अहंकारी नव कोंपलें

नई कोपले वृक्षों को आँख दिखाने लगी
अ॑ह के जर्रे आंधियों से टकराने लगी

जिनकी मेरुदंड अभी सीधी भी न होने पाई
वो अंकुर अब बरगद को गिराने लगी

है पोषित जो स्वयं शाखाओं के सहारे
नव पल्लव अब टहनियों पर शासन चलाने लगी

स्वयं का वजूद भी बना ना पाया जो कनखा
वो कली पुराने पीपल की जड़े हिलाने लगी

जो स्वतः पलता है माली की देख में
वह ॲखुआ पूरी बगिया की खिल्ली उड़ाने लगी

पर याद रहे तुझे ऐ नव अंकुरित कोपल
अहंकार की खाद तेरा अस्तित्व गलाने लगी

नीम की अंकुरण से प्रस्फुटित कोमल कली
भरी महफिल में शहद का पाठ पढ़ाने लगी

जिसे रोपा गया था देने वजूद स्वयं का
वही पौध अब नागफनियों-सी मुस्कराने लगी

कवयित्रि: प्रीति अरोरा “प्रीत”

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