना। मैं ले जाऊंगी तुझे, कुबेर के देश अमरीका में।”

उसकी बतंगड़ी सुनकर, मम्मी को गशी-सी आने लगी। वह झट आँगन के मध्य में तुलसी के आगे माथा टेकने चली गई, “मइया, मेरे भटके हुए पुत्र का सही मार्ग-दर्शन करो। उसे कुल का कलंक बनने से रोको।”

उसकी इस गतिविधि पर सुशीम आँखें नचाते हुए भुनभुनाने लगता, “लो, कर लो बात! जब अपनी समझ काम करना बंद कर दे, तो सारा बोझ भगवान पर डाल दो। मम्मी, कभी तो अपने दिमाग का इस्तेमाल किया करो। अगर तुलसी के आगे माथा टेकने से ही बिगड़े हुए बच्चे सुधर जाते, तो दुनिया में कोई बच्चा बिगड़ता ही क्यों? और फिर, मैं कौन-सी चोरी-चकारी करने जा रहा हूँ? पढ़ने के लिए अमरीका ही तो जाना चाहता हूँ। यहाँ से कईगुना बेहतर पढ़ाई करके, अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता हूँ। इसमें कुल का कलंक बनने जैसी क्या बात है?”

माँ ने पलटकर उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन आवाज़ में एक ऐसा पश्चाताप-भरा भाव था जैसा सुशीम ने पहले कभी नहीं देखी था।

वह समझाते हुए बोली, “बेटा, विदेश जाना बुरा नहीं है। खूब पढ़ो, आगे बढ़ो, अपनी ज़िंदगी बनाओ। लेकिन जिस दिन तुम्हें अपने ही घर के लोग जाहिल और अपना देश बेकार लगने लगे, उस दिन समझ लेना कि पढ़ाई ने तुम्हें बहुत कुछ दिया है, मगर यह समझदारी तुमसे बहुत कुछ छीन भी रही है जिसका पछतावा तुम्हें हमेशा रहेगा। न तुम परिवार के रह पाओगे, न देश के।”

सुशीम हँस पड़ा। “वाह, मम्मी! अब तो देशभक्ति और परिवार का प्रेम भी तर्क का जवाब बन गए! कोई यह पूछे कि यहाँ इतनी बेरोज़गारी क्यों है, इतनी गंदगी क्यों है, इतनी दुर्व्यवस्था क्यों है, तो आप कहेंगी कि अपने देश से प्रेम करो। अरे, प्रेम करने का मतलब यह तो नहीं कि उसकी कमियों पर आँखें मूँद ली जाएँ!”

“कमियाँ देखने और कमियों के कारण सबको नीचा समझने में अंतर होता है, बेटा!” माँ ने धीमे स्वर में प्यार से उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा।

लेकिन सुशीम के कानों तक अब ऐसे आदर्श के शब्द पहुँचते कहाँ थे! क्या उसकी परवरिश में कोई कमी रही है? क्या परिवार में ओछे चाल-चलन का बोल-बाला रहा है? पिता समाजशास्त्र के प्रोफेसर हैं और माँ भी एक हाईस्कूल विद्यालय की प्राध्यापिका रह चुकी हैं, जिन्होंने पारिवारिक व्यस्तताओं के चलते स्वैच्छिक रिटायर्मेंट ले लिया है। चुनांचे, मौज़ूदा परिवेश के बच्चे तो ख़ुद को हर तरह से अपने माँ-बाप से बेहतर समझने लगे हैं। गोयाकि उन बुजुर्गों की शिक्षा-दीक्षा दोयम दर्ज़े की रही हो और उनकी अपनी, अव्वल दर्ज़े की।उसे तो उनकी बातों को ग़लत साबित करके अपनी बात पर सच का ठप्पा लगाने में ही आनंद आता है। सुशीम ख़ुद को घर का सबसे समझदार व्यक्ति मानने लगा है और बाकियों को बेहद घटिया किस्म की सोच रखने वाला।उसे ये लोग ऐसे दिखाई देते हैं जो पुरानी मान्यताओं के सहारे अपनी असफलताओं को ढक रहे हों।

उसने माँ की बात का कोई उत्तर नहीं दिया। कुछ पल उसने घर के सभी लोगों को बारी-बारी से देखा; फिर, दीवार पर टंगी देवी-देवताओं की तस्वीरों को।उसके चेहरे पर उपेक्षात्मक भाव तैर रहा था। जब उसकी निग़ाह तुलसी को जल चढ़ाती हुई माँ पर पड़ी तो वह फिस्स से हँस पड़ा। तदनंतर, वह अपने कमरे में चला गया और दरवाज़ा बंद करके मोबाइल पर नीतू को संदेश लिखने लगा—

‘दीदी, अब तो यहाँ रहना असंभव हो गया है। मम्मी-पापा को समझाना बेकार है। आप बस, मुझे अपने पास बुलाने का इंतज़ाम कर दीजिए।’

उधर से तत्काल उत्तर आया—

‘डोंट वरी, सुशीम! यू आर मेड फॉर अ बेटर लाइफ। बस, हिम्मत मत हारना।’

उस संदेश को पढ़कर सुशीम के चेहरे पर विजय की मुस्कान फैल गई। उसे लगा, दुनिया में कम-से-कम एक व्यक्ति तो है जो उसे ठीक से समझता है। अस्तु, उसे क्या मालूम कि मनुष्य को समझने और उसके विचारों से सहमत होने में बहुत अंतर होता है? इंसान बाहर से कुछ दिखता है और भीतर से कुछ और।

समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। इसके साथ-साथ सुशीम का अपने परिवार और समाज की परंपराओं और मान्यताओं से मोहभंग भी होता रहा। तब तक उसने ग्रेज़ुएशन भी पूरी कर ली। अमरीका जाने के लिए उसने भारत से यह डिग्री लेना भी ज़रूरी समझा; सो, उसने इसे हासिल कर लिया। फिर, अमरीका  जाने की तैयारियों में जुट गया। नीतू ने उसे विश्वविद्यालयों की सूची भेजी, आवेदन करने का तरीका समझाया और कुछ वेबसाइटों के पते भी दिए। सुशीम ने दिन-रात मेहनत की। आखिरकार, उसे अमरीका  के एक विश्वविद्यालय में प्रवेश मिल गया। एज़ूकेशन लोन की भी व्यवस्था हो गई, वीज़ा मिला और वह दिन भी आ गया जब उसे अपने देश से उड़ान भरनी थी।

घर में खुशी और उदासी का मिला-जुला वातावरण था। पिता ने उसे आवश्यक कागज़ात सँभालकर रखने की सलाह दी। छोटे भाई ने उससे अमरीका  की तस्वीरें भेजने का वादा लिया। माँ ने उसके सामान में कुछ घर के बने लड्डू, नमकीन और एक छोटा-सा डिब्बा रख दिया।

“यह क्या है, मम्मी?” सुशीम ने डिब्बा खोलते हुए पूछा।

“तुलसी के चौरे की थोड़ी-सी मिट्टी है। सोचा, तू अपने साथ ले जाएगा तो अच्छा लगेगा। तेरे ऊपर आने वाली बुरी छायाओं का दुष्प्रभाव मिट जाएगा।”

सुशीम का चेहरा उतर गया।

“मम्मी, आप भी ना! मैं अमरीका पढ़ने जा रहा हूँ, कोई तीर्थयात्रा करने नहीं। वहाँ मिट्टी लेकर घूमूँगा तो लोग क्या कहेंगे?”

माँ ने बिना कुछ कहे डिब्बा वापस ले लिया। उसके चेहरे पर क्षण भर के लिए जो पीड़ा उभरी, उसे सुशीम ने देखा तो अवश्य, मगर समझना आवश्यक नहीं समझा।

तदनंतर, पिता ने उसे अपने पास बुलाया। उन्होंने उसकी पीठ पर स्नेहपूर्वक अपना हाथ रखा तो उसने धीरे से उसे हटा दिया।

“सुशीम, एक बात याद रखना। जीवन में आगे बढ़ना, लेकिन अपनी जड़ों को बोझ मत समझना। पेड़ जितना ऊँचा होता है, उसकी जड़ें उतनी ही गहराई में जाती हैं।”

सुशीम ने मुस्कराकर कहा, “पापा, पेड़ की जड़ें मिट्टी में होती हैं, मनुष्य की बुद्धि में नहीं। मनुष्य जहाँ चाहे, वहाँ अपना भविष्य बना सकता है।”

पिता ने उसकी पीठ थपथपाई, “बिल्कुल बना सकता है। बस, भविष्य बनाते-बनाते अपने वर्तमान को इतना छोटा मत कर देना कि पीछे मुड़कर देखने में भी शर्म आए।”

सुशीम ने इस बात को भी पुराने ज़माने की आदर्शवादी सीख समझकर अनसुना कर दिया। 

वह चला गया।

अमरीका  की धरती पर कदम रखते ही सुशीम को लगा कि उसकी कल्पनाओं का स्वर्ग अब उसकी मुट्ठी में है। चौड़ी सड़कें, चमचमाती इमारतें, सुव्यवस्थित यातायात और विश्वविद्यालय का विशाल परिसर—सब कुछ उसे आकर्षित कर रहा था। उसे लगा कि अब वह उस दुनिया का हिस्सा बन गया है जहाँ मनुष्य की पहचान उसके काम से होती है, न कि उसके धर्म, जाति या पारिवारिक पृष्ठभूमि से।

लेकिन, जब उसका सामना विदेश में जीवन की वास्तविकताओं से हुआ तो उसे समझ में आने लगा कि जो चीज़ बाहर से चमकदार दिखती है, वह भीतर से कुछ और होती है। अमरीका  में भारतीय होने का दंश भी उसके मन को कुरेदने लगा। सोचने लगा कि काश! वह भारत में पैदा होने के बजाय अमरीका में ही जन्मा होता किसी गोरी माँ से।पर, सब कुछ उल्टा पड़ गया। कुछ ही दिनों में उसे मालूम होने लगा कि किसी देश की बाहरी तस्वीर और वहाँ का वास्तविक जीवन दो अलग-अलग चीज़ें हैं।

विश्वविद्यालय की पढ़ाई उतनी आसान नहीं थी, जितना उसने समझा था। एक कठिनाई तो भाषा-माध्यम की ही थी। पर, उसने बड़ी सूझ-बूझ से इन बाधाओं को पार कर लिया तथा इस बात से आश्वस्त भी रहने लगा कि संघर्ष और कष्ट के दिनों का ज़ल्दी ही वारा-न्यारा होने वाला है। पढ़ाई पूरी करते ही बढ़िया पैकेज़ पर उसे जॉब मिलेगा और उसका जीवन सुख-सुविधाओं से भरपूर हो जाएगा। उसके बाद, किसी अंग्रेजन से शादी करेगा और अमरीका में ही अपनी जड़ जमाएगा। 

नीतू ने शुरू में उसकी सहायता की, जबकि वह उसी के शहर में जॉब करती थी। लेकिन, कुछ ही समय बाद किसी और शहर में नौकरी करने चली गई। बहरहाल, उसने सुशीम को अपने पास स्थायी रूप से रखने का कोई वादा नहीं किया था। सुशीम को छात्रावास में रहना पड़ा और धीरे-धीरे उसे अपनी ज़िंदगी की छोटी-बड़ी समस्याओं का समाधान स्वयं खोजना  पड़ा। लेकिन, अमरीका की सबसे कठिन समस्या थी अकेलापन।

भारत में वह परिवार के रीति-रिवाज़ों का उपहास करता था। उसे होली का रंग, दीवाली के दीप, माँ की पूजा और पिता की सलाह सब कुछ अनावश्यक लगता था। लेकिन, यहाँ उसे पहली बार अनुभव हुआ कि इन सबके पीछे एक सामाजिक संसार भी होता है। त्योहार लोगों को एक-दूसरे के निकट लाते हैं, परिवार के सदस्य साथ बैठते हैं, पुरानी स्मृतियाँ ताज़ा होती हैं और मनुष्य को यह अहसास होता है कि वह अकेला नहीं है।

दीवाली के दिन उसके छात्रावास में रहने वाले कुछ भारतीय विद्यार्थियों ने मिलकर एक छोटा-सा कार्यक्रम रखा। वे मिठाइयाँ बाँट रहे थे, अपने घरों से वीडियो कॉल पर बात कर रहे थे और अपने-अपने शहरों की यादें साझा कर रहे थे। किसी ने मिट्टी के दीप जलाए, किसी ने रंगोली बनाई और किसी ने अपने घर की पूजा का वीडियो दिखाया।

सुशीम दूर बैठा सब देखता रहा।

उसके रूम-मेट ने उससे पूछा, “तुम भी आओ ना! क्या दीवाली पर, तुमने घर फोन किया?”

“हाँ, कर लूँगा।” वह अनमना-सा बोला। सोच रहा था कि वह तो दीवाली का मजाक उड़ाता रहा है। सो, इस त्योहार पर घरवालों को बधाई कैसे देगा?

“दीया जलाओगे?” रूम-मेट ने उसे दीवाली के उत्सव में शामिल होने का न्योता दिया।

सुशीम मुस्कराया। “मैं इन सब बातों में विश्वास नहीं करता।”

फिर, उसने सहज भाव से कहा, “कोई बात नहीं। मैं भी यह नहीं मानता कि दीया जलाने से अपने-आप सारी समस्याएँ दूर हो जाएँगी। लेकिन घर की याद आती है, इसलिए जला लेता हूँ। कभी-कभी किसी चीज़ को करने के लिए चमत्कार में विश्वास करना ज़रूरी नहीं होता।”

सुशीम के पास इस बात का कोई उत्तर नहीं था। रूम-मेट की बात में दम था, लेकिन वह इसे स्वीकार कैसे करे?

उस रात उसने माँ को फोन किया। माँ ने बताया कि घर में सबने पूजा की थी, छोटे भाई ने पटाखे छोड़े थे और पिता ने उसके नाम का एक दीप जलाया था।

“पापा ने मेरे नाम का दीप क्यों जलाया?” सुशीम ने पूछा।

“कहते थे कि बेटा इतनी दूर है, उसके लिए भी रोशनी कर दो।”

सुशीम कुछ क्षण चुप रहा।

“मम्मी, वहाँ दीया जलाने से मुझे कोई फायदा नहीं होने वाला।”

माँ ने सहजता से कहा, “बेटा, हर काम फायदे के लिए ही थोड़े किया जाता है।”

यह वही माँ थी जिसे वह हमेशा अतार्किक तथा जड़-बुद्धि समझता आया था। आज उसकी यह साधारण-सी बात सुशीम के मन में देर तक गूँजती रही।

समय बीतता गया। सुशीम को मास्टर्स की डिग्री में अच्छे ग्रेड मिले। उसने तुरत-फुरत नौकरी की तलाश शुरू कर दी। उसे विश्वास था कि इतनी अच्छी योग्यता के बल पर आसानी से नौकरी मिल जाएगी। पर, आवेदन करते-करते और इंटरव्यू देते हुए महीनों बीत गए। पर, कहीं से उसका नौकरी के लिए बुलावा नहीं आया। कई बार अंतिम चरण तक पहुँचने के बाद भी उसका चयन नहीं हुआ। कभी अनुभव की कमी बताई जाती, कभी पक्षपातपूर्ण रवैये के चलते किसी अन्य को चुन लिया जाता। कई कंपनियों ने तो उत्तर देना भी आवश्यक नहीं समझा।

उसकी बचत घटने लगी। कहीं से ठोस आमदनी का जरिया उपलब्ध नहीं हो पा रहा था। घर से लाए गए रुपयों की तुलना में डॉलर की औकात बहुत बड़ी लगने लगी। पॉकेट हल्की होने लगी। यहाँ तक कि जीवनयापन के लिए ज़रूरी खर्चों में भी कटौती करने की नौबत आ गई। एजूकेशन लोन की चिंता अलग सता रही थी। तभी उसे अपने और अपने भारत के छोटे होने का ख्याल आया। टी।वी। पर उसने अमरीकी प्रेसीडेंट ओबामा को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पीठ पर हाथ रखे हुए देखा था। ओबामा के सामने भारत का प्रधान मंत्री कोई मामूली-से स्कूली स्टूडेंट जैसे ही लगे। अमरीका  की नज़रों में भारतीय की यही औकात है। ऐसा सोचते हुए उसे अमरीका आना अपने सपनों को दफनाने जैसा ही लगा। शुरू-शुरू में उसकी बहन नीतू उसे हर प्रकार की मदद देने का वादा करती रही; लेकिन, जब उसे लगा कि सुशीम उस पर बोझ बन जाएगा तो वह भी उससे कन्नी काटने लगी। अब तो वह अपने ब्वॉयफ्रेंडों में इतनी रम चुकी थी कि वह उसकी फोन-कॉल का उत्तर देने से भी कतराने लगी थी। 

हाँ, सुशीम दिन में नौकरी के लिए आवेदन करता और शाम को कोई अस्थायी काम, जैसेकि सेल्स-ब्वॉय की नौकरी या किसी संस्था में रिसेप्शनिस्ट का जॉब अथवा किसी ज़िमख़ाने में ज़िम-ट्रेनर का थकाऊ काम। तड़के-सुबह उठकर उसने अख़बार बेचे, होटलों और रेस्तराओं में वेटर का काम किया। बहरहाल, उसने अपने सपनों को कभी मरने नहीं दिया—उन सपनों को अपनी महत्वाकांक्षाओं और उन्हें साकार करने के लिए दिन-रात की मेहनत का खाद-पानी देकर। उन सपनों को पूरा करने के लिए ही रातभर वह जगराता करता। रातभर खुली आँखों से देखे गए सपनों को अलसाए दिन में पूरा करने के लिए एड़ी-चोटी की मेहनत करता। बेशक, भविष्य की योजनाएँ बनाने में भी वह कोई कोताही नहीं बरतता। पर, आख़िरकार सपने मुरझाने लगे, महत्वाकांक्षाएँ विफलताओं के समंदर में घुट-घुट कर मरने लगीं। उसे अहसास होने लगा कि दूर के ढोल सुहावने तो लगते हैं; पर, ढोल के पास पहुँचने पर उसके ताल जीवन के साथ तारतम्य नहीं बैठा पाते। इस तरह धीरे-धीरे उसकी आँखों से अमरीका  का सुनहरा आवरण उतरने लगा। कोई उसे ढाँढ़स देने वाला भी नहीं था। यहाँ नीतू भी लगभग पराई हो गई थी। घर के सदस्यों को भी तो एक तरह से वह ठुकराकर आया था। उनसे अब किस मुँह से बात करे? 

कई दिनों तक कई कॉल करने पर नीतू ने एक बार उसके फोन पर अपनी प्रतिक्रिया दी तो वह शिकायताना अंदाज़ में बोल पड़ा, “दीदी, आपने कहा था कि यहाँ मेहनत की कद्र होती है। लेकिन मैं छह महीने से नौकरी ढूँढ़ रहा हूँ। हर जगह निराशा हाथ लगती है। क्या मुझमें ही कोई कमी है?”

नीतू कुछ देर चुप रही। फिर, बोली।

“सुशीम, यहाँ भी कम्पटीशन है। यहाँ भी लोगों को स्ट्रगल करना पड़ता है। कोई भी देश ऐसा नहीं है जहाँ केवल डिग्री लेकर पहुँच जाने पर ही वहाँ सब कुछ मिल जाता है।”

“लेकिन आपने तो कहा था कि यहाँ अवसरों की कमी नहीं है!”

“अवसर हैं, लेकिन हर अवसर हर व्यक्ति को नहीं मिलता। और हाँ, यहाँ भी भेदभाव है, पक्षपात है, अकेलापन है। मैंने तुझे केवल अपनी सफलता की कहानी सुनाई थी, अपने संघर्ष की नहीं। संघर्ष करते रहो, एक दिन तुम्हारे हाथ गोल्डेन बाउल लग जाएगा, जैसाकि मैं पहले ही कह चुकी हूँ।”

सुशीम को यह बात चुभ गई।

“तो आपने मुझे अधूरी बात क्यों बताई? अपने संघर्ष की पूरी बात क्यों नहीं बताई?”

नीतू ने लंबी साँस ली।

“शायद मैं खुद भी अपनी सफलता को कुछ ज़्यादा चमकदार बनाकर देखती थी। जब मैं पहली बार अमरीका  आई थी, तो कई रातें रोते हुए गुज़ारी थीं। कभी पैसे कम पड़ जाते थे, कभी काम का दबाव असह्य हो जाता था। लेकिन जब भारत आती थी, तो सबको अपनी उपलब्धियाँ बताती थी, अपने संघर्ष और कष्ट नहीं।शायद मुझे भी अच्छा लगता था कि लोग मुझे सफल समझें।”

सुशीम फोन पकड़े चुप बैठा रहा, नीतू ने बातचीत कट कर दी जबकि सुशीम हेलो दीदी, हेलो दीदी करता रह गया।

जिस नीतू को वह अपनी सबसे समझदार मार्गदर्शक मानता था, उसने आज स्वयं स्वीकार कर लिया था कि उसके अनुभव भी कड़वे-खट्टे रहे हैं। भारत में उसे उसके द्वारा दिया गया ज्ञान अधूरा था।

उस रात, सुशीम को पहली बार लगा कि उसने विदेश आने का निर्णय केवल अवसरों के आकर्षण में नहीं लिया था; उसके पीछे अपने परिवार और समाज के प्रति उसका गहरा असंतोष भी था। वह अपने परिवार, समाज और देश की समस्याओं से भागना चाहता था, उन्हें समझना या उनके बीच अपना रास्ता बनाना नहीं। उसे केवल अपना हित दिखाई दे रहा था…केवल अपना।अपने परिवारजनों का भी नहीं। उसे अपने समाज की रीतियों और परंपराओं में सिर्फ ढकोसला ही नज़र आ रहा था। अगर परंपराओं के धार्मिक पक्ष के बजाय, उनके सामाजिक महत्त्व पर ग़ौर फरमाया जाए तो उन्हें किसी भी तरह से दर-किनार नहीं किया जा सकता।

नि:संदेह, उसके लिए यह एहसास सुखद नहीं था।

कुछ ही समय बाद भारत से खबर आई कि उसके पिता को दिल का दौरा पड़ा है। तब, उसका दिल पहली बार कचोटने लगा। उन्हें गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया था। डॉक्टरों ने उपचार शुरू कर दिया था, लेकिन कुछ दिन उनकी गहन निगरानी आवश्यक थी।

माँ का फोन आया तो पहली बार सुशीम घबरा उठा। पता नहीं कैसे उसका हृदय परिवर्तन करने लगा। वह तत्काल दीवार पर टंगी दुर्गा माँ की तस्वीर के सामने खड़ा हुआ और रुआँसा होते हुए देवी से पिता के स्वस्थ होने के लिए प्रार्थना करने लगा। तब, उसके मन में यह भी ख़्याल नहीं आया कि उसके विचार पर तर्क के बजाय, भावना हावी होने लगी है। वह बार-बार माँ को फोन करता और अपने पिता की सेहत पर चिंता करता।

“मम्मी, अब पापा कैसे हैं?”

“अब पहले से ठीक हैं, बेटा! डॉक्टर कह रहे हैं कि खतरे से बाहर हैं। तू चिंता मत कर।”

“मैं आ रहा हूँ।”

“बेटा, तेरी नौकरी अभी नई है। छुट्टी मिल सके तो आ जाना, लेकिन परेशान मत होना। यहाँ तेरे चाचा और पड़ोसी मदद कर रहे हैं।” 

माँ से तो सुशीम झूठ बोल रखा था कि वह एक अच्छी कंपनी में मैंनेजर की नौकरी कर रहा है, जबकि वह एक जिमखाने में घंटे के आधार पर जिम-ट्रेनर के रूप में काम कर रहा है। 

वह परेशान था। उसको माँ की आवाज़ में थकान सुनाई दी। उसने तत्काल टिकट बुक किया और भारत पहुँच गया।

अस्पताल के कमरे में पिता लेटे हुए थे। चेहरे पर कमजोरी थी, लेकिन बेटे को देखकर उनकी आँखों में चमक आ गई।

“अरे, तू आ गया!”

सुशीम उनके पास बैठ गया। उसने पिता का हाथ पकड़ लिया। उसके मन में बहुत-सी बातें थीं, मगर शब्द नहीं मिल रहे थे।

पिता ने पूछा, “वहाँ सब ठीक चल रहा है?”

“जी, पापा! नौकरी मिल गई है।”

“अच्छा है! मेहनत करते रहना।”

कुछ देर बाद पिता ने मुस्कराकर पूछा, “और हाँ, वहाँ जाकर हमारी पूजा-पाठ की आदतें तो नहीं लग गईं?”

सुशीम की आँखें भर आईं। वह हँसना चाहता था, लेकिन गला रुंध गया।

“नहीं, पापा। लेकिन अब समझ में आने लगा है कि आप क्या कहना चाहते थे।”

“क्या कहना चाहता था मैं?”

“यही कि जीवन की हर बात को सिर्फ तर्क से नहीं समझा जा सकता। तर्क से यह तो पता चल जाता है कि कोई काम कैसे करना है, लेकिन यह हमेशा नहीं पता चलता कि किसी दु:खी आदमी को सांत्वना कैसे देनी है, किसी बेसहारा को संबल कैसे देना है, मुसीबत में पड़े किसी इंसान के मनोबल को कैसे बढ़ाना है। और हाँ, मुझे यह बात भी समझ में आ गई है कि किसी के विश्वास और आस्था से असहमत होने का मतलब उसका अपमान करना नहीं है। मैंने भले ही आप लोगों की आस्था पर सवाल खड़े किए थे, किंतु, मेरा उद्देश्य कभी भी आपका तिरस्कार करना नहीं था।”

पिता ने उसकी ओर बड़े गर्व से देखा और मन ही मन में कहने लगे कि बेटे के संघर्षों ने उसे इंसान बना दिया है। माँ, जो उसकी बातें ध्यान से सुन रही थी, आश्चर्य की सुखानुभूति से आप्लावित हो रही थी।  

पिता ने करवट बदलते हुए कहा, “बस, यही तो समझाना चाहता था। तर्क बहुत ज़रूरी है, बेटा। उसके बिना हम अंधविश्वास और भ्रम में फँस सकते हैं। लेकिन संवेदना के बिना तर्क कभी-कभी मनुष्य को इतना कठोर बना देता है कि उसे दूसरों का दुःख भी दिखाई नहीं देता।”

सुशीम ने सिर झुका लिया।

उसे अपने बचपन की वे घटनाएँ याद आने लगीं जब वह प्रसाद की खाली तश्तरी लेकर माँ के सामने खड़ा हो जाता था। तब उसे लगता था कि उसने भगवान के अस्तित्व पर ऐसा प्रश्न उठा दिया है जिसका कोई उत्तर नहीं। आज भी वह नहीं जानता था कि भगवान हैं या नहीं। लेकिन अब वह यह समझने लगा था कि माँ की पूजा केवल भगवान को भोग लगाने की क्रिया नहीं थी। उसमें उसकी आशाएँ थीं, भय थे, स्मृतियाँ थीं और परिवार के सुखी रहने की कामना थी।

किसी विश्वास को स्वीकार करना अनिवार्य नहीं था, लेकिन उसका उपहास करने से पहले उसके मानवीय अर्थ को समझना आवश्यक था।

पिता की तबीयत सुधरने लगी। सुशीम ने भारत में कुछ सप्ताह बिताए। इस दौरान उसने माँ को पहले से अधिक ध्यान से देखना शुरू किया। वह घर के काम करती, पिता की दवाओं का ध्यान रखती, परिवार के सदस्यों की जरूरतें सँभालती और सुबह-शाम तुलसी के आगे दीप जलाती।

एक दिन उसने माँ से पूछ ही लिया, “मम्मी, आपको सचमुच लगता है कि तुलसी के आगे दीप जलाने से भगवान हमारी रक्षा करते हैं?”

माँ ने कुछ देर सोचकर उत्तर दिया, “बेटा, मैं यह नहीं कह सकती कि दीप जलाने से हर मुसीबत टल जाती है। तेरे पापा बीमार पड़े, तब भी मैं पूजा करती रही। लेकिन पूजा करने से मुझे हिम्मत मिलती थी। मन को लगता था कि मैं अपनी चिंता किसी से कह पा रही हूँ। फिर उठकर काम करने की ताकत मिल जाती थी।”

“तो यह मन को समझाने का एक तरीका है?”

“तू चाहे तो ऐसा समझ ले। मैं तो इतना जानती हूँ कि पूजा करके उठती हूँ, तो अपने काम में लगने का मन करता है। और हाँ, अगर कोई बीमार हो तो मैं दवा भी देती हूँ, डॉक्टर के पास भी ले जाती हूँ। केवल दीप जलाकर बैठी नहीं रहती।”

माँ के चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

“हर बात में भगवान को बीच में लाना ठीक नहीं, यह तू सही कहता है। लेकिन हर बात में भावना को बेकार समझ लेना भी ठीक नहीं। आखिर हम मनुष्य हैं, पत्थर तो नहीं।”

सुशीम को लगा जैसे माँ ने उसके भीतर के किसी बंद दरवाज़े पर धीरे से दस्तक दी हो।

वह अब भी तर्क करता था, प्रश्न पूछता था और अंधविश्वास का विरोध करता था। लेकिन उसने पहली बार यह स्वीकार किया कि मनुष्य का जीवन केवल वैज्ञानिक तथ्यों और तार्किक निष्कर्षों से नहीं बनता। उसमें प्रेम, विश्वास, स्मृति, करुणा और सामूहिकता का भी महत्त्व है।

पिता स्वस्थ होकर घर आ गए थे और सुशीम जब तक घर पर रहा, अपने पिता के साथ ही रहता। हाँ, अभी-अभी तो वह सेवा-निवृत हुए थे।

अमरीका लौटने से पहले माँ ने उसके लिए घर के बने लड्डुओं का डिब्बा फिर से तैयार किया।

इस बार सुशीम ने उसे बड़े जतन से अपने बैग में रखा।

माँ ने हँसते हुए पूछा, “क्या हुआ? अब वहाँ सब नहीं मिलता?”

“सब मिलता है, मम्मी। बस, आपके हाथ का स्वाद नहीं मिलता।”

माँ ने उसके सिर पर हाथ रख दिया।

“बेटा, जहाँ रहना, खुश रहना। खूब पढ़ना, खूब कमाना। लेकिन अपने लोगों को छोटा मत समझना। हर जगह अच्छाइयाँ भी होती हैं और कमियाँ भी। जो अच्छा हो, उससे सीखना; जो बुरा हो, उसे सुधारने की कोशिश करना।”

सुशीम ने माँ के पैर छुए। फिर, वह आँगन में गया। तुलसी के चौरे के पास दीप रखा था। उसने उसमें तेल डाला, बाती ठीक की और माचिस उठाकर दीप जला दिया। उसने ये क्रियाएं पहले कभी नहीं की थीं।

माँ दरवाज़े पर खड़ी उसे देख रही थी।

“अरे, आज सूरज पश्चिम से कैसे निकल आया?” माँ ने हँसते हुए पूछा।

सुशीम भी हँस पड़ा।

“मम्मी, मैं अब भी नहीं जानता कि भगवान हैं या नहीं। लेकिन इतना समझ गया हूँ कि किसी चीज़ का वैज्ञानिक प्रमाण न होना और उसका मनुष्य के जीवन में कोई अर्थ न होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।”

माँ की आँखें नम हो गईं।

“बस, बेटा। इतना समझ गया, यही बहुत है।”

सुशीम कुछ क्षण दीप की लौ को देखता रहा। उसे लगा कि यह छोटा-सा दीप अँधेरे को पूरी तरह मिटा नहीं सकता, लेकिन जहाँ जलता है, वहाँ थोड़ी रोशनी अवश्य करता है। शायद, जीवन में भी मनुष्य का काम यही है—हर अँधेरे को कोसते रहने के बजाय, उसे अपने हिस्से की रोशनी अवश्य जलानी चाहिए।

अमरीका लौटने के बाद सुशीम ने अपने जीवन को नए सिरे से देखना शुरू किया। उसने न तो अपनी तार्किक दृष्टि छोड़ी, न ही हर परंपरा को आँख मूँदकर स्वीकार किया। वह अब भी पटाखों से होने वाले प्रदूषण का विरोध करता था, दिखावे और अंधविश्वास पर प्रश्न उठाता था और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध बोलता था। लेकिन, अब वह अपने विचारों को अंतिम सत्य मानकर दूसरों पर थोपने के बजाय, उनकी बात सुनने का धैर्य भी रखने लगा था।

उसने समझ लिया था कि परिवार, समाज और देश की आलोचना करना और इनसे घृणा करना सर्वथा अनुचित है। परंपराओं पर प्रश्न उठाना और उन्हें मानने वालों का अपमान करना भी सही नहीं है। विदेश जाना उन्नति का अवसर हो सकता है, लेकिन विदेश में रहना अपने-आप श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं बन जाता। वह लगातार सोचता जा रहा था और ख़ुद से बतियाता जा रहा था। सबसे बढ़कर, उसने यह जाना कि समय से पहले बड़ा हो जाना और सचमुच परिपक्व हो जाना दो भिन्न-भिन्न बातें हैं। बचपन में वह अपने तर्कों से माँ को निरुत्तर कर देता था और इसे अपनी बुद्धिमत्ता का प्रमाण समझता था। अब उसे एहसास हुआ कि किसी को निरुत्तर कर देना, उसे समझ लेना नहीं होता या उसे जड़-बुद्धि साबित करना नहीं होता। किसी बहस में जीत जाना, जीवन को समझ लेने के बराबर नहीं होता।

इस बार अमरीका पहुँचकर उसने एहसास किया कि वह अब पहले वाला सुशीम नहीं है। उसके भीतर एक नया सुशीम जन्म ले चुका है। फिर, दीवाली आई और उस दीवाली की शाम, उसने अपने अपार्टमेंट की खिड़की के पास एक छोटा-सा दीप जला दिया। वह नहीं जानता था कि उस दीप से किसी अदृश्य शक्ति को प्रसन्नता होगी या नहीं। उसे यह भी विश्वास नहीं था कि उसकी लौ किसी अनिष्ट को रोक सकती है। लेकिन उस छोटी-सी रोशनी में उसे अपना घर दिखाई दिया—माँ का आँगन, पिता की सीख, भाई-बहनों की हँसी और वह अपनापन, जिसे कभी उसने अपनी प्रगति के रास्ते की बाधा समझ लिया था।

उसने माँ को फोन लगाया।

“मम्मी, दीवाली की शुभकामनाएँ!”

“तुझे भी, बेटा! वहाँ दीप जलाया?”

“हाँ, मम्मी। एक छोटा-सा।”

माँ कुछ क्षण चुप रही, फिर बोली, “अच्छा किया, बेटा।”

फोन कटने के बाद सुशीम देर तक दीप की लौ देखता रहा।

उसके मन में कोई चमत्कार नहीं हुआ था। उसकी सारी शंकाएँ भी समाप्त नहीं हुई थीं। वह अचानक आस्थावान नहीं बन गया था, न ही उसकी तार्किक बुद्धि ने काम करना छोड़ दिया था। बस, उसके भीतर एक नई समझ ने जन्म लिया था—कि तर्क मनुष्य को प्रश्न करना सिखाता है, लेकिन संवेदना उसे दूसरों के उत्तरों और अनुभवों का सम्मान करना सिखाती है। दोनों में से किसी एक को खोकर जीवन की पूरी समझ हासिल नहीं की जा सकती।

दीप जल रहा था। बाहर रात गहरी थी, मगर भीतर का अँधेरा काफी कम हो गया था। उसने फिर से नौकरी की तलाश शुरू कर दी—बग़ैर नीतू से कोई मशविरा लिए। इस बार, भारत से वापस लौटकर उसने अनुभव किया कि उसमें आत्मविश्वास का संचार कुछ अलग तरह से हो रहा है। नौकरी के लिए जो आवेदन किए और जो साक्षात्कार दिए, उसमें उसे लगा कि कोई दिव्य प्रेरणा और बड़ों का आशीर्वाद उसके मनोबल को बेतहाशा बढ़ा रहा है। 

एक सुबह वह घर से लाई हुई देवी की तस्वीर के सामने दीपक जलाकर ज़िमख़ाने के लिए रवाना हुआ ही था कि उसका मोबाइल फोन घनघना उठा; एक कंपनी के बॉस ने उसे बधाई देते हुए कंपनी के मैनेजर के पद पर काम करने के लिए उसे ऑफर दिया। उस दिन, वह ज़िमखाने नहीं गया; घर पर ही रह गया। उस शाम, उसने भारत से लाई गई तुलसी की मिट्टी को माथे पर चढ़ाया तो उसे लगा कि अगर यह काम पहले कर लिया होता तो वह अमरीका में कभी भी बेरोज़ग़ार नहीं रहता। वह प्रसन्नचित्त होकर बाहर लॉन में टहलने चला गया। वहाँ उसे दो और फोन कॉल आईं और उसे दो और जॉब के ऑफर मिले। वह हैरत में पड़ गया। पर, वह नौकरी के लिए इन बुलावों से बहुत खुश नहीं था। हाँ, उसमें हौसला का अंश बेतहाशा बढ़ गया था। 

उसने माँ को फोन लगाया,

“मम्मी, मुझे अमरीका में बड़ी ऊबन-सी हो रही है। मैं तुम्हारे पास आना चाहता हूँ, कुछ दिन के लिए नहीं, हमेशा के लिए। पापा के अनुभवों को आत्मसात् करके अपने कच्चे अनुभवों को परिपक्व बनाना चाहता हूँ। आपके अनुभवों को जोड़कर अपने अनुभवों की उम्र बढ़ाना चाहता हूँ। अगर मेरी मनोकामना पूरी हो गई और मैं फिर से आप लोगों के साथ रहने लगा तो मैं ख़ुद को धन्य मानूंगा। आइंदा, आप दोनों के सबक सुनते हुए अब कभी नहीं कहूँगा कि मम्मी, मुझे व्यर्थ के बकवास से क्यों पका रही हो।पापा, छोड़ो भी अपने पुराने खयालात को।”

सुशीम ने कोई छ: सालों तक अमरीका में काम किया; लेकिन, उसने न तो अमरीका में स्थायी नागरिकता के लिए कभी आवेदन किया, न ही अमरीका में स्थायी रूप से रहने का मन ही बनाया। इसी दौरान, जिस कंपनी का वह सीनियर मैंनेजर था, उस कंपनी की एक शाखा दिल्ली में खुल गई थी। उसने तत्काल दिल्ली स्थित उस शाखा में स्थानांतरण की अर्ज़ी अपने बॉस को दे दी। उसकी अर्ज़ी स्वीकार कर ली गई और वह भारत में अपने परिवार को इस बारे में कोई सूचना दिए बग़ैर एक दिन अपने घर आ-धमका। 

वह अपने माता-पिता के पैरों के पास ज़मीन  पर बैठ गया और बोला, “बड़े दिनों बाद मैं अपनी जड़ के पास बैठा हूँ। अब मैं अपनी जड़ों को नहीं सीचूंगा तो मैं मुरझा जाऊंगा। मैं आप द्वारा ही रोपा गया पौधा हूँ। मुझे आप दोनों अपने स्नेह की धूप और करुणा की बरसात से हरा-भरा रखने का वचन दीजिए।” उसने अपना सिर उनके पैरों के आगे झुका दिया।  

***

1 thought on “कहानी: वापसी का सुख – डॉ. मनोज मोक्षेंद्र”

  1. कहानी का undertone प्रभावशाली हैं. कथानक कोई बहुत नया सा नहीं हैं, पर जो सन्देश देने की चेष्टा की गई हैं, उस पर हमारे भगोड़े युवाओं को ध्यान देना होगा.

    Reply

Leave a Comment