9 August 2026 | Sunday | रविवार | श्रावण | एकादशी | विक्रम संवत 2083

मनी–मशीन

अब मेरे चारों ओर
रंगीन तितलियाँ नहीं उड़ती
और न ही अब छोटे बच्चे
तितलियों के पीछे भागते हैं
फूलों से सुगंध भी
अब खोने लगी है
बचपन अपने पीठ पर
बचपना ढोने लगी है।



मैना, मोर, पपीहा, कोयल
अब समवेत स्वर में गाते नहीं है
बिल्कुल वैसे ही जैसे बच्चे अब
मोबाइल में उलझे हैं
खेलने जाते नहीं हैं।

कोयल की चोंच
सोने से मढ़ कर
ड्राइंग रूम में सजा दी गई है
और बच्चों के बचपने को
चांदी के पाजेब अब सुहाते नही है
मां लोरी नहीं गाती।

और दूध–भात की जगह
बर्गर पिज़्ज़ा खिलाती है।

प्रकृति और प्रवृत्ति दोनों बदलने लगे हैं
पता नहीं हम किस राह पर चलने लगे हैं
चारों ओर गहरी उदासी छा रही है
और आभासी दुनिया से
हंसने की आवाज आ रही है।

अब कविता फूलों में
अंगड़ाईयाँ नहीं लेती
सृष्टि का सारा सौंदर्य
आंखों से उतरकर
कैमरे का सीन हो गया है
आदमी आदमी न होकर
मनी–मशीन हो गया है।

सृष्टि का सौंदर्य सपना होता जा रहा है
आदमी मशीन का अपना होता जा रहा है
अब हृदय में
किसी का प्रतिबिंब स्थाई नहीं होता
पैसा ही सब कुछ है भाई,
भाई – भाई नहीं होता।

सुनो, जागो, उठो
मन की गांठ खोल दो
बस इतना ही निवेदन करती हूं
मनुष्य हो
मनुष्यों के साथ हंस बोल लो।

मनुष्य को मनी–मशीन
बनने से बचाना है
अपना धर्म निभा जाओ
क्या पता कब
किसको यहां से जाना है।


-राखी बंसल

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