प्रकृति के छाया चित्र का आनंद उठाते
युवक बैठा था कुर्सी पर कंप्यूटर खोले,
गुज़ारिश की यारों से
कि चलो आज कुदरत की
रौनक का लुत्फ़ उठाएँ
तत्पर जवाब मिला कि छोड़ यार, गूगल खोलो, दुनिया देखो
काईनात की ख़ूबसूरती
ज़हन में ही महसूस कर लो I
कंप्यूटर ने विश्व में अनेक परिवर्तन लाये,
जन शक्ति को सौ से एक कर दिखाया
पृथ्वी अन्वेषण में भी
कई प्रतिमान प्रक्षिप्त कर दिखाएI
पर माँ की ममता, पत्नी की अपेक्षा या बच्चों
का प्यार का वास्तविक रूप न दे पाएI
कंप्यूटर का विस्तार करते करते
कहीं इंसान कंप्यूटर का ग़ुलाम न बन जाये II
हाल में दोस्तों के साथ छुट्टी बिताने निकला,
पर्वत के शिखर पे ठिकाना ऐसा,
न इन्टरनेट “कवरेज”, न फ़ोन का सुविधाI
मानो, किसी ने पैर बांध के ज़मीन पे छोड़ दिया होI
लेकिन कुछ क्षण बाद एहसास हुआ
जैसे ज़न्नत-ए- बहार में आज़ादी मिल गयी होI
ना संचालक कामांग, ना कंप्यूटर का खिंचाव, बस मैं था और मेरी अंतरात्मा; ख़ुशनुमा
फिरदौस का लुत्फ़ उठाताI