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लिनलिथगो: मैरी क्वीन ऑफ़ स्कॉट्स का जन्मस्थल

स्कॉट्लैंड को देखने निकलो तो इसके चप्पे चप्पे पर इतिहास की एक अनोखी कहानी मिलती है। इंग्लैंड और फ़्रांस के साथ इसके सम्बन्ध जितने करीबी रहे उतने ही विवादस्प और रक्त रंजित भी रहे। यहीं की एक बेहद चर्चित रानी हुईं क्वीन मैरी ऑफ़ स्कॉट्स जो सिर्फ 6 दिन की थी जब उसे सिंघासन पर बैठाया गया और उनके जन्म से लेकर उनकी मृत्यु तक उसका जीवन स्कॉट्लैंड के इतिहास, संस्कृति का एक अनूठा हिस्सा बन गया।


इसी मैरी क्वीन ऑफ़ स्कॉट्स का जन्म स्थल माना जाता है“लिनलिथगो” जो एडिनबरा से करीब 20 मील दूरी पर एक छोटा सा क़स्बा है। लिनलिथगो महल का निर्माण 15वीं शताब्दी में स्कॉटिश राजाओं द्वारा करवाया गया था। यह पुनर्जागरण शैली की वास्तुकला का एक उत्कृष्ट नमूना माना जाता है. यहाँ उनके रॉयल अपार्टमेंट के खण्डहर आज भी सुरक्षित रखे हुए हैं। और उनके कमरों में टहलते हुए, उनकी दीवारें, चैपल और खिड़कियों के झांकता फैला हुआ, लम्बी झील वाला बगीचा उसकी जीवन गाथा सुनाता प्रतीत होता है।

ब्रिटेन/ इंग्लैंड के इतिहास में “मैरी क्वीन ऑफ़ स्कॉट्स” को एक विवादास्पद और आकर्षक ऐतिहासिक व्यक्तित्व के रूप में जाना जाता है। वह स्कॉटलैंड के राजा जेम्स पंचम और मैरी ऑफ़ गीस की बेटी थीं। उनका जन्म 8 दिसंबर 1542 को हुआ था। मैरी सिर्फ 6 दिन की थी जब उनके पिता की मृत्यु हो गई और वह स्कॉटलैंड की रानी बन गई और 1542 से 1567 तक स्कॉटलैंड की रानी रही।

उन्होंने फ्रांस के राजा फ्रांसिस द्वितीय से शादी की और कुछ समय के लिए फ्रांस की रानी भी बनीं। यह कम लोग जानते हैं कि वह एक ही समय में दो देशों की रानी रही थीं। मैरी को छह भाषाएं बोलनी आती थीं — लैटिन, ग्रीक, फ्रेंच, स्कॉट्स गैलिक, इंग्लिश और इटालियन। उन्हें बचपन में फ्रांस में शाही शिक्षा दी गई थी।

मैरी और इंग्लैंड की रानी एलिजाबेथ प्रथम आपस में बहनें लगती थीं। एलिजाबेथ प्रथम के पिता हेनरी अष्टम (Henry VIII) थे। और मैरी हेनरी की बहन मार्गरेट ट्यूडर (Margaret Tudor) की पोती थीं ।इस तरह, मैरी और एलिजाबेथ का रक्त संबंध ट्यूडर वंश से था।

हालांकि मैरी और इंग्लैंड की रानी एलिज़ाबेथ प्रथम के बीच काफी राजनीतिक और व्यक्तिगत टकराव था। कुछ कैथोलिकों का मानना था कि मैरी का दावा इंग्लैंड की गद्दी पर एलिजाबेथ से अधिक वैध था, क्योंकि वे एलिज़ाबेथ को हेनरी की “अवैध संतान” मानते थे। इस कारण मैरी को इंग्लैंड की रानी मानने वाले लोग भी थे, जिससे एलिज़ाबेथ को खतरा महसूस होता था। दोनों में धर्म का अंतर भी था। मैरी कैथोलिक थीं, जबकि एलिजाबेथ प्रोटेस्टेंट थीं। उस समय धर्म की राजनीति में बहुत बड़ी भूमिका थी। मैरी के नाम पर कई साजिशें रची गईं (जैसे बेबिंगटन साजिश), जिनका उद्देश्य एलिज़ाबेथ को हटाकर मैरी को इंग्लैंड की रानी बनाना था।

यही सब कारण थे कि एलिजाबेथ ने मैरी को कभी अपने बराबर नहीं समझा और हमेशा संदेह की दृष्टि से देखा। मैरी ने एलिजाबेथ को कई बार मिलने के लिए लिखा, पर वे कभी आमने-सामने नहीं मिल पाईं।

1568 में, मैरी के खिलाफ स्कॉटलैंड में, वहां की सेना और लोगों ने विद्रोह कर दिया। उन्हें उनके दूसरे पति हेनरी स्टुअर्ट, लॉर्ड डार्नली की हत्या का जिम्मेदार माना गया। उन्हें सिंहासन छोड़ना पड़ा और उनके बेटे जेम्स VI को राजा घोषित कर दिया गया। मैरी को कैद कर दिया गया, लेकिन वह 1568 में जेल से भाग निकली। मैरी ने भाग कर इंग्लैंड अपनी कजिन के पास आ गई। वहाँ एलिज़ाबेथ ने मैरी को राजनीतिक खतरा माना, क्योंकि मैरी इंग्लैंड की गद्दी की भी दावेदार थीं और कैथोलिक लॉबी उन्हें सपोर्ट कर रही थी।नतीजा ये हुआ कि मैरी को 19 साल तक कैद में रखा गया, और अंत में उन्हें देशद्रोह के आरोप में (बेबिंगटन साजिश) फांसी दे दी गई।

सिर कलम किए जाने से पहले मैरी के अंतिम शब्द लातिनी भाषा में थे:
“In manus tuas, Domine, commendo spiritum meum”
जिसका अर्थ है:
“हे प्रभु, मैं अपनी आत्मा आपके हाथों में सौंपती हूँ।”

क्योंकि इंग्लैंड की रानी एलिज़ाबेथ प्रथम की कोई संतान नहीं थी, और मरते समय वह किसी उत्तराधिकारी को नामित नहीं कर गईं।
मैरी का बेटा जेम्स VI उस समय सबसे मजबूत वैध उत्तराधिकारी था, क्योंकि वह ट्यूडर वंश से आता था। जब 1603 में उनकी मृत्यु हुई, तो कोई स्पष्ट वारिस नहीं था। अत: जेम्स VI इंग्लैंड के भी राजा जेम्स प्रथम बने। इसी को Union of the Crowns कहा जाता है। यह ब्रिटिश इतिहास में एक बड़ा मोड़ था।

मैरी क्वीन ऑफ़ स्कॉट्स का जीवन राजनीतिक संघर्षों और ऐतिहासिक घटनाओं से भरपूर रहा। उनका जन्मस्थल आज भी उनके जीवन और स्कॉटलैंड के शाही इतिहास की महत्वपूर्ण स्मृति के रूप में संरक्षित है।

वर्तमान समय में लिनलिथगो महल एक ऐतिहासिक पर्यटन स्थल है, जहाँ इतिहास और वास्तुकला में रूचि रखने वाले पर्यटक स्कॉटलैंड के शाही इतिहास को जानने और महल की वास्तुकला को देखने आते हैं।

हम जिस समय एडिनबरा से ट्रेन लेकर लिनलिथगो पहुँचे वहां तेज वर्षा हो रही थी। क्योंकि उस दिन रविवार भी था अत: ब्रिटेन के गाँव – कस्बों की संस्कृति के अनुरूप सडकों पर एकदम सन्नाटा छाया था। अधिकांश दुकाने बंद थीं या बंद होने के कगार पर थी। बस कुछ इक्का दुक्के कैफ़े खुले हुए थे, इससे पहले कि वह भी अपने बंद होने की घोषणा कर दें हमने तुरंत ही वहां पहुँच कर कॉफ़ी के बहाने खुद को बारिश से बचाने की जुगत लगाईं, यूँ भी शाम 4 बजे के बाद कहीं कुछ खाने पीने को मिलने वाला नहीं था। अत: हमने निश्चय किआ कि अभी ही, जो भी हल्का फुल्का मिले खा पीकर महल देखने निकला जाए। तब तक बारिश के भी थमने के काफी आसार थे।

लिनलिथगो पैलेस स्कॉटलैंड के सबसे आकर्षक ऐतिहासिक स्थलों में से एक है। यह महल अपने विशाल प्रांगण, भव्य शाही कक्षों और सुंदर वास्तुकला के कारण मध्यकालीन स्कॉटलैंड की शाही जीवनशैली का अनुभव कराता है। यद्यपि आज महल का अधिकांश भाग खंडहर के रूप में संरक्षित है।

महल में प्रवेश करते ही एक विशाल चौकोर आंगन (कोर्टयार्ड) दिखाई देता है, जिसके मध्य में पुनर्जागरण शैली का एक सुंदर पत्थर का फव्वारा स्थित है। यह फव्वारा कभी शाही समारोहों का प्रमुख आकर्षण हुआ करता था और आज भी महल की कलात्मक सुंदरता का प्रतीक है। यहाँ से अन्दर की तरफ बढ़ो तो महल के भीतर स्थित ग्रेट हॉल शाही भोज, राजकीय बैठकों और उत्सवों के लिए उपयोग किया जाता था। इसकी ऊँची छतें, विशाल खिड़कियाँ और विस्तृत आंतरिक संरचना तत्कालीन शाही वैभव का परिचय देती हैं।

रॉयल अपार्टमेंट्स महल का सबसे महत्वपूर्ण भाग हैं। इन्हीं शाही कक्षों में स्कॉटलैंड की प्रसिद्ध शासक मैरी क्वीन ऑफ़ स्कॉट्स का जन्म हुआ था। इन कक्षों का विन्यास राजपरिवार की निजी आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया गया था। यहाँ स्थित शयनकक्ष, बैठक कक्ष और निजी गलियारे उस युग की राजसी जीवनशैली की झलक प्रस्तुत करते हैं। इन्हीं गलियारों में बीच बीच में झरोखे से बने हुए हैं जहाँ से बाहर बगीचे या झील का इतना सुन्दर दृश्य दिखाई देता है कि अपनी नजरों पर भरोसा नहीं होता। दृश्य इतने जीवंत प्रतीत होते हैं कि लगता है अभी बोल पड़ेंगे।

महल के विभिन्न टावरों और ऊपरी भागों तक पहुँचने के लिए पत्थरों से बनी घुमावदार सीढ़ियाँ बनाई गई हैं। इनमें से कुछ ही अब पर्यटकों के लिए खुली हैं। इन ऊँचाइयों से आप आसपास स्थित लिनलिथगो लोच (झील) और नगर के मनमोहक दृश्य देख सकते हैं। विशेष रूप से सूर्यास्त के समय यह दृश्य अत्यंत आकर्षक प्रतीत होता है।

महल में स्थित विशाल रसोईघर भी अत्यंत रोचक और आकर्षक है। यहाँ शाही भोज के लिए बड़ी मात्रा में भोजन तैयार किया जाता था। इसकी संरचना से उस समय की खान-पान व्यवस्था और राजकीय समारोहों की भव्यता का अनुमान लगाया जा सकता है। इन्हीं अनुभवों से गुजरते हुए जब हम बाहर की तरफ निकले तो एक कक्ष मेंबच्चों के लिए कुछ कलात्मक गतिविधियों की सामग्री रखी हुई थी शायद वहाँ स्कूली बच्चों का आना होता होगा। उनके बनाये कार्ड आदि वहां डिस्प्ले के लिए रखे हुए थे।

इस परिसर से बाहर निकलने पर एक शानदार बगीचा और एक बड़ी सी झील आपका स्वागत करती है। मन हुआ कि कुछ घंटे बस वहीँ बैठा जाए परन्तु यह संभव नहीं था। उसी शाम को हमारी वापसी की ट्रेन थी अत: हम उस पूरे परिसर का अपनी निगाहों से एक चक्कर काट कर बाहर निकलने लगे। तभी एक तरफ एक बड़ा सा चर्च दिखाई दिया। जाहिर है शाही परिवार का काम भी ईश्वर के बिना तो नहीं चल सकता था। एक बेहद सुन्दर चर्च में अन्दर एक यात्री पुस्तिका भी रखी हुई थी जिसके सुनहरे पन्नों पर वहां आने वाले विशिष्ट, अतिविशिष्ट व्यक्तियों से लेकर आम यात्रियों तक के उदगार अंकित थे। हमने भी अपने कुछ शब्दों की छाप उसके एक पन्ने पर छोड़ी और वहां से निकलकर उस छोटे से कस्बे के बहुत छोटे से स्टेशन की तरफ चल पड़े। बारिश अभी तक थमी नहीं थी पर उसकी बोछारों के साथ अब हमारे मन पर एक राजसी परिवार के अतीत की बूंदे भी बरस रहीं थीं।

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