मित्रों, हरिओम शरण जी के भजन हम दशकों से सुनते आए हैं, उनके भजनों में स्वयं को खोता देखा होगा, उनके शब्दों में और गाने की शैली ने आपको अपने इष्ट के पास ज़रूर बैठाया होगा, साथ में गुनगुनाया भी होगा।

आज उनके बारे में जानने का मन किया।
उनका जन्म सन 1932 में लाहौर, पाकिस्तान में हुआ था। आज़ादी के बाद वे भारत आ गए और मुंबई में रहे – वहीं से वे भजन गायिकी के सम्राट बनें। हालाँकि, बाद में वे अमेरिका चले गए और वहीं वे परमधाम को प्राप्त हुए।
हरिओम शरण जी के गायिकी का पैमाना नाप से परे है, ऐसे भजन लिखे, फिर उन्हें ऐसे गाया मानों वे स्वयं किसी पूजा में लीन हों। भक्ति रस में होना और बात है और लोगों को उसी में नहला देना अलग। लेकिन आपके शब्द अगर सुनने वालों को आह्लादित कर दें, सुनने वालों को शराबोर कर दें, सुनने वालों को ख़ुमारी में ले जाये तो ऐसे पुजारी को आप हरिओम शरण कहते हैं।
उनके कई भजन तो हमारी जिह्वा से छूटते ही नहीं जैसे – “दाता एक राम/भिखारी सारी दुनिया”,
“जय नंदलाला जय गोपाला/श्री राधे गोविंदा”
“प्रभु हमपे कृपा करना/ दया करना कृपा करना”
“मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊँ”
“तेरा राम जी करेंगे बेड़ा पार/उदासी मन काहे को डरे”
जो बातें हमने केवल सुनी हैं, पढ़ी हैं जैसे मीरा के भजन और उनका भजन भक्ति से कृष्ण को पाना, सूरदास जी और उनके पद, रसखान और उनके छंद। हरिओम शरण जी के भजन सुनते ही आप उसी अलौकिक रूप में उतर जाते हैं, स्वयं को परमपद के समीप पाते हैं।
भक्ति वो जो मनोहारी हो, भक्ति रस वो जो आत्मा तृप्त कर दे, श्रद्धा वो जो हमेशा बढ़े। मेरा मानना है ऐसे सारी स्थिति को पाने में हरिओम शरण जी के भजन निश्चित रूप से साथी है, सहयोगी है, सहायक है, मनोरम हैं, मोहक हैं।