तुम्हारी यादें
दिल के दाहिने ख़ाने में
बसाना चाहता हूँ
ताकि रूक-रूक कर
छन-छन कर आगे बढ़े
और फेफड़े में अपनी
अशुद्धियाँ दूर करे।
और शुद्ध अंतरंग क्षण
मेरे दिल के मज़बूत
बाँये ख़ाने में लौट आयें
जो हृदयगति के साथ
नाड़ी की चाप से।
घुलमिल कर
पूरी कोशिकाओं में
अपना आधार तय करें
और हमेशा के लिये
शरीर के पंच तत्व में
विलीन हो जायें।
इसी कारण मैंने इन्हें
आँखों में बसने नहीं दिया
ताकि पलक खुलते ही
उड़नछू न हो जायें
और ज़ुबान पर नहीं रखा
कि कोरी ग़ुफ्तग़ू ना हो जायें ।

लेखक: डॉ. कृष्ण कन्हैया, बिर्मिंगहॅम