9 August 2026 | Sunday | रविवार | श्रावण | एकादशी | विक्रम संवत 2083

जब थेम्स के किनारे महका थार – डॉ॰ इंदु बारौठ (चारण) की रिपोर्ट

रिपोर्ताज /  लंदन / डॉ॰ इंदु बारौठ (चारण)

जय माताजी की, राम राम सा,  घणी खम्मा सा…!”

जैसे ही यह आत्मीय अभिवादन सभागार में गूंजा, लगा मानो लंदन की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी कुछ पल के लिए ठहर गई हो।  कार्यक्रम की शुरुआत दरवाजे पर आने वाले अतिथियों की रोली टीके से स्वागत के भावपूर्ण क्षण से हुई ।

बाहर थेम्स के किनारे आधुनिक महानगर अपनी रफ्तार से दौड़ रहा था, लेकिन भीतर राजस्थान सांस ले रहा था। कहीं ढोल-नगाड़ों की गूंज थी, कहीं घूमर की लय, कहीं लोकगीतों की मिठास और कहीं वर्षों बाद मिले अपनों की आंखों में छलकती आत्मीयता।

यह केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि उन लोगों का मिलन था जिन्होंने भौगोलिक दूरियां तो पार कर लीं, पर अपनी मिट्टी की महक, अपनी बोली और अपने संस्कारों को आज भी अपने ह्रदय में सहेज रखा है।

इस वर्ष आयोजित लंदन जीमण ने अपनी यात्रा का दसवां वर्ष पूरा किया। 

थार से थेम्स का दसवां पड़ाव,एक दशक की यह यात्रा केवल आयोजनों का सिलसिला नहीं, बल्कि प्रवासी राजस्थानी समाज की सामूहिक स्मृतियों, सांस्कृतिक प्रतिबद्धता और आपसी अपनत्व की जीवंत कहानी है।

जीमण की दस वर्षीय यात्रा को समर्पित कॉफी टेबल बुक का लोकार्पण किया गया। पुस्तक के पन्नों में केवल तस्वीरें नहीं थीं,उनमें मुस्कुराते चेहरे, बिछड़कर फिर मिलने की खुशी, परंपराओं की निरंतरता और एक ऐसे परिवार की कहानी थी, जो सीमाओं से परे भी अपनी संस्कृति को जीवित रखे हुए है।

पन्ने पलटते हुए कई चेहरे खिल उठे। कोई कह रहा था, “अरे, यह तो दस साल पहले की तस्वीर है…!” 

तो कोई मुस्कुराते हुए अपने बच्चों को दिखा रहा था, “देखो, तब तुम कितने छोटे थे।” ऐसा लग रहा था मानो यादें किताब के पन्नों से निकलकर फिर उसी मंच पर जीवंत हो उठी हों।

इस बार आयोजन की एक विशेषता यह भी रही कि घुड़दौड़ उद्योग से जुड़े राजस्थान के अनेक परिवारों और पेशेवरों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। इतना ही नहीं, ब्रिटेन के लगभग हर शहर से आए प्रवासी राजस्थानियों की उपस्थिति ने इस आयोजन को और अधिक व्यापक बना दिया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि प्रवासी राजस्थानी समाज अब केवल पारंपरिक व्यवसायों तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन के विविध क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर चुका है।

हर नए परिवार के जुड़ने के साथ जीमण का यह कारवां और बड़ा, और अधिक आत्मीय होता जा रहा है।

सबसे भावुक क्षण तब आया, जब वेदांता ग्रुप के चेयरमैन श्री अनिल अग्रवाल और उनकी पत्नी किरण जी मंच पर पहुंचे। दर्शकों को लगा कि वे कोई प्रेरक संबोधन देंगे, लेकिन उन्होंने शब्दों के बजाय भक्ति को चुना। जैसे ही उनके स्वर में भजन गूंजा, पूरा सभागार शांत हो गया। तालियां थम गईं, बातचीत रुक गई और हर निगाह मंच पर टिक गई। कुछ क्षणों के लिए ऐसा लगा मानो पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया हो।

इसके बाद मंच लोकसंस्कृति के रंगों से सराबोर हो उठा। “शुभ दिन आयो”, “घणी खम्मा”, “लुक छुप न जाओ” और “लाल पीली अंखियां” जैसे लोकप्रिय राजस्थानी गीतों ने ऐसा समां बांधा कि दर्शक स्वयं को थिरकने से रोक नहीं पाए। हर प्रस्तुति के साथ सभागार तालियों की गूंज से भर उठता।

कार्यक्रम की सबसे सुखद अनुभूति यह रही कि बच्चों और युवाओं ने भी पूरे उत्साह के साथ मंच संभाला। अक्सर कहा जाता है कि विदेशों में पली-बढ़ी नई पीढ़ी अपनी जड़ों से दूर हो जाती है, लेकिन इन प्रस्तुतियों ने इस धारणा को पूरी तरह गलत साबित कर दिया। लोकनृत्य, लोकगीत और पारंपरिक वेशभूषा में उनकी सहज भागीदारी यह संदेश दे रही थी कि संस्कृति केवल विरासत नहीं, बल्कि गर्व की पहचान भी है।

भोजन का समय आते ही वातावरण में दाल-बाटी, चूरमा, कढ़ी, गट्टे और पारंपरिक व्यंजनों की सुगंध फैल गई। वहीं गर्म मौसम में बर्फ के गोलों की दुकान पर लगी कतारें देखकर लगा मानो लंदन नहीं, जयपुर या जोधपुर का कोई मेला सज गया हो। स्वाद ने सचमुच हजारों किलोमीटर की दूरी मिटा दी थी। यह केवल भोजन नहीं, बल्कि बचपन, गांव और अपनेपन की स्मृतियों का उत्सव था।

कार्यक्रम के दौरान समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाले अनेक व्यक्तियों को सम्मानित भी किया गया। यह सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों का नहीं, बल्कि उन सभी प्रयासों का सम्मान था, जिनकी बदौलत प्रवासी समाज अपनी संस्कृति और परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचा रहा है।

और फिर वह बहुप्रतीक्षित क्षण आया,महा घूमर।

रंग-बिरंगे लहरिया घाघरों की गोलाई जब एक साथ घूमी तो लगा मानो राजस्थान का रेगिस्तान अपनी पूरी रंगत के साथ लंदन की धरती पर उतर आया हो। ढोल की थाप, तालियों की गूंज और कैमरों की चमक के बीच यह दृश्य देर तक लोगों की स्मृतियों में बसता चला गया।

धीरे-धीरे शाम ढलने लगी।

सेल्फियों का दौर थमा।

गले मिलने का सिलसिला शुरू हुआ।

“अगले साल फिर मिलेंगे…”

“अपना ख्याल रखना…”

“घर पहुंचकर संदेश जरूर करना…”

इन छोटे-छोटे संवादों में पूरे वर्ष की प्रतीक्षा छिपी थी।

कई आंखें नम थीं।

कई मुस्कानें अधूरी थीं।

हर कोई जानता था कि अगली मुलाकात तक पूरे 365 दिन का इंतजार करना होगा।

घर लौटने के बाद बाहर का वातावरण शांत हो गया, लेकिन मन के भीतर उत्सव अब भी जीवित था। ढोल की थाप अब भी कानों में गूंज रही थी, घूमर की लय अब भी मन में थिरक रही थी और अपनों से मिलने की गर्माहट स्मृतियों में ताजा थी।

कभी-कभी लगता है, जैसे बेटी पीहर से लौटते समय अपने साथ केवल सामान नहीं, बल्कि रिश्तों का स्नेह, अपनापन और अनगिनत यादें भी ले आती है। लंदन जीमण भी हर वर्ष वही एहसास दे जाता है। यह केवल एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से फिर जुड़ने, अपनी पहचान को फिर से जीने और यह विश्वास मजबूत करने का अवसर है कि दुनिया के किसी भी कोने में बस जाएं, राजस्थान दिल से कभी दूर नहीं होता।

और शायद इसलिए…

थालियां भले खाली हो जाती हैं,

पंडाल भले शांत हो जाते हैं,

लेकिन जीमण का अपनापन कभी समाप्त नहीं होता।

वह मन के भीतर एक दीपक बनकर अगले मिलन तक जलता रहता है।

डॉ॰ इंदु बारौठ (चारण)

Leave a Comment