7 July 2026 | मंगलवार | आषाढ़ | अष्टमी | विक्रम संवत 2083

गीता में मन, चेतना और भारतीय मनोविज्ञान

मन क्या है? चेतना क्या है? हम अक्सर सोचते हैं क्या मनुष्य केवल शरीर और
मस्तिष्क से निकले किसी विचार का पोषक है या वह किसी उच्चतर आध्यात्मिक
सत्ता का धारक भी है? आधुनिक मनोविज्ञान इन प्रश्नों को न्यूरोलॉजी, व्यवहार और
संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं के माध्यम से समझने का प्रयास करता है, जबकि भारतीय
दर्शन और विशेषतः श्रीमद्भगवद्गीता इन्हें आध्यात्मिक, नैतिक और अस्तित्वगत
संदर्भ में देखती है।

भगवद्गीता सनातन धर्म की आधारभूत विचारों का योग है, योग की शिक्षा है, शिक्षा
ऐसी जिसके व्यवहार से वह उत्तम प्रकृति की विशेषताएँ प्राप्त करता है, प्रकृति के
मूल तत्व को, उनकी विस्तृत रूप को समझ पाता है, उसे अपने जीवन में ढाला
पाता है।
गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानव मन की गहनतम अवस्थाओं का
विश्लेषण करने वाला अद्वितीय मनोवैज्ञानिक ग्रंथ है। गीता दर्शन से अर्जुन के
मोह, शोक, भय, भ्रम और नैतिक द्वंद्व से आरंभ होकर यह संवाद आत्म-साक्षात्कार
की परम अवस्था तक पहुँचता है। इस यात्रा में मन, बुद्धि, अहंकार, इंद्रियाँ और
आत्मा के संबंधों का सूक्ष्म विश्लेषण मिलता है।
भारतीय मनोविज्ञान की जड़ें वेदों, उपनिषदों, सांख्य और योग दर्शन में हैं। गीता
इन सभी का समन्वय करते हुए मन और चेतना की समग्र व्याख्या प्रस्तुत करती है।
यह शोध-निबंध गीता में वर्णित मन और चेतना की अवधारणाओं का विशद
विवेचन प्रस्तुत करता है तथा वेदों और उपनिषदों के सन्दर्भों के माध्यम से उनके
दार्शनिक आधार को स्पष्ट करता है।

मन – सूक्ष्म तत्व


भारतीय मनोविज्ञान का मूलाधार वेद, उपनिषद, सांख्य, योग और वेदांत दर्शन हैं।
यहाँ मनुष्य को केवल शरीर और मस्तिष्क का समुच्चय नहीं माना गया, बल्कि
शरीर–प्राण–मन–बुद्धि–आत्मा की बहुस्तरीय सत्ता के रूप में समझा गया है। गीता
में कहीं गई बातों को जानने से पहले हमारे वेदों और उपनिषदों को समझना
आवश्यक है।
वेदों में मन की अवधारणा
वेद हमारे विचारों का, ज्ञान का मुख्य श्रोत हैं। नीचे कुछ सूक्तियाँ अलग-अलग
वेदों से ली गई जो दर्शाती हैं हमारे वेदों ने मन और उनकी तरंगों को सहज रूप में
परिभाषित किया है।
मन की अवस्थाएँ, इच्छाएँ, कल्पनाएँ और भावनाएँ स्वयं मन से ही उत्पन्न होती हैं
और मन द्वारा पोषित भी होती हैं।
ऋग्वेद में मन को अत्यंत सूक्ष्म और शक्तिशाली तत्त्व के रूप में देखा गया है—
“मनसो जातं मनसा वर्धितं मनः।”
(ऋग्वेद 10.58)
यह वाक्य आत्मचिंतन और मानसिक नियंत्रण के संदर्भ में प्रयोग किया जा सकता
है — अर्थात मन ही बंधन का कारण है और मन ही मुक्ति का साधन भी बन सकता
है।

यजुर्वेद के कई सूक्तों में भी मन को मुख्य रूप समझाया गया है। जैसे यह सूक्त
अपने आप में मन की मूल प्रकृति को परिभाषित करता है —

“तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।”(यजुर्वेद 34.1)
अर्थात् मेरा मन शुभ संकल्पों से युक्त हो। यह मंत्र दर्शाता है कि मन की दिशा ही
जीवन की दिशा है। मन सदैव पवित्र, कल्याणकारी, सकारात्मक और उत्तम
विचारों से युक्त रहे।
यह मंत्र मन की शुद्धि और श्रेष्ठ विचारों के लिए प्रार्थना के रूप में जपा जाता है।
अथर्ववेद में मन की गति को तीव्रतम कहा गया है—वह दूरस्थ वस्तुओं तक क्षणभर
में पहुँच जाता है। इससे स्पष्ट है कि प्राचीन ऋषि मन की गतिशीलता और उसकी
शक्ति को भली-भाँति समझते थे।

उपनिषदों में चेतना का सिद्धांत
उपनिषद – वेदों के अंतिम भाग (वेदांत) के रूप में ज्ञान व दर्शन का सार हैं। यहाँ
जानना आवश्यक है की उपनिषद मन के बारे में क्या कहते हैं।
उपनिषद भारतीय मनोविज्ञान की दार्शनिक नींव हैं। यहाँ चेतना को परम सत्य के
रूप में स्वीकार किया गया है।
ऐतरेय उपनिषद कहता है—
“प्रज्ञानं ब्रह्म।” अर्थात् चेतना ही ब्रह्म है।
कठोपनिषद में मन, बुद्धि और आत्मा के संबंध को रथ की उपमा से स्पष्ट किया
गया है—

“आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥”
यहाँ शरीर रथ है, आत्मा उसका स्वामी है, बुद्धि सारथी है और मन लगाम है। यदि
मन नियंत्रित है, तो जीवन सही दिशा में चलता है।
माण्डूक्य उपनिषद चेतना की चार अवस्थाओं का वर्णन करता है—जाग्रत, स्वप्न,
सुषुप्ति और तुरीय। यह चेतना के स्तरों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जो
आधुनिक चेतना-अध्ययन से भी कहीं अधिक गहन है।

गीता में मन की प्रकृति
भगवद्गीता जिसने श्रेष्ठतम रूप में मन को समझाया है, वेदों और उपनिषदों के
उक्तांशों को पढ़ने के बाद गीता और सरल लगती है, तार्किक और स्पष्ट दिखती
है।
लगभग सभी अध्यायों में किसी ना किसी रूप में मन और चेतना को व्यक्त किया
गया है। गीता के छठे अध्याय में अर्जुन मन की चंचलता का वर्णन करते हैं—
“चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥”
(गीता 6.34)
हे कृष्ण! मन चंचल हठी बलवान है दृढ़ है घना।
मन साधना दुष्कर दिखे जैसे हवा का बाँधना।।

इसपर श्री कृष्ण उत्तर देते हैं—
“असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥”
(गीता 6.35)
चंचल असंशय मन महाबाहो! कठिन साधन घना।
अभ्यास और विराग से पर पार्थ! होती साधना।।
यहाँ देखिए कितना प्राकृतिक प्रश्न है और उतना ही व्यवस्थित उत्तर। श्री कृष्ण ने
कैसे मनोविज्ञान के ज्ञाता के समान एक मनोवैज्ञानिक समाधान प्रस्तुत है—निरंतर
अभ्यास और वैराग्य। वे वैराग्य की बात भी करते हैं किंतु पहले अभ्यास की,
व्यवहार की, नित्य की, फिर उससे निकले अनुभव की। यह सिद्धांत आधुनिक
व्यवहार-चिकित्सा (Behavioral Therapy) और ध्यान-प्रशिक्षण से मेल खाता है।

मन, बुद्धि और अहंकार का संबंध
गीता के कई श्लोक मन, बुद्धि और अहंकार की बात करते हैं। श्री कृष्ण कई
जगहों पर अलग-अलग ढंग से अहंकार और उसकी कार्यशैली पर बात करते हैं।
गीता के तीसरे अध्याय के बयालीसवें श्लोक में कहा गया है –
“इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥”


यह श्लोक मानव-व्यक्तित्व की संरचना स्पष्ट करता है। इंद्रियाँ बाह्य विषयों से
संपर्क करती हैं, मन उनका समन्वय करता है, बुद्धि निर्णय लेती है, और आत्मा
सर्वोच्च सत्ता है।
इन्द्रियाँ श्रेष्ठ हैं, मन इनसे पड़े है। मन से पड़े बुद्धि है और आत्मा बुद्धि से भी परे है,
अलेदा है, अलौकिक है।
त्रिगुण सिद्धांत और व्यक्तित्व
सनातन के सभी ग्रंथों ने तीन गुणों की बात कही है – तम, रज, सत्। हम मन की
बात करें और तीनों गुणों की नहीं तो अधूरा हिस्सा रहेगा। हमारे ऋषियों ने, मुनियों
ने, गुरुओं ने निरंतर अपने विचार में, शिक्षा में, उनकी दी दीक्षा में सभी ने इन तीन
गुणों की बात की है।
मन क्या सोचते हैं, मन क्या विचारता है, मन क्या परोसता है, मन क्या ग्रहण करता
है – या सब इन्हीं तीन गुणों के आसपास घूमता है।

श्री रामचरितमानस का उत्तर काण्ड:
तीनी अवस्था तीनी गुन तेहि कपास ते काढ़ि। तूल तूरीय सँवारि पुनि बाति करै
सुगाढ़ि ।।

गीता में श्रीकृष्ण ने सम्पूर्ण चौदहवें अध्याय को इन्हीं तीनों गुणों को परिभाषित
करने में समर्पित किया है।


गीता के अनेक श्लोक उल्लिखित किए जा सकते हैं जैसे (अध्याय 14) के इस
उत्तम श्लोक में कहा गया है—
“सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः।”
सत्त्व गुण और शांति देता है, रज क्रिया और आसक्ति उत्पन्न करता है, और तम
अज्ञान व आलस्य का कारण है। इन गुणों का अनुपात ही मन को सम्भालता भी
है और नचाता भी है।
“सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ ” (14.17)
उत्पन्न सत् से ज्ञान, रज से नित्य लोभ प्रधान है।
है मोह और प्रमाद तमोगुण से सदा अज्ञान है।।

यह सिद्धांत आधुनिक व्यक्तित्व-सिद्धांतों से तुलनीय है। प्रत्येक व्यक्ति में इन
गुणों का मिश्रण होता है, जो उसके व्यवहार और मानसिक अवस्था को निर्धारित
करता है।
मन कैसा व्यवहार करता है, क्या छोड़ता है, क्या पकड़ता है – या सब मन की स्थिति
पर निर्भर है। मन के बहुआयामी रूप को इन पंक्तियों में सरलता से समझते हैं:
सहज है मन तो सहज विचार, विचार दिलाता है आधार
विचार ही मन का है विकार, जब मिलना चाहें निराकार


मन मूलतः शरीर से प्रेरित है, शरीर के गुणों-अवगुणों से व्यवस्थित है, उसी रूप में
आनुपातिक है, उसी रूप में संतुलित है।

चेतना और चेतना की अमरता
श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि चेतना (Consciousness) को
जागृत करने का विज्ञान है।
कुरुक्षेत्र का युद्ध वास्तव में मनुष्य के भीतर चलने वाला धर्म और अधर्म, सही
और गलत, आत्मा और अहंकार का संघर्ष है।
अगर हम आत्मन हैं तो उनकी संरचना, उस आत्मन की ध्वनि, उस आत्मन का
गुण, उस आत्मन से निकला तत्व चेतना है। मनुष्य को मनुष्य बनाये रखने में जो
सबसे मूल आधार है वह चेतना है।
मन तो केवल एक उपकरण है, चेतना आत्मा का मूल है। हमने ऊपर पढ़ा की मन
परिवर्तनशील है आत्मा नहीं, चेतना भी नहीं।
गीता के अनुसार मनुष्य तीन स्तरों पर जीता है:

  1. शरीर (Body) – नश्वर है
  2. मन और बुद्धि (Mind & Intellect) – बदलते रहते हैं
  3. आत्मा (Soul / चेतना) – शाश्वत और अजर-अमर

भगवान कृष्ण कहते हैं:
“न जायते म्रियते वा कदाचित्…”
आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है।
अर्थ: आत्मा न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है।
इससे स्पष्ट होता है कि चेतना शरीर के साथ समाप्त नहीं होती।
चेतना पूरे शरीर में व्याप्त रहती है।
यह आत्मा ही वास्तविक चेतना है — जो शरीर को जीवित रखती है।
अगर मनुष्य उपर्युक्त बातों को समझ लेता है, जानने के प्रयास में निरंतर रहता है
तब वह समझ लेता है कि वह केवल शरीर नहीं, बल्कि आत्मा है — तब उसकी
चेतना उच्च हो जाती है।
भगवद्गीता में बताया गया है कि आत्मा ही चेतन है। शरीर जड़ (निर्जीव) है, लेकिन
जब आत्मा शरीर में रहती है, तब शरीर चेतन दिखाई देता है। जैसे सूर्य के प्रकाश से
वस्तुएँ प्रकाशित होती हैं, वैसे ही आत्मा की उपस्थिति से शरीर में चेतना प्रकट
होती है।
यह दृष्टिकोण चेतना को शरीर से परे स्थापित करता है। भारतीय मनोविज्ञान के
अनुसार चेतना मूल सत्ता है, मन उसका उपकरण है।
जैसे एक सूर्य पूरे जगत को प्रकाशित करता है, वैसे ही एक आत्मा पूरे शरीर को
चेतन बनाती है।


परम चेतना (परमात्मा) का भी वर्णन गीता में मिलता है। व्यक्तिगत चेतना
(जीवात्मा) एक शरीर में सीमित है, जबकि सर्वव्यापी चेतना (परमात्मा) सभी
प्राणियों में विद्यमान है।
गीता तनाव में व्यक्ति को धैर्य देती है। जीवन में भ्रम की स्थिति में स्पष्टता देती है।
यही गीता दुख के समय आत्मबल देती है और सफलता में विनम्र बने रहने का
विवेक।
निष्कर्षतः गीता के अनुसार चेतना आत्मा का गुण है। शरीर नश्वर है, पर चेतना
(आत्मा) अविनाशी है। परम चेतना (भगवान) सबके भीतर स्थित है।

योग और मानसिक अनुशासन
सफलता मिले या विफलता, दोनों परिस्थितियों में मन को शांत और संतुलित
रखना ही सबसे बड़ा योग है।
किसी भी व्यक्ति को मानसिक दुविधा से निकालने के लिए कितना सरल और
सपाटे गीता उपदेश है –
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।2.48।।
आसक्ति (लगाव) को त्यागकर, सफलता और विफलता (असफलता) में
समान भाव रखते हुए, योग में स्थित होकर अपने कर्तव्य कर्म करो। क्योंकि,
सफलता-असफलता में समान भाव रखना ही ‘योग’ कहलाता है।

ध्यान की प्रक्रिया
“यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥”
(6.26)
भगवान कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि मन का स्वभाव भटकना है। जब भी
ध्यान या काम करते समय मन भटककर सांसारिक इच्छाओं में जाए, तो
साधक को उसे बलपूर्वक हटाकर बार-बार ईश्वर में या आत्मज्ञान में लगाना
चाहिए, यही मन को वश में करने की विधि है।

यह आधुनिक माइंडफुलनेस (Mindfulness) का मूल सिद्धांत है।
योग मानसिक संतुलन, एकाग्रता और आत्म-जागरूकता का विज्ञान है।

आधुनिक मनोविज्ञान से तुलना
भारतीय मनोविज्ञान (Indian Psychology) का मूल उद्देश्य केवल मानसिक
प्रक्रियाओं को समझना नहीं, बल्कि मनुष्य के संपूर्ण अस्तित्व—शारीरिक,
मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक—का समग्र अध्ययन करना है। पश्चिमी
मनोविज्ञान मुख्यतः व्यवहार, अनुभूति, स्मृति, भावनाओं और मस्तिष्कीय
क्रियाओं के अध्ययन पर केंद्रित है, जबकि भारतीय मनोविज्ञान चेतना
(Consciousness) को मूल तत्त्व मानकर मनुष्य को आत्मा के संदर्भ में समझता है।
श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय मनोविज्ञान का एक अत्यंत प्रामाणिक और गहन ग्रंथ
है। यह केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि मानव मन के संकट, उसके विकारों,


उसके विकास और उसके उत्कर्ष का व्यवस्थित विश्लेषण प्रस्तुत करती है। गीता
का आरंभ अर्जुन के मानसिक विषाद से होता है और समापन आत्म-साक्षात्कार
तथा स्थितप्रज्ञता की अवस्था पर। यह यात्रा ही भारतीय मनोविज्ञान की विकास-
प्रक्रिया है।
हालाँकि दोनों के आधार भिन्न हैं, पर मानसिक संतुलन, आत्म-नियंत्रण और
जागरूकता दोनों में समान रूप से महत्वपूर्ण हैं
गीता का कर्मयोग केवल अपूर्व दर्शन ही नहीं है, इसमें गहरा मनोविज्ञान भी छिपा
है।
गीता के प्रथम अध्याय में अर्जुन युद्धभूमि में मोह, शोक और भय से व्याकुल हो
जाते हैं। वे कहते हैं—
“तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितृ़नथ पितामहान्।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृ़न्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा।।1.26।।”
तब पार्थ ने देखा वहाँ, सब हैं स्वजन बूढ़े बड़े।
आचार्य भाई पुत्र मामा, पौत्र प्रियजन हैं खड़े।।

“सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते।।12.29”
होते शिथिल हैं अंग सारे, सूख मेरा मुख मेरा।
टेन काँपता थर-थर तथा रोमांच होता है महा।


यहाँ अर्जुन की शारीरिक प्रतिक्रियाएँ—हाथ काँपना, त्वचा में जलन, शरीर शिथिल
होना—मानसिक तनाव के शारीरिक लक्षण हैं। आधुनिक मनोविज्ञान में इसे
psychosomatic response कहा जाता है।
अर्जुन का यह विषाद केवल व्यक्तिगत दुःख नहीं, बल्कि नैतिक द्वंद्व (moral
conflict) और अस्तित्वगत संकट (existential crisis) का प्रतीक है। भारतीय
मनोविज्ञान इस संकट को आत्म-बोध की यात्रा का प्रारंभ मानता है।
मनोविज्ञान के अनुसार ऐसी स्थिति में एक मनोरोगी की सारी समझ और सोच
विकृत हो जाती है। उसके विचारों का प्रवाह गलत दिशा में बहने लगता है। यहां हम
आधुनिक मनोविज्ञान के लक्षणों और अर्जुन की मानसिक स्थिति की भलीभांति
तुलना कर सकते हैं।
पश्चिम में एक मनोवैज्ञानिक हुए हैं अमरॉन बैक। बैक ने अपने एक सिद्धांत में
कहा है कि मनोरोगी संसार को सदा एक नकारात्मक त्रिकोणीय दृष्टिकोण से
देखता है। गीता के आरंभिक चरण में हम अर्जुन को भी ऐसे ही नकारात्मक
त्रिकोण में उलझा पाते हैं।
श्रीकृष्ण तो स्वयं में उत्तम मनोवैज्ञानिक थे। उन्होंने किसी कारणवश ही अर्जुन के
रथ को जानबूझ कर भीष्म, द्रोण आदि पूजनीय गुरुजनों के सम्मुख खडा किया। वे
चाहते तो रथ का मुख दुर्योधन, दु:शासन, शकुनि या कर्ण की ओर भी कर सकते
थे। इससे अर्जुन के मनोबल में स्वतः उछाल आता, प्रतिशोध की ज्वाला और
भडक उठती। लेकिन नही, उन्होंने सूझ-बूझ कर रथ गुरुजनों के समक्ष किया और
अर्जुन के मार्मिक स्थल पर वार किया। यह चोट होते ही अचेतन स्तर के बीज चेतन
स्तर पर आ गए और मनोरोग के लक्षण प्रकट होने लगे।


मैंने कहीं तो पढ़ा था कि ऐसी तकनीक को आधुनिक मनोविज्ञान में
साइकोएनलिटिक थेरेपी कहते हैं।
इस पद्धति में आज का मनोवैज्ञानिक रोगी को उसके भीतर गहरी दबी भावना
जाहिर करने को प्रेरित करता है। उसे बीच में टोकता नहीं। उसकी किसी बात को
काटता नहीं। ठीक यही अवसर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को प्रदान किया।
गीता के पहले और दूसरे अध्याय के आरंभ में केवल अर्जुन अपनी मनोदशा
व्यक्त कर रहा है। श्री कृष्ण नितांत मौन हैं मानों एक डॉक्टर अपने पेशेंट को
ध्यानपूर्वक सुन रहा हो। अर्जुन कहे जा रहा है, श्रीकृष्ण सुने जा रहे हैं। फिर जब
अर्जुन अपने भीतरी बर्तन को पूरा उडेल देता है और कहता है- मुझ मोहचित्त के
लिए कोई कल्याणकारी साधन कहिए, तभी श्रीकृष्ण पूरे प्रवाह में बोलना आरंभ
करते हैं।
इसके बाद उन्होंने एक और पद्धति अपनाई, जिसे कॉग्निटिव बिहेयवियरल थेरेपी
कहते हैं। यह पद्धति दो स्तरीय होती है। पहला स्तर वैचारिक, दूसरा व्यावहारिक!
वैचारिक स्तर पर मनोवैज्ञानिक अपने रोगी के नकारात्मक विचारों को उघाडता है।
फिर इनके स्थान पर सकारात्मक विचारों को रोगी के मन में बिठाता है। दूसरे या
व्यावहारिक स्तर पर इन सकारात्मक पहलुओं या विचारों को रोगी के व्यवहार में
उतारा जाता है। यही दो स्तरीय पद्धति श्रीकृष्ण ने अपनाई।
उन्होंने कहा- हे पार्थ! तू सत् और असत् विचारों के तत्वों को अलग-अलग करके
देख। हे अर्जुन! तू शोक न करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है और पंडितों
के से वचन कहता है।
इन पंक्तियों द्वारा श्रीकृष्ण अर्जुन के विचारों के नकारात्मक पक्ष की ओर इशारा
कर रहे हैं। फिर कहते हैं- परंतु हे अर्जुन! जिनके प्राण चले गए हैं.. सच्चा पंडित


उनके लिए भी शोक नहीं करता। अब इस पंक्ति के द्वारा श्रीकृष्ण अर्जुन को उसी
बात का सकारात्मक पक्ष बता रहे हैं। यह पहले स्तर का उपचार याने कॉग्निटिव
थेरेपी ही थी।
इसके बाद श्रीकृष्ण अर्जुन को व्यावहारिक स्तर की भी तकनीकें देते हैं।
क‌र्त्तव्यकर्म किस प्रकार करना है, यह बताते हैं – हे अर्जुन! तू आसक्तिरहित होकर,
लोक कल्याण को ध्यान में रखकर भलीभांति अपना कर्म कर। तू योग अर्थात्
समत्व में स्थित होकर यह कर्म कर।
भगवद्गीता का छठा अध्यास जिसे आत्मसंयम-योग के नाम से भी जाना जाता है,
उसमें कही कई बातें, श्लोक और उनके अर्थ हमें मन उसकी विवशता और उस पर
पार पाने के सफल प्रयास यानी मोक्ष को समझाते हैं, कहती है—

“उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥”
(गीता 6.5)
यहाँ आत्मा शब्द का एक अर्थ मन भी लिया गया है। नियंत्रित मन मित्र है,
अनियंत्रित मन शत्रु।
यह सिद्धांत आधुनिक संज्ञानात्मक मनोविज्ञान से मेल खाता है, जहाँ
नकारात्मक विचारों को दुःख का कारण माना जाता है। गीता मन के शोधन और
अनुशासन पर बल देती है।


कितनी सरलता से यहाँ कहा गया है कि आप कितना गिरेंगे, आपका उद्धार कैसे
हो सकता है आपके मन पर निहित है। मनुष्य अपने आका शत्रु भी है, अपने
आपका सबसे बड़ा मित्र भी।
आज का विज्ञान भी इसी बात को अलग तरह से रखता है कि – अपने आपको
प्यार करो और अपने अच्छे गुणों को अधिक अवसर दें, ऐसा काम अधिक करें
जिससे अपना मन संतुष्ट होता हो – तभी आप स्वयं में प्रफुल्लित रहेंगे, स्वयं को
अपना सबसे अच्छा मित्र मानेंगे।
आम भाषा में सरल रूप का यह वाक्यांश कई श्लोकों और सूक्तियों का ध्येय है –
“मन के हारे हार, मन के जीते जीत”

निष्कर्ष:
गीता में मन, चेतना और व्यक्तित्व का अत्यंत वैज्ञानिक और दार्शनिक विश्लेषण
मिलता है। मन को चंचल और शक्तिशाली माना गया है, पर अभ्यास और वैराग्य
से उसे नियंत्रित किया जा सकता है। चेतना आत्मा का स्वरूप है, जो नित्य और
अविनाशी है।
वेदों और उपनिषदों की पृष्ठभूमि में गीता यह सिद्ध करती है कि मानसिक शांति
और आध्यात्मिक विकास परस्पर जुड़े हैं। आधुनिक मनोविज्ञान जहाँ मानसिक
रोगों के उपचार पर केंद्रित है, वहीं गीता मानसिक और आध्यात्मिक पूर्णता का
मार्ग प्रस्तुत करती है।

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