मेरी ट्रेन डेढ़ घंटा लेट थी, सुबह साढ़े पांच के बजाए करीब सवा सात बजे मुरादाबाद पहुंची। हालांकि, चंडीगढ़ से निकली सही समय थी। ट्रेन मुरादाबाद के एक नंबर प्लेटफार्म पर करीब 7.10 पहुंची, डेढ़ घंटा लेट। स्टेशन से ऑटो किया और बायपास पहुंचा। 7 बजे की बस की टिकट book की थी।
“इस समय एक ही AC बस जाती है”, ऑटो वाला बोला।
सोचा कि कोई और लोकल बस या टैक्सी से निकल जाऊंगा, क्योंकि 7 बजे वाली बस तो निकल गई होगी। ऑटो वाले को पता था कि हल्द्वानी / काठगोदाम वाली AC बस कहाँ आती है, उसने सही जगह उतारा और कुछ लोग भी लोकल बस का वेट कर रहे थे।
लोकल बस के बस स्टॉप की तरफ कदम बढ़े ही थे कि तभी एक लाल बस आती दिखी। ऑटो वाले ने इशारा किया कि शायद यही बस है और सच में ये वही बस थी जिसकी टिकट मेरे पास थी, ट्रेन की तरह वो भी लेट थी या ये कहे की सब उन के हिसाब से चल रहा था जिसने मुझे बुलाया था और बस ऑपरेटर का नाम था राम दयाल नीम करौली बाबा कहते हैं, सब काम राम कर रहें है।
बस में बैठे मैं काठगोदाम और वहाँ से नीम करौली कैंची धाम की ओर निकल पड़ा, कहते हैं बाबा ऐसे ही बुलाते हैं। काठगोदाम से आगे कैसे जाऊंगा, बाबा सब जानते हैं, व्यवस्था हो जाएगी – जय गुरु देव!

काठगोदाम से होकर नैनीताल के पास कैंची धाम तक का सफर पहली बार तय करना था। वक़्त बहुत कम था, क्योंकि कल ही मुझे वापस मुरादाबाद भी पहुंचना था और कम वक्त में दर्शन भी करने थे।
बस में मैंने आसपास बैठे लोगों से पूछा, “क्या कोई कैंची धाम जा रहा है?”
सबका एक ही जवाब था – “हम तो नैनीताल जा रहे हैं, कैंची धाम बाद में जाएंगे”
मन ही मन मैं कोई साथी ढूंढ रहा था, बिल्कुल वैसे ही जैसे प्रयागराज महाकुंभ के वक्त मुझे बस में ही एक हमसफर मिल गया था। पर इस बार ऐसा कुछ होता नहीं दिख रहा था।
हमारी बस अब काठगोदाम में दाख़िल हो चुकी थी और मेरा स्टॉप आने ही वाला था।
इतना पता था कि आगे के लिए कोई बस या टैक्सी मिल जाती है, पर कहाँ से और कैसे? इसका कोई अता-पता नहीं था, माथे पर चिंता की एक भी शिकन नहीं थी क्योंकि विश्वास था की बाबा सब इंतज़ाम कर रहे हैं।

इतना बारीक़ी से वो इंतज़ाम कर रहे थे इस बात का अंदेशा मुझे नहीं था। ठीक उसी वक़्त, सड़क के दूसरी तरफ एक और कहानी चल रही थी। बसंत थका हुआ अपने घर लौट रहा था। तभी उसे दूर से वही ‘राम दयाल ट्रैवल्स’ की लाल बस आती दिखी।
वैसे तो उसका घर जाने का पक्का मन था, पर उस लाल बस को देखते ही उसने मन ही मन सोचा—”चलो देखता हूं, कोई सवारी मिल जाए तो ठीक पर वीकेंड है, बहुत जाम होगा, नैनीताल तो बिल्कुल नहीं जाऊंगा” बसंत ने अपनी टैक्सी उस लाल बस के पीछे लगा ली।
इधर मैं बस में अपना सामान समेटे, थोड़ा कन्फ्यूज सा नीचे उतरने की तैयारी कर ही रहा था। तभी बस का दरवाजा खुला और एक शख्स अंदर चढ़ा।
उसने पूरे बस में जोर से आवाज लगाई – “कोई कैंची धाम जाने वाला है क्या?”
पूरी बस में सन्नाटा था.. सिर्फ एक मेरा हाथ उठा।
मैं जिसे पूरी बस में ढूंढ रहा था, वो मुझे ढूंढता हुआ ख़ुद बस के अंदर आ गया था।
पहले आनन-फानन में मिली ट्रेन, फिर लेट हुई लाल बस, और अब यह टैक्सी! सब महाराज जी के हिसाब से चल रहा था। सच कहूं तो, मैं कैंची धाम जा नहीं रहा था बल्कि मुझे ले जाया जा रहा था।
जय गुरु देव! सीताराम सीताराम
-रितेश S निगम