7 July 2026 | मंगलवार | आषाढ़ | अष्टमी | विक्रम संवत 2083

ज़िदंगी एक ख़ाली कुर्सी

ला पॉइंटे

बर्मिंघम के व्यस्त इलाक़े न्यू स्ट्रीट स्टेशन के पास एक पुराना फ़्रेंच पब है ‘ला पॉइंटे’। यहाँ भी आम पबों की तरह गहमा-गहमी शाम के आसपास शुरू होती है। आमतौर पर जब पब्स के पास से गुज़रेंगे तो कुछ सिगरेट बड्स गिरे पड़े मिलेंगे, कोने में एक-दो काँच के टुकड़े, शीशे से अंदर देखने पर कुछ ख़ास समझ नहीं आयेगा। २-३ लंबी मेज़ और कुछ छोटी गोल मेज़, सामने एक लंबा-सा ऊँचा काउंटर, काउंटर के पीछे लोगों को कुछ पल के लिए  ज़िंदगी के दूसरे छोर पर ले जाने वाली बोतलें और एकदम पास बियर के विभिन्न रूप। लगभग ऐसा ही होता है पबों का लब्बोलुआब! हाँ, शोर का लेवल अलग-अलग हो सकता है, कोई पब शांत मिलेगा, किसी में घुसते ही आपके कानों में हाई डेसिबल वेव्स घुसेंगी।

हमेशा की तरह आज मंगलवार को अल्बर्ट अपने साफ सुथरे स्वेटर पहने, गले में गुलिबंद, हाथ में अख़बार लिए पब में दाख़िल हुआ। वो सीधा अपनी फेवरेट टेबल पर गया, अख़बार टेबल पर रखा और काउंटर से व्हिक्स्की का ग्लास ले आया। जितनी बार उसका हाथ अपने चश्मे को एडजस्ट करने में उठता उतनी बार अवसर होता एक सिप लेने का। थोड़ी देर में अंतिम पेज बचा जो स्पोर्ट्स का था, उतना पसंद नहीं था सो प्रायः इग्नोर करता था।

अल्बर्ट ने अपना अधिकांश जीवन अफ्रीका में बिताया था, वहाँ वो कुछ न्यूज़पेपर एजेंसी के लिए काम करता था। अल्बर्ट के अंदर से साहित्यकार था, लिखने का बहुत शौख था, प्रायः वहाँ के अख़बारों में उसके लेख छपते थे। वहाँ के लोगो में अल्बर्ट की काफ़ी इज़्ज़त थी, उसने इलाक़े के रहन-सहन, जीवन यापन के तौर-तरीकों को लेकर दो किताबें भी लिखीं थीं। वो हमेशा लिखते रहना चाहता था लेकिन ज़िंदगी और परिवार की ज़िम्मेदारियाँ उसे उतना समय नहीं देती थी। आख़िर, हर चीज समय माँगती है।

वहीं पास वाली मेज़ पर पिछले कुछ दिनों से एक व्यक्ति बैठने लगा था, उमर से लगभग अल्बर्ट-सा, 65 का होगा! शरीर की मांसपेशियां बताती थी कि कभी भार आदि उठाने वाला रहा होगा, साधारण-सी गोल गले की टी-शर्ट, जीन्स और ऊपर एक हुडी जैकेट का लबादा। 

आज अल्बर्ट ने पूछ ही लिया – “hello mate, you got a cigi lighter?”

“Yup sure”

“Cheers buddy! by the way – am Albert”

“Good man, this is Walter” – वाल्टर ने अपनी कुर्सी अल्बर्ट की ओर खिसकते हुए कहा।

दोनों ने खूब बातें करीं – अपनी जवानी, काम-काम आदि के बारे में। दोनों को ऐसा ही नहीं कि वे पहली बार मिल रहे हैं। वॉल्टर ने बताया कि उन्होंने अपनी जवानी शिपयार्ड में बिताई थी, वाल्टर को पुरानी, ​​छोटी-मोटी शिकायतों पर बात करना पसंद था।

दोनों ने उड़ते सिगरेट के धुँए के बीच एक दूसरे को कई बार cheers किया, धीरे-धीरे वे एक-दूसरे के बारे काफ़ी कुछ जान गए थे। हर बार मंगलवार और शुक्रवार दोनों मिलते एक ही कोने वाली मेज पर बैठते थे।

वॉल्टर: “अल्बर्ट, तुम्हें पता है? मेरी पूरी ज़िंदगी में एक ही चीज़ पर पछतावा रहा है — वो लड़की, जिसे मैंने जवानी में शादी के लिए हाँ नहीं कहा। मैं बहुत डरपोक था।”

अल्बर्ट: (अपने चश्मे को ठीक करते हुए) “डरपोक! वॉल्टर तुम तो बहुत हिम्मत वाले लगते हो। मैंने तो हमेशा अपने अनुभवों को कागज़ पर दर्ज करने में हिम्मत दिखाई। पर मुझे अब पछतावा होता है कि मैंने कभी उन अनुभवों को… दूसरों के साथ साझा नहीं किया।”

वे घंटों बातें करते। अल्बर्ट ने अपने अफ़्रीका में गुज़ारे वक्त की कहानियाँ सुनाता, और वॉल्टर ने अपनी नौकरी की कठिन परिस्थितियों और अपनी पोती के शरारतों का ज़िक्र करता।

कुछ हफ़्तों में, वे पब के सामान्य दोस्त बन गए। वे न केवल अनुभवों की बातें करते थे, बल्कि उन्होंने एक-दूसरे को छोटी-छोटी चीज़ों पर सलाह देना भी शुरू कर दिया था—जैसे कि बर्मिंघम में सबसे अच्छी फिश एंड चिप्स कहाँ मिलती है, किस ग्रोसरी सुपर मार्केट में क्या डील लगी है, या कौन सा बैंक सबसे कम ब्याज दर देता है।

एक ख़ाली कुर्सी

हमेशा की तरह एक मंगलवार को ठीक शाम 7 बजे अल्बर्ट पब में पहुँच गया। उन्होंने अपनी व्हिस्की ऑर्डर की और उसी पसंदीदा मेज पर बैठ गए। उन्होंने अपनी घड़ी देखी – 7:15…. वॉल्टर हमेशा 7:05 तक आ जाते थे।

अल्बर्ट ने सोचा, “शायद ट्रैफ़िक में फँस गए होंगे!”

उन्होंने अखबार खोला और इंतज़ार करने लगे। 7:45 हो गए। अब तो वॉल्टर का देर से आना असामान्य था। अल्बर्ट को अजीब सी बेचैनी होने लगी। उन्हें याद आया कि वॉल्टर ने उन्हें कभी अपना फ़ोन नंबर या पूरा पता नहीं दिया था। वे सिर्फ़ पब में मिले थे।

रात 8:30 बजे, अल्बर्ट ने अपना पाइंट खत्म किया। मेज़ पर वॉल्टर की ख़ाली कुर्सी अल्बर्ट को बहुत खली।

अगले शुक्रवार, अल्बर्ट फिर पब गए, यह उम्मीद करते हुए कि वॉल्टर मज़ाक कर रहे होंगे या बस बीमार होंगे। लेकिन मेज़ फिर खाली थी।

उसके अगले मंगलवार फिर वही निराशा।

यह लगातार चौथा सप्ताह था – शुक्रवार, अल्बर्ट फिर पब गए, यह उम्मीद करते हुए कि वॉल्टर मज़ाक कर रहे होंगे या बस बीमार होंगे।

लेकिन, जैसे ही अल्बर्ट ने ‘ला पॉइंटे’ में कदम रखा, उन्हें तुरंत पता चल गया कि कुछ सही नहीं है। वॉल्टर की पसंदीदा कोने वाली मेज अभी भी ख़ाली थी। उनकी कुर्सी, जो हमेशा थोड़ी सी अल्बर्ट की मेज की तरफ़ खिसकी रहती थी, अब बाकी मेजों की तरह सीधी रखी थी।

अल्बर्ट ने बिना किसी से कुछ कहे अपनी व्हिस्की ली और अपनी सीट पर बैठ गए। अख़बार को पढ़ना आज उन्हें सिर्फ़ एक औपचारिकता लग रही थी। हर बार जब दरवाज़ा खुला और ठंडी बर्मिंघम की हवा अंदर आई, तो अल्बर्ट ने दरवाज़े की तरफ़ देखा। लेकिन आने वाला हर व्यक्ति उनसे अपरिचित था—कोई जवान कपल, कोई थका हुआ दफ़्तरी, कोई अकेले ही अपना पाइंट पीने वाला। वॉल्टर उनमें से कोई नहीं था।

अल्बर्ट की बेचैनी अब चिंता में बदल चुकी थी। कई बार दोस्ती कम समय में भी गहरी हो सकती है, मानवीय संवेदनाओं के विस्तार को समझना सरल नहीं है।  मुलाक़ातों ने उनके एकाकीपन को काफ़ी कम कर दिया था। वॉल्टर के बिना, पब का शोर और सिगरेट का धुआँ उन्हें फिर से अकेला कर रहा था। उन्हें अचानक महसूस हुआ कि उन्होंने वॉल्टर के बारे में कितनी कम जानकारी जुटाई थी:

 * बस नाम: वॉल्टर

 * पुराना काम: शिपयार्ड

 * परिवार: एक पोती (जिसका नाम उन्होंने कभी नहीं पूछा)

जैसे-जैसे रात ढलती गई, अल्बर्ट को अपनी गलती का एहसास हुआ। वे हमेशा अपने लेखन और अनुभवों को ‘दर्ज’ करने के बारे में सोचते थे, लेकिन क्या उन्होंने कभी अपने सामने बैठे व्यक्ति को पूरी तरह से ‘देखा’ था? उन्होंने वॉल्टर के जीवन के बारे में सुना था, पर वॉल्टर कौन थे, इसके बारे में उन्हें कोई व्यावहारिक जानकारी नहीं थी।

उन्होंने काउंटर की तरफ़ देखा। माइकल (पब का मालिक, एक मोटा, शांत रहने वाला व्यक्ति) बीयर के गिलास साफ़ कर रहा था। अल्बर्ट ने अपने चश्मे को एडजस्ट किया और माइकल की तरफ़ इशारा किया।

अल्बर्ट: “माइकल, क्या आपने… क्या आपने वॉल्टर को देखा है? वो व्यक्ति जो मेरे पास वाली मेज़ पर बैठता था?”

माइकल ने ग्लास सुखाने वाला कपड़ा रोका। उसकी आँखों में एक अजीब सी उदासी थी।

माइकल: “अल्बर्ट, मुझे माफ़ करना। मुझे लगा था कि तुम्हें पता होगा।”

अल्बर्ट का दिल ज़ोर से धड़का। उन्होंने तुरंत माइकल के चेहरे पर कुछ ‘बुरा’ पढ़ लिया था।

अल्बर्ट: “क्या हुआ? वह ठीक है?”

माइकल काउंटर के नीचे झुका, एक पुराना, थोड़ा मुड़ा हुआ कागज़ निकाला और अल्बर्ट को सौंप दिया।

माइकल: “बुधवार को, जब मैं पब खोलने आया, तो यह दरवाज़े पर चिपका हुआ था। इसे किसी ने… उनके पड़ोस से भेजा था।”

अल्बर्ट ने काँपते हाथों से कागज़ लिया। वह एक हस्तलिखित नोट था, साधारण सफ़ेद कागज़ पर नीली स्याही में लिखा हुआ।

> माइकल (ला पॉइंटे के मालिक के लिए)

> यह नोट वॉल्टर के बारे में है। उनका मंगलवार की शाम (पिछले मंगलवार) को निधन हो गया। वे अचानक चिर- निद्रा में चले गए। वे अपने जीवन के अंतिम दिनों में आपके पब और वहाँ के एक दोस्त का बहुत ज़िक्र करते थे।

> मुझे माफ़ करना कि वे अपने दोस्त को आख़िरी बार नहीं मिल पाए। यदि संभव हो, तो क्या आप कृपया उनके दोस्त को यह बता सकते हैं?

> साभार, लिंडा (वॉल्टर की बेटी)

> P.S. उन्हें ‘ला पॉइंटे’ बहुत पसंद था।

अल्बर्ट ने आँखें बंद कर लीं। व्हिस्की के कड़वे स्वाद से भी ज़्यादा कड़वा उन्हें यह सच लगा कि जिस दोस्त से वो सिर्फ़ दो मुलाक़ातों के बाद अपनी सारी बातें साझा कर रहे थे, वो अब इस दुनिया में नहीं था।

वह खाली कुर्सी अब केवल अकेलेपन का प्रतीक नहीं थी, बल्कि समय का भी प्रतीक थी—उस समय का जो अब वॉल्टर के पास नहीं था।

माइकल: “वह एक अच्छे इंसान थे। उन्होंने कुछ साल पहले अपनी पत्नी को खो दिया था। वह हमेशा कहते थे कि आपके साथ बात करना उन्हें ख़ुशी देता था।”

अल्बर्ट ने धीरे से सिर उठाया। कागज़ को मोड़कर उन्होंने अपने स्वेटर की अंदरूनी जेब में रख लिया। उनके हाथ की उँगलियाँ अपने आप उनके चश्मे को छूने लगीं, पर इस बार उन्हें सिप लेने का कोई अवसर नहीं मिला।

उन्हें वॉल्टर के अंतिम शब्द याद आए: “मुझे अपनी पूरी ज़िंदगी एक ही चीज़ पर पछतावा रहा है — वो लड़की, जिसे मैंने जवानी में शादी के लिए हाँ नहीं कहा। मैं बहुत डरपोक था।”

और फिर उनके अपने शब्द: “पर मुझे अब पछतावा होता है कि मैंने कभी उन अनुभवों को… दूसरों के साथ साझा नहीं किया।”

अब वॉल्टर चले गए थे, लेकिन अल्बर्ट का पछतावा अब और भी गहरा हो गया था। अब किसे वे अपने अफ़्रीका के अनुभव सुनाएँगे? कौन उन्हें उनकी पोती के शरारतों का ज़िक्र करके हँसाएगा?

अगले कुछ मिनटों में अल्बर्ट ने व्हिस्की का ग्लास खत्म किया, काउंटर पर पैसे रखे और पब से बाहर निकल गए। बर्मिंघम की न्यू स्ट्रीट की गहमा-गहमी में, अल्बर्ट ने महसूस किया कि उन्हें वॉल्टर की बेटी लिंडा को ढूँढ़ना होगा। उन्हें कम से कम इतना तो करना ही होगा कि वे उस दोस्त को श्रद्धांजलि दे सकें, जिसने उन्हें यह एहसास कराया कि ज़िंदगी के अनुभव केवल कागज़ पर लिखने के लिए नहीं होते, बल्कि साझा करने के लिए होते हैं।

 लिंडा की तलाश

अल्बर्ट की रात बेचैनी में कटी। उन्हें वॉल्टर की बेटी, लिंडा, को ढूँढ़ने की ज़रूरत महसूस हो रही थी। केवल इसलिए नहीं कि वह वॉल्टर को आख़िरी विदाई दे सकें, बल्कि इसलिए भी कि उन्हें लिंडा से यह जानना था कि वॉल्टर ने उनके बारे में क्या कहा था—वह ‘दोस्त’ जिसका ज़िक्र वह अपने जीवन के अंतिम दिनों में करते थे।

अगले दिन, बुधवार की सुबह, अल्बर्ट ने माइकल के दिए हुए नोट को ध्यान से देखा। नोट पर कोई पता या फ़ोन नंबर नहीं था, सिर्फ़ नाम था: लिंडा (वॉल्टर की बेटी)। यह एक बहुत ही छोटी सी लीड थी।

अल्बर्ट ने सीधे ‘ला पॉइंटे’ पब जाने का फ़ैसला किया। माइकल ही एकमात्र व्यक्ति था जो शायद कुछ और जानकारी दे सकता था, खासकर वॉल्टर के पड़ोस के बारे में।

अल्बर्ट 11 बजे ‘ला पॉइंटे’ पहुँचे। पब अभी-अभी खुला था और माइकल काउंटर के पीछे स्टॉक चेक कर रहा था।

अल्बर्ट: “माइकल, वो चिट्ठी क्या तुम्हें याद है कि वह कहाँ से आई थी? क्या भेजने वाला कोई डिलीवरी वाला था?”

माइकल: “नहीं, अल्बर्ट। वह एक महिला थी। शायद 50 की उम्र की। उसने बस जल्दी से नोट दरवाज़े पर चिपकाया और चली गई। वह थोड़ी घबराई हुई लग रही थी।”

अल्बर्ट: “क्या तुमने उसका नाम पूछा?”

माइकल: “नहीं, उस वक़्त मुझे लगा कि यह कोई डिलीवरी है। लेकिन हाँ, उसने कहा था कि वह स्मेथविक से आई है।”

स्मेथविक! बर्मिंघम के पास का एक इलाक़ा। यह जानकारी महत्वपूर्ण थी।

माइकल: “एक बात और, अल्बर्ट। वॉल्टर… वह हमेशा अपना ‘स्थानीय’ अख़बार पढ़ते थे, बर्मिंघम मेल नहीं। वह स्मेथविक ऑब्ज़र्वर पढ़ते थे। शायद तुम्हें उसमें कुछ मिल जाए?”

अल्बर्ट की आँखें चमक उठीं। वॉल्टर के घर के पड़ोस के अख़बार में शायद शोक संदेश छपा हो! 

अल्बर्ट तुरंत घर वापस लौटे। उन्होंने अपना लैपटॉप खोला और स्मेथविक ऑब्ज़र्वर का ऑनलाइन संस्करण खँगाला। उन्हें निधन सूचनाएँ (Death Announcements) वाले सेक्शन में वॉल्टर का नाम ढूँढने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगा।

शोक संदेश

वॉल्टर जेम्स डिक्सन

(65 वर्ष, पूर्व शिपयार्ड कार्यकर्ता)

हमारा प्रिय पिता, दादा और दोस्त वॉल्टर जेम्स डिक्सन का मंगलवार, [तारीख] को शांतिपूर्वक निधन हो गया। उन्हें उनकी बेटी लिंडा और पोती सारा द्वारा हमेशा याद किया जाएगा। अंतिम संस्कार शुक्रवार को सेंट माइकल चर्च, स्मेथविक में दोपहर 2 बजे होगा।

गुज़ारिश है कि फूलों के बजाय अफ़्रीकन चिल्ड्रेन फ़ाउंडेशन को दान दें, जो वॉल्टर का प्रिय चैरिटी थी।

लिंडा और सारा की तरफ़ से

अल्बर्ट ने संदेश पढ़ा और कुर्सी पर बैठ गए। वॉल्टर का पूरा नाम: वॉल्टर जेम्स डिक्सन। उनका पसंदीदा चैरिटी: अफ़्रीकन चिल्ड्रेन फ़ाउंडेशन। यह अल्बर्ट के अफ़्रीका में बिताए जीवन के साथ एक अनूठा जुड़ाव था, जिसके बारे में वॉल्टर ने कभी ज़िक्र नहीं किया था।

अल्बर्ट ने घड़ी देखी। शुक्रवार को अंतिम संस्कार है, और आज बुधवार है। उनके पास दो दिन थे।

सेंट माइकल चर्च

शुक्रवार, दोपहर 1:45 बजे, अल्बर्ट अपने सबसे साफ़ कोट और टाई पहने, सेंट माइकल चर्च के बाहर खड़े थे। बर्मिंघम की ठंडी हवा चल रही थी। चर्च में लगभग 20-30 लोग थे, ज़्यादातर बुज़ुर्ग और कुछ मध्यम आयु वर्ग के लोग। अल्बर्ट ने चर्च में प्रवेश किया और सबसे पीछे बैठ गए।

सेवा के अंत में, एक महिला उठी और वॉल्टर के बारे में बोलने लगी। वह सादी कपड़ों में थी, उसके चेहरे पर दुख स्पष्ट था—यही ज़रूर लिंडा होगी।

लिंडा: “पिताजी, उन्होंने हमेशा कहा कि वह एक मज़बूत लेकिन साधारण आदमी थे। उन्होंने शिपयार्ड में कड़ी मेहनत की, उन्होंने मुझे पाला… लेकिन पिछले कुछ हफ़्तों में, एक चीज़ ने उन्हें बहुत ख़ुशी दी। वह ‘ला पॉइंटे’ पब में अपने दोस्त अल्बर्ट से मिलना था।”

लिंडा ने बोलते-बोलते चर्च के पीछे, अल्बर्ट की तरफ़ देखा।

लिंडा: “वह अल्बर्ट को एक महान कहानीकार कहते थे। उन्होंने कहा कि अल्बर्ट ने उन्हें दिखाया कि उन्होंने जो जीवन जिया है, वह किसी किताब से कम नहीं है। और मुझे पता है कि अल्बर्ट, आप यहाँ कहीं हैं। पिताजी ने मुझे आपको यह संदेश देने के लिए कहा था—कि वह अपनी कहानी को… आख़िरकार साझा कर रहे थे।”

अल्बर्ट की आँखें भर आईं। यह उनके लिए वॉल्टर की ओर से एक आख़िरी ‘चीयर्स’ था।

जब लोग बाहर निकलने लगे, तो अल्बर्ट लिंडा के पास पहुँचे।

अल्बर्ट: “लिंडा, मैं… मैं अल्बर्ट हूँ।”

लिंडा ने अल्बर्ट को देखा और उनकी आँखें भर आईं।

लिंडा: “मुझे पता था कि आप आएँगे। मेरे पिता… वह आपको बहुत पसंद करते थे।”

अल्बर्ट: “मुझे भी वह बहुत पसंद थे। उन्होंने मेरे एकाकीपन को तोड़ दिया था।”

लिंडा: “उन्होंने मुझसे कहा था कि वह आपके अफ़्रीका के अनुभवों पर लिखी गई किताबों को पढ़ना चाहते थे। पर उन्हें समय नहीं मिला।”

लिंडा ने कुछ देर रुककर कहा: “अल्बर्ट, पिताजी ने अपनी अलमारी के पीछे, एक पुराने जूते के डब्बे में कुछ रखा था। वह चाहते थे कि आप इसे लें। यह उनकी ‘कहानी’ का हिस्सा है।”

जूते का डब्बा और एक अधूरा सफ़र

अल्बर्ट को लिंडा ने वॉल्टर का वह पुराना, घिसा-पिटा जूते का डब्बा सौंप दिया। लिंडा ने बताया कि वॉल्टर ने यह डब्बा पिछले मंगलवार की दोपहर को ही निकालने के लिए कहा था, यह कहते हुए कि अगर कुछ हो जाए, तो इसे “अपने दोस्त अल्बर्ट” को दे देना।

लिंडा: “अल्बर्ट, पिताजी के पास कोई क़ीमती सामान नहीं था, लेकिन उन्होंने कहा कि यह डब्बा उनके दिल का टुकड़ा है।”

अल्बर्ट ने लिंडा को धन्यवाद दिया, उन्हें गले लगाया और उन्हें दिलासा दी।

अल्बर्ट घर लौट आए। अपने स्वेटर और कोट को उतारकर, वह अपनी मेज पर बैठ गए, जहाँ उनका अधूरा अख़बार रखा था। उन्होंने जूते के डब्बे को सामने रखा। वह डब्बा भारी नहीं था, लेकिन अल्बर्ट को लगा जैसे वह वॉल्टर की पूरी ज़िंदगी का बोझ उठाए हुए हो।

उन्होंने ढक्कन हटाया। अंदर एक सिगार बॉक्स था, जिसे खोलते ही पुरानी लकड़ी और तंबाकू की हल्की महक आई। सिगार बॉक्स में तीन चीज़ें थीं:

 * एक पुराना, पीला पड़ चुका फ़ोटो: इसमें एक युवा वॉल्टर, अपनी शिपयार्ड की यूनिफ़ॉर्म में, एक बेहद खूबसूरत, मुस्कुराती हुई महिला के साथ खड़ा था। यह वही लड़की थी जिसे ‘हाँ’ न कहने का पछतावा वॉल्टर को हमेशा रहा था। फ़ोटो के पीछे लिखा था: ‘मैरी और मैं, 1958। मेरी सबसे बड़ी गलती।’

 एक मोटी रबर बैंड से बंधा हुआ कागज़ों का पुलिंदा: ये वॉल्टर की हैंडराइटिंग में लिखे गए नोट्स थे। अल्बर्ट ने पहली शीट उठाई। यह एक रोजनामचा (डायरी) का पन्ना था, जिस पर लिखा था: “अल्बर्ट ने आज मुझे बताया कि मैंने जो जीवन जिया है, वह किसी कहानी से कम नहीं है। उन्होंने कहा, ‘वॉल्टर, अपनी कहानी दूसरों के साथ साझा करो।’ मैं कोशिश करूँगा। मेरी पहली कहानी शिपयार्ड में टूटे हुए हाथ के बारे में है…”

अल्बर्ट ने कागज़ों का बंडल खोला। वे वॉल्टर की लिखी हुई कहानियाँ थीं—छोटी-छोटी, सीधी-सादी लेकिन दिल को छू लेने वाली कहानियाँ। शिपयार्ड के मज़दूरों की दोस्ती, बर्मिंघम की पहली बारिश, अपनी पोती सारा को खिलौना बनाने की कोशिश, और हाँ, मैरी से दोबारा मिलने की उसकी वर्षों पुरानी इच्छा।

ये कहानियाँ कच्ची थीं, व्याकरण की त्रुटियों से भरी हुई थीं, लेकिन उनमें एक सच्चा साहित्यकार बोल रहा था—एक ऐसा साहित्यकार जो अल्बर्ट को अपने अंदर दिखाई देता था।

अल्बर्ट को एहसास हुआ: वॉल्टर केवल पछतावे का ज़िक्र नहीं कर रहे थे। उन्होंने अल्बर्ट की बातों को गंभीरता से लिया था। वह भी, अपनी ज़िंदगी के अंतिम दिनों में, एक लेखक बनना चाहते थे।

अगले मंगलवार की शाम, अल्बर्ट हमेशा की तरह ‘ला पॉइंटे’ पहुँचे। उन्होंने अपनी व्हिस्की ली, लेकिन इस बार वह अपनी कोने वाली मेज पर नहीं बैठे। वह पब के केंद्र में एक मेज पर बैठे, जिस पर ज़रा ज़्यादा रोशनी थी।

अल्बर्ट ने अपना अख़बार नहीं खोला। इसके बजाय, उन्होंने वॉल्टर के नोट्स का बंडल निकाला। उन्होंने अपनी व्हिस्की का एक घूँट लिया, अपने चश्मे को एडजस्ट किया, और नोट्स को पढ़ना शुरू किया।

उन्होंने अपने पत्रकार जीवन का लाल पेन निकाला। अब उनका काम बदल चुका था: उन्हें वॉल्टर की कच्ची कहानियों को सँवारना था, उन्हें सम्पादित करना था, ताकि वे प्रकाशित हो सकें। अल्बर्ट ने अपने अफ़्रीका के संस्मरण लिखने का विचार छोड़ दिया। अब वह वॉल्टर के अनुभवों को दुनिया के सामने लाना चाहते थे।

अल्बर्ट को पता था कि अब उनके पास एक नया उद्देश्य है। वॉल्टर की ख़ाली कुर्सी उन्हें हमेशा याद दिलाएगी कि हर किसी के पास एक कहानी होती है, और यह उनका कर्तव्य है कि वे वॉल्टर की उस कहानी को पूरा करें जिसे उन्होंने ‘ला पॉइंटे’ के एक कोने में शुरू किया था।

वॉल्टर की बेटी लिंडा से वादा करके, और वॉल्टर की अधूरी इच्छा को पूरा करने के लिए, अल्बर्ट ने पेन उठाया। यह एक दोस्ती का अंतिम पाठ था, जिसने अल्बर्ट को सिखाया था कि जीवन का सबसे बड़ा रोमांच अनुभवों को साझा करने में है।

कुछ दिनों बाद अल्बर्ट द्वारा संपादित एक कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ “ज़िंदगी एक ख़ाली कुर्सी ”। इस किताब को खूब सराहा गया – वाल्टर की कहानियाँ आम लोगों की ज़िंदगी से जुड़ी थीं, लोगों को लगता जैसे वो ख़ुद को ही पढ़ रहे हैं। माइकल ने अपने पब की एक पूरी दीवार पर इसका पोस्टर लगाया।

अल्बर्ट ख़ुश था, उसे इस किताब के दौरान वह सब करने का भरपूर अवसर मिला जो वो हमेशा करना चाहता था, पत्रकारिता – लेखन – संपादन। अब वो पब में बैठकर सिगरेट और व्हिस्की के ग्लास के साथ-साथ अपनी कलम से काग़ज़ पर कुछ ना कुछ लिखते रहता था।

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